Friday, May 1, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....12

 ज्ञान उदय जब होत है …..12

        एक दिन नए सन्त ने अपने गुरु को स्वप्न में देखा । वे कह रहे थे कि बेटा ! तालाब मे जब भी बगुले आए और मछली मारने लगे तो उसे उड़ाने अथवा न उड़ाने का निर्णय सोच-समझकर करना । मेरे गुरु ने बगुले को उड़ा दिया था, जिससे उस दिन वह भूखा रह गया। इसके कारण मेरे गुरु को नरक जाना पड़ा। मैंने अपने गुरु के कहने से बगुले को नहीं उड़ाया था, जिस कारण से मुझे कुछ समय के लिए नरक में जाकर मरती हुई उस मछली की तरह तड़फना पड़ा था जो कि बगुले को न उड़ाने के कारण मारी गई थी । कारण, उस दिन बगुले ने मछली को क्रीड़ा करते हुए मार डाला था । वह चौंच मारकर मछली को इधर-उधर दौड़ते और तड़फते देखकर ही खुश हो रहा था । 

         मछली को बगुले ने अपना पेट भरने के लिए नहीं मारा था क्योंकि उस दिन वह भूखा नहीं था । केवल अपने मनोरंजन के लिए ही उसने मछली को मार डाला था । उस दिन मेरे द्वारा बगुले को उड़ा देना ही मेरा कर्तव्य था । मैं तो उस दिन उसे उड़ा नहीं पाया था पर तू इस बात का ध्यान अवश्य रखना और ऐसी परिस्थिति आए तो अपने विवेक से सोच-समझकर निर्णय लेना ।

          हमारी स्थिति तो और भी ख़राब है । मनोरंजन और शारीरिक सुख के लिए कुछ भी करते जा रहे हैं और उनको इस आधार पर उचित ठहराते हैं कि ऐसा किए बिना काम कैसे चलेगा, सभी तो यही कर रहे हैं । सभी अनुचित कार्य कर रहे हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि आप भी करने लगें । आप अनुचित कार्य नहीं करेंगे तो कम से कम आपको उस कर्म के प्रति ग्लानि तो नहीं होगी । आप उचित अथवा अनुचित जैसा भी कर रहे है तब भी संसार का काम चल रहा है और जिस दिन आप नहीं रहेंगे तब भी संसार यथावत चलता रहेगा । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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