Wednesday, July 8, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -45

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -45 

           आत्मा जब शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेती है, वह आत्मा का सक्रिय रूप है, जिसे अहं कहा जाता है । वास्तव में आत्मा का स्वरूप अक्रिय है और समझने की दृष्टि से उसे मूल अहम् कहा जा सकता है । सक्रिय स्वरूप अर्थात् अहं, सूक्ष्म शरीर के माध्यम से संसार में विचरण करता है और उसमें आसक्त होकर कर्ता-भोक्ता बन जाता है । आत्मा का अक्रिय स्वरूप अर्थात् जो मूल अहम् है, वह शरीर से भिन्न है और परमात्मा से अभिन्न है । वह न कर्ता है और न ही भोक्ता । सक्रिय अहं को ऊर्जा मिलती है अक्रिय मूल अहम् (आत्मा) से । इसी ऊर्जा को पाकर वह शरीर और संसार में आसक्त हो जाता है, जिस कारण से जीव में कर्ता-भोक्ता भाव पैदा हो जाता है ।

         मन से आत्मा का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । हाँ, केवल बुद्धि के कारण ही उसे मन के साथ जुड़कर जीवात्मा बनना पड़ता है । अगर बुद्धि सदैव आत्मा के अनुसार चले तो इस ‘अहं’ का लोप हो जाता है और फिर अहम् (आत्मा) को स्वतन्त्र माना जा सकता है । कहने का अर्थ है कि मन ही बंधन का कारण है लेकिन ऐसा होना तभी संभव हो सकता है जब मन बुद्धि पर प्रभावी हो जाये । प्रत्येक व्यक्ति अपने अधीन के साथ सम्बन्ध न रख कर अपने से उच्च के साथ सम्बन्ध बनाये रखना चाहता है । जब हम अपने अधीन के प्रभाव में आकर उसका कहा मानने लगते हैं तो हम अपने स्तर से नीचे गिर रहे होते हैं । इसी प्रकार जब हम अपने से उच्च के साथ रहते हुए उसके कहे अनुसार चलते हैं तो हम प्रगति-पथ पर अग्रसर हो रहे होते हैं । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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