मौन -5
जो ज्ञान मार्ग पर अग्रसर है और शरीर तथा स्वयं (आत्मा) के एक दूसरे से भिन्न होने के रहस्य को जानने के लिए शोध रत है, उसे ऋषि कहा गया है । आज विज्ञान के युग में ऐसे व्यक्ति को वैज्ञानिक कहा जाता है । दूसरा जो आत्म-बोध के लिए मौन रहकर अध्यात्म पथ पर तपस्या में लीन है, उसे मुनि कहा जाता है । मुनि को शरीर और संसार की चिंता नहीं सताती वह तो सदैव अपने भीतर ही प्रवेश किए रहता है । ऐसा मुनि सदैव मौन रहकर परमात्म-चिंतन में लीन रहता है । इन्हें दार्शनिक कहा जाता है । वे एक दर्शन का अनुगमन करते हुए अध्यात्म-पथ पर आगे बढ़ते हैं । ऋषि और मुनि में तनिक सी भिन्नता होने का अर्थ यह नहीं है कि मुनि में ज्ञान नहीं है, वह भी ज्ञानी है ।
ऋषि प्रकृति के रहस्य खोलने में लगा हुआ है । वह इन रहस्यों के माध्यम से शरीर और संसार से विमुख होने का प्रयास करते हुए अंततः आत्म-बोध को उपलब्ध होता है । मुनि प्रकृति के ज्ञान का अतिक्रमण कर जाता है और मौन रहकर सदैव परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है । वह ज्ञान से चिन्तन की अवस्था में चला गया है जबकि ऋषि सदैव आत्म-बोध के सुगम रास्तों की खोज में रत रहता है ।
महर्षि पतञ्जलि अष्टांग-योग के माध्यम से आत्म-बोध को उपलब्ध हुए । उन्होंने यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, इन आठ मार्गों की खोज की, जिससे कोई भी व्यक्ति आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है । इसी अष्टांग-योग की खोज करने के कारण उन्हें ऋषि माना जाता है । इसी प्रकार चरक और सुश्रुत भी ऋषि के श्रेणी में आते हैं जिन्होंने रोगग्रस्त शरीर की शल्य और भेषज-चिकित्सा के माध्यम से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य से स्वस्थ अर्थात् ‘स्व’ में स्थित होने के मार्ग की खोज की थी । उन्होंने सिद्ध किया कि एक स्वस्थ शरीर ही आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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