Friday, August 14, 2026

मौन -1

 मौन - 1

           अध्यात्म की भूख भी बड़ी विचित्र है । जहां से कुछ ज्ञान मिलने की तनिक सी भी सम्भावना नज़र आती है, पागल मन उसी ओर जाने को उत्सुक हो जाता है । न जाने यह भूख कब मिटेगी ? जो पहले जान लिया था, वह तत्काल ही फिर से न जाना हुआ हो जाता है क्योंकि जितना जानने का प्रयास करते हैं, उतना ही उलझते जाते हैं । ज्ञान असीम है, इसकी पूर्ण अवस्था को पा लेना बड़ा ही दुष्कर है क्योंकि थोड़ा कुछ जानते ही अनुभव में आता है कि अभी भी बहुत कुछ जानना शेष है ।

           पश्चिम के एक दार्शनिक ने बड़े काम की बात कही है । वे कहते हैं - “50 वर्ष पहले मैं सब कुछ जानता था । आज जीवन के इस मोड़ पर आकर समझ में आया कि मैं अब भी कुछ नहीं जानता ।” ज्ञान असीम है, इसको जितना समेटने की कोशिश करेंगे उतने ही हम उलझते जाएंगे । इसीलिए कहा जाता है कि जीवन में जितना जान लिया है, वह पर्याप्त है । 

             हरिः शरणम् आश्रम के आचार्य श्री गोविंद राम शर्मा कहते हैं कि सीखे हुए ज्ञान की क़ीमत दो कौड़ी की नहीं है । सीखे हुए ज्ञान से हमें शब्दों का जाल बुनना आ सकता है जिसको प्रवचन और लेखन के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं । ज्ञान को जब तक आचरण में नहीं लाया जाता तब तक इसकी कोई क़ीमत नहीं है । जब ज्ञान भीतर उतरता है तब मनुष्य मौन और निःशब्दता को पा लेता है क्योंकि तब यह ज्ञान आत्म-स्वरूप का अनुभव करा देता है । इस अनुभव को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं होते । इस निःशब्दता और मौन पर कबीर कहते हैं - ‘गूंगे केरी सरकरा, खाय और मुस्काय ।’ परमात्मा का अनुभव होते ही शब्द खो जाते हैं और ‘मौन’ घटित हो जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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