सम्भवामि युगे युगे -34
धनुष-भंग के साथ ही राम-सीता विवाह हो गया, फिर भी सामाजिक मान्यता के लिए पाणिग्रहण संस्कार भी होना आवश्यक है । इसके लिए दशरथजी को सपरिवार बुलावा भेजा गया । दशरथजी बारात लेकर आये और चारों भाइयों का विवाह सम्पन्न हो गया । सीता-राम, माण्डवी-भरत, उर्मिला-लक्ष्मण और श्रुतिकीर्ति-शत्रुघ्न । सब को साथ लेकर लौट आए राजा दशरथ अयोध्या को । अयोध्या लौटते ही राजा दशरथ ने राम को अयोध्या की सेना का सेनापति बना दिया । एक तरफ़ राज्य की सुरक्षा का भार और दूसरी ओर गृहस्थ जीवन । लेकिन राम-सीता ने कोई गृहस्थ जीवन जीने के लिए तो शरीर धारण नहीं किए थे । आगे की योजना, प्रकृति स्वयं बनाएगी । प्रकृति परिवर्तन का ही दूसरा नाम है । बालक युवक में परिवर्तित होता है, युवा प्रोढता को प्राप्त होता है और प्रोढ वृद्ध में परिवर्तित होता है । जीव को स्वयं के शरीर में हो रहे इन परिवर्तनों का भान तो होता है परन्तु वह सदैव ही इन संकेतों की उपेक्षा करता आया है ।
दशरथजी को भी एक दिन अपनी दस्तक दे रही वृद्धावस्था का भान हुआ, जब वे दर्पण के सामने खड़े होकर अपने आप को निहार रहे थे । कानों के ऊपर के बाल सफ़ेद होते जा रहे हैं । समझ गए कि समय आ गया है, उत्तराधिकारी को राज-पाट सौंपने का । गुरु वशिष्ठजी को बुलाया गया । मंत्रणा हुई कि चारों भाई एक साथ जन्मे, एक साथ पले-बढ़े, न कोई बड़ा न कोई छोटा । किसको राज्य सौंपा जाय ?
जिस माया को बार-बार बीच में ला रहा हूँ, जरा उस विधि का विधान तो देखिए । भरत-शत्रुघ्न कैकय देश में, अवध से बहुत दूर, सुदूर पश्चिम में । तत्काल बुलावा भेजना और उनका आ पाना, सम्भव ही नहीं क्योंकि राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त भी दो दिन बाद का निकाला है । चारों भाइयों में बड़ा प्रेम है । भरत और शत्रुघ्न यहां होते तो अच्छा था । उन दोनों को भला क्या आपत्ति होगी । मंत्रणा की गई । मंत्रणा में निश्चित हुआ कि सर्वोत्तम मुहूर्त को देखते हुए राम का राज्याभिषेक इसी दिन होगा । सभी प्रसन्न हुए क्योंकि प्रियता किसको पसन्द नहीं होती । राम सबके प्रिय हैं और राम को सब प्रिय हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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