मौन -2
चलिए ! ‘मौन’ क्या है, इसको जानने और समझने का प्रयास करते हैं । सबसे पहले शरीर-विज्ञान के आधार पर मौन को समझते हैं ।
‘मौन’ का शाब्दिक अर्थ है - वाक् शक्ति का उपयोग न करना । परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से जीवों को बोलने की शक्ति प्रदान की है । पांच कर्मेन्द्रियों में ‘वाणी’ भी एक कर्मेन्द्रिय के माध्यम से दी जाने वाली अभिव्यक्ति है । इसे वाक्-इन्द्रिय कहा जाता है । सभी जीवों में एक मात्र मनुष्य ही ऐसा जीव है जो शब्दों के माध्यम से अपने भीतर के भावों को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकता है । मनुष्य के गले में स्थित दो स्वर-यन्त्रों (vocal chords) के मध्य से जब वायु का प्रवाह होता है तो उससे ध्वनि की तरंगें निकलती है । इन ध्वनि-तरंगों को व्यक्ति अपनी जिह्वा से भिन्न-भिन्न आवृतियों (frequencies) का निर्माण करते हुए शब्द बनाता है । ये शब्द ही उसके भावों को सबके समक्ष प्रस्तुत करते हैं । इस प्रकार ये शब्द एक दूसरे से सम्पर्क और संदेश-संचार का साधन बनते हैं ।
प्रश्न उठता है कि शब्द-अभिव्यक्ति में ज्ञान की भूमिका किस प्रकार है ? मनुष्य ज्ञान तो प्राप्त करता है - पांच ज्ञानेंद्रियों से और फिर शब्दों के माध्यम से उस ज्ञान को बोलकर अभिव्यक्त करता है वाक्-इंद्रिय के माध्यम से । मनुष्य की शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति में भूमिका एकमात्र श्रवणेन्द्रिय की ही है । जिसमें श्रवण क्षमता का जन्मजात अभाव होता है उसकी वाक्-इंद्रिय भी कुछ नहीं कर सकती । कान से सुने जाने वाले शब्द ही बाल्यावस्था में शब्द-कोष (vocabulary) का निर्माण करते हैं । जन्मजात बहरा (deaf) बालक कुछ भी नहीं सुन सकता तब उसमें शब्द-कोष कैसे बनेगा ? इसीलिए जन्मजात बहरा व्यक्ति गूँगा (dumb) भी होगा, यह निश्चित है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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