आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -44
भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन को कहते हैं -
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।। गीता-3/42 ।।
अर्थात इन्द्रियों को शरीर से पर अर्थात श्रेष्ठ और सूक्ष्म कहते हैं, इन्द्रियों से पर मन है; मन से भी पर बुद्धि है और बुद्धि से भी पर अर्थात सूक्ष्म वह (आत्मा) अर्थात् आप स्वयं है ।
काम रहता है इस बुद्धि और आत्मा के सन्धि स्थान पर । उस सन्धि को ‘अहं’ कहा जाता है । वास्तव में ऐसी किसी सन्धि का अस्तित्व है नहीं, केवल अज्ञान के कारण हमें प्रतीत होती है । ज्ञान होते ही जब आत्मा और बुद्धि का काल्पनिक सन्धि-भंग हो जाता है, तह अहं शुद्ध होकर अहम् (मूल स्वरूप) हो जाता है । इस अहम् को ही आत्मा कहा जाता है और उस अहं को अहंकार ।
बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म अर्थात् पर भी एक और है, जिसको आत्मा कहा जाता है और जो कि जड़ तत्वों में केवल बुद्धि के निकट है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बुद्धि और आत्मा को हमारा अहं (अहंकार) ही जोड़ता है । अहं के अस्तित्व में आते ही आत्मा अक्रियता में चली जाती है अर्थात् फिर उसकी शरीर की सक्रियता में कोई भूमिका नहीं रहती । आत्मा के अक्रिय हो जाने को ही आत्मा का मरना अथवा देशी भाषा में राम निकल जाना कहते हैं । फिर सारा खेल शरीरों (स्थूल और सूक्ष्म) के स्तर पर ही खेला जाने लगता है, आत्मा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता । चलिए ! अपनी इस बात को और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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