सम्भवामि युगे युगे -66
पंचवटी में बने आश्रम से कुछ दूर पर रावण ने अपना पुष्पक उतारा । पेड़ों की ओट से छिपते-छिपाते दोनों (रावण और मारीच) आश्रम की टोह लेने लगे । देखा कि सिया राम अपने आसनों पर बैठे हैं और लक्ष्मण पास में ही खड़े अपने तीरों को साध रहे हैं । उपयुक्त अवसर जानकर रावण ने मारीच को स्वर्ण-मृग बन जाने का संकेत किया । मारीच ने तुरंत ही आदेश का पालन किया । हिरण घास चरता हुआ कुटिया के द्वार के सामने से धीरे-धीरे चलता हुआ आगे बढ़ने लगा । चमचमाते स्वर्णिम आभा युक्त हरिण को देखकर सीता विस्मित रह गई ।
सीता सोचने लगी - काश ! इस हिरण की चर्म मिल जाए । भगवान राम की ओर उन्मुख होकर कहने लगी - ‘प्रिय ! इस मृग को मारकर आप मेरे लिये इसकी छाल लेकर आइए । प्राप्त मृग-चर्म से मैं अपनी इस कुटिया को सजाऊंगी ।’ राम बोले - ‘ सीते ! इस वन में मायावी राक्षस मृग बनकर घूमा करते हैं, यह मृग भी कोई राक्षस है, ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा है । संसार में सोने का हिरण आज तक कहीं देखा-सुना नहीं है क्योंकि होता ही नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि कोई मायावी राक्षस हिरण का रूप धरकर हमें छलने आया है ।’
‘यदि यह राक्षस भी है तो कोई बात नहीं, उसको मारकर आप उसकी स्वर्ण-छाल तो ला ही सकते हैं । नहीं, नहीं ! मुझे तो स्वर्ण मृग की चर्म चाहिए ही ।’ सीता पति से हठ करने लगी । त्रिया हठ सबसे प्रबल हठ होता है । लाख प्रयास कर लो, इस हठ को आप तोड़ ही नहीं सकते । राम भगवान है तो क्या हुआ, मानवोचित लीला में तो उनको भी स्त्री हठ के सामने झुकना पड़ा । बुलाया लक्ष्मण को अपने पास, सीता की सुरक्षा का भार सौंपते हुए बोले - ‘मैं इस मृग का शिकार करने जा रहा हूँ, वन में कई राक्षस घूम रहे हैं । सीता को आश्रम में अकेली मत छोड़ना, चाहे कैसी भी परिस्थिति सामने आ जाए ।’
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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