सम्भवामि युगे युगे -65
योजना सुनकर मारीच अपना सिर पीट लेता है परन्तु रावण की योजनानुसार चलना उसकी मजबूरी है । वह जानता है कि इस समय वह रावण राज में है, रावण के साथ उसके पुष्पक विमान में है और साथ ही शस्र विहीन भी है । वह चुपचाप रावण की सारी बातें सुनता रहा और भीतर ही भीतर राम नाम का स्मरण करते हुए प्रभु के दर्शन की कल्पना करता रहा ।
इधर पंचवटी में लक्ष्मण कन्द-मूल- फल इकट्ठे करने वन में गए हैं । राम-सीता के मध्य कुटिया में वार्तालाप चल रहा है । राम कहते हैं - ‘ सीते ! चेहरे को विकृत कर दिए जाने से क्रुद्ध हुई सूपनखा रावण के पास गई है और रावण अपनी बहिन के अपमान का बदला लेने आता ही होगा । अब समय आ गया है उसका वध करने का । तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचे इसलिए तुम अग्नि में प्रवेश कर जाओ और अपनी माया से छाया सीता को मेरे साथ कर दो । मैं शीघ्र ही इन दुष्टों का नाश कर दूँगा ।’
आदर्श पत्नी वही होती है, जो पति के किए प्रत्येक संकेत को समझ जाए । भगवान राम के ऐसा कहते ही सीता अग्नि में प्रवेश कर गई और अपनी माया के बल से अपनी सजीव प्रतिकृति (छाया सीता) उस कुटिया में उपस्थित कर दी । छाया सीता का रूप, रंग और व्यवहार मूल सीता से तनिक भी भिन्न नहीं था । कन्द-फल लेकर लौट आए लक्ष्मण भी इस भेद को समझ नहीं पाए । आधुनिक युग में भी असल नक़ली का भेद समझ में कहां आता है । कई बार तो नक़ली असली की तुलना में अधिक प्रभावशाली होता है जिससे लोग भ्रमित होकर नक़ली को ही असली समझ बैठते हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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