सम्भवामि युगे युगे -63
आसुरी स्वभाव रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक असुर का स्वभाव जानता है । सूपनखा जानती है, रावण का स्वभाव । इसलिए दण्डकारण्य के दो मनुष्यों के साथ रहने वाली सुन्दर नारी का ज़िक्र अवश्य करती है । स्त्री, प्रत्येक असुर की सबसे बड़ी कमजोरी । यही रावण की भी है और यही कमजोरी आज प्रत्येक व्यक्ति में घर करती जा रही है । सूपनखा को आश्वस्त किया गया - तुम्हारे अपमान का बदला अवश्य लिया जाएगा । रात को अपने शयनकक्ष में चिंतित रावण इधर-उधर घूम रहा है । मंदोदरी चिंतित होने का कारण पूछ भी रही है, परंतु रावण कोई उत्तर नहीं देता । अचानक एक योजना बनाता है - सीता-हरण की । परन्तु सूपनखा ने तो कहा था कि वे बड़े बलशाली है । तभी उसे याद आता है - मायावी मारीच । वस्त्र धारण किए और चल पड़ा मारीच के समुद्र तट पर स्थित निवास स्थान की ओर ।
माया दो प्रकार की - विद्या माया और अविद्या माया । अविद्या माया का उपयोग आसुरी स्वभाव वाले करते हैं और विद्या माया दैवी स्वभाव वाले । विद्या माया आपको परमात्मा तक ले जाती है और अविद्या माया आपको संसार में उलझाकर रख देती है । रावण कम ज्ञानी था क्या ? सबकुछ जानता था वह । वह जानता है कि मारीच ऐसी माया जानता है कि वह बड़े से बड़े कथित ज्ञानी मनुष्य तक को भ्रम में डाल सकता है । माया से पार पाना बहुत कठिन है परन्तु भगवान गीता में कहते हैं कि जो मेरी शरण लेता है, वह इस माया से पार हो जाता है ।
आज मारीच के पास चल कर गया है रावण । कहता है - ‘मारीच, तू मायावी हरिण बन जाना । आगे मेरा काम ।’ मारीच - ‘आगे क्या काम है आपका ?’ रावण - ‘मुझे उस सुन्दर नारी का अपहरण करना है जो दण्डकारण्य में उन दो युवकों के साथ है ।’ सुनकर मारीच को पूर्व का घटनाक्रम स्मरण हो आता है । वह कहता है कि वे राम-लक्ष्मण है और अयोध्या के राजकुमार हैं । उनके द्वारा चलाए गए बिना फल के बाण से ही तो वह इतनी दूर लंका में आकर गिरा था । विविध भांति समझाता है मारीच, परन्तु रावण को कुछ समझना ही नहीं था इसलिए जानते हुए भी समझा नहीं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
No comments:
Post a Comment