Sunday, May 3, 2026

ज्ञान उदय जब होत है.....14

 ज्ञान उदय जब होत है …..14

           प्रत्येक कर्म एक क्रिया मात्र है और प्रत्येक क्रिया का परिणाम अवश्य होता है । यहां एक बात को ध्यान में रखना आवश्यक है । क्रिया का परिणाम तो मिलता ही है, साथ ही क्रिया की प्रतिक्रिया होती है उसका परिणाम भी मिलता है । प्रत्येक क्रिया का परिणाम तो प्रायः तत्काल ही मिल जाता है परंतु प्रतिक्रिया का परिणाम कब मिलेगा, कहा नहीं जा सकता । इसलिए प्रत्येक कर्म को करने से पूर्व इस बात को स्मृति में रखें कि इस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम भी हमें ही भुगतना होगा, कब और कहाँ, यह सब प्रकृति के विधान (विधि) पर निर्भर है ।

            भीष्म एक पूर्वजन्म में जब राजा थे और रथ पर बैठकर नगर भ्रमण पर निकले थे तो रास्ते में एक नाग ने उनकी राह रोक ली थी । भीष्म का कर्म केवल इतना सा था कि उन्होंने नाग को रास्ते से हटाने का आदेश दिया था । नाग को रास्ते से हटाते ही उस कर्म का परिणाम तत्काल ही मिल गया । परंतु उस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम सौ जन्मों बाद शरशैया के रूप में उन्हें भुगतना पड़ा क्योंकि पूर्व कर्म के समय नाग का शरीर काँटों से बिंध गया था ।

           प्रतिक्रिया वह कर्म है, जो प्रारम्भ में तो संचित होता है और उस जीवन में परिणाम न दे पाने पर आपका प्रारब्ध बनता है । अभी जो आश्रम की कथा कही है, उसमें बगुले को उड़ाते ही सन्त को कर्म का परिणाम मिल चुका था परंतु उस कर्म की प्रतिक्रिया का परिणाम उन्हें नरक में भूखे रहकर भुगतना पड़ा । दूसरे सन्त ने बगुले को न उड़ाने का कर्म किया था जिसकी प्रतिक्रिया में उन्हें नरक जाकर घायल मछली की तरह तड़पना पड़ा । इसलिए कर्म का पूर्ण परिणाम (प्रतिक्रिया सहित) जब तक नहीं मिल जाता तब तक कुछ भी कहा नहीं जा सकता । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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