Sunday, August 16, 2026

मौन -3

 मौन -3

           यह बात हुई जन्म-जात गूंगे की । कई बार सिर पर घातक चोट लग जाने से मस्तिष्क का वह भाग प्रभावित हो जाता है जो स्वर-यन्त्र तक शब्दों को उच्चारित करने के संकेत भेजता है । अपनी गर्दन के आगे के भाग में जहां थायरॉयड ग्रंथि स्थित होती है, वहाँ से एक नाड़ी (nerve, recurrent laryngeal) गुजरती है । इस नाड़ी के क्षतिग्रस्त हो जाने से भी स्वर-यन्त्र काम करना बन्द कर देते हैं । ऐसा होने से मनुष्य चाहकर भी बोल नहीं होता । 

         जिन लोगों को ज़ोर से बोलने की आदत होती है अथवा जो प्रत्येक बात पर क्रोधकर चिल्लाने लगते हैं, उनके स्वर-यन्त्र क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । उन्हें प्रारंभ में तो बोलने में कठिनाई होती है, फिर धीरे-धीरे वहाँ से शब्द उच्चारित नहीं होते । ऐसा व्यक्ति भी मौन हो जाता है क्योंकि वह चाहकर भी बोल नहीं पाता ।

            कई बार स्वर-यन्त्र स्वयं ही रोगग्रस्त हो जाता है जिसके कारण प्रारम्भ में तो आवाज़ भारी होने लगती है जिसे hoarseness of voice होना भी कहते हैं और अंततः वाणी निकलनी असंभव हो जाती है । स्वर-यंत्र की बीमारियों में इसका कैंसरग्रस्त हो जाना मुख्य है ।

            इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि शारीरिक बीमारियों से भी वाणी का मौन हो जाना हो सकता है । यह सब बाहर के मौन है परंतु इन सब प्रकार के मौन में भी भीतर वार्तालाप चलता रहता है । जब तक भीतर से चुप नहीं हुआ जाता तब तक सब मौन व्यर्थ हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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