मौन - 4
इतना विज्ञान समझ लेने से ‘मौन’ को समझना आसान हो जाएगा । हम ‘मौन’ को जानने की यात्रा पर अग्रसर हैं । गूँगे का भी मौन होता है, बीमार व्यक्ति का भी मौन होता है परन्तु उसे मौन नहीं कहा जा सकता । उसका मौन शारीरिक विकलांगता के कारण है न कि किसी उद्देश्य को लेकर । वह भले ही शब्दों को बोलकर अपनी अभिव्यक्ति नहीं दे सकता परन्तु मुस्कुरा कर, दुःखी होकर, रोकर, हाथ-पैर पटककर अपनी शेष चार ज्ञानेंद्रियों से मिले ज्ञान की अभिव्यक्ति दे सकता है ।
चलिए ! जन्मजात मूक व्यक्ति के मौन से आगे बढ़ते हैं । स्वर-यन्त्र के स्वस्थ होने के बाद भी यदि आप अपनी इच्छा से शब्द उच्चारित नहीं कर रहे हैं तो यह आपका ‘मौन’ है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह जानना है कि आप मौन क्यों हुए अर्थात् आपके मौन होने के पीछे क्या उद्देश्य है ? संसार की चिंता से ग्रस्त व्यक्ति भी मौन धारण कर लेता है और आध्यात्मिक चिंतक भी । परन्तु दोनों के मौन में बड़ा अन्तर है । आध्यात्मिक चिंतक जब चिंतन की सर्वोच्च अवस्था का भी अतिक्रमण कर जाता है तब चिंतन कहीं पीछे छूट जाता है तब जो मौन घटित होता है वह वास्तव में मौन है ।
शास्त्रों में मौनी बाबा को मुनि कहा जाता है । सनातन धर्म-शास्त्रों में ऋषि और मुनि, इन दो प्रकार के आध्यात्मिक चिंतकों का वर्णन आता है । शास्त्रों में आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर व्यक्ति को दो शब्दों के माध्यम से सम्बोधित किया गया है - ऋषि और मुनि । दोनों ही आत्म-बोध की यात्रा पर हैं । फिर भी इनकी दो संज्ञाएँ क्यों है ?
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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