Saturday, May 2, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....13

 ज्ञान उदय जब होत है …..13

         तीसरी पीढ़ी के सन्त को चिन्तन मुद्रा में ही यहीं छोड़, चलिए इस आश्रम से बाहर निकलते हैं और कर्म-रहस्य को जानने का प्रयास करते हैं । कर्म, अकर्म और विकर्म - तीनों में से अकर्म तो मुक्त कर देते हैं तथा विकर्म पतन की पराकाष्ठा तक ले जाते हैं, जिससे बाहर निकलकर फिर से मनुष्य शरीर का मिलना बड़ा ही कठिन है । कर्म अर्थात् सकाम कर्म में ही अधिकांश लोग उलझे हुए है । मुख्य रूप से ये कर्म ही जगत् को गतिमान बनाए हुए हैं ।

          कर्म के सम्बन्ध में दो बातें मुख्य हैं । एक तो प्रत्येक कर्म का परिणाम मिलना निश्चित होता है और दूसरे प्रत्येक जीव से कर्म होंगे ही । यही कारण है कि कर्मों से दूर भागकर भी कर्म करने ही पड़ते हैं । इसलिए विवेकवान मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह कर्म से मुँह न मोड़े । भगवान कहते हैं - 

            सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् ।

            सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: ।। गीता - 18/48 ।।

अर्थात् हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्नि की तरह किसी न किसी दोष से युक्त है ।

        सहज कर्म प्रत्येक जीव से होते हैं । मनुष्य के ध्यान देने योग्य है कि वह इन कर्मों से अपना आसक्तिपूर्ण सम्बन्ध न जोड़े । जहां अग्नि होगी वहां धुआँ होगा ही वैसे ही प्रत्येक कर्म के साथ उसका परिणाम (अच्छा, बुरा अथवा मिश्रित) जुड़ा रहेगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

No comments:

Post a Comment