आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -42
इंद्र तत्काल ही उस तपस्वी की ओर उन्मुख हुआ और बोला - ‘श्रीमान ! मेरे योग्य और कोई सेवा हो तो बताएं । आपके मन में और कोई इच्छा हो तो बताएं, आपका यह सेवक तुरंत ही आपकी वह इच्छा पूरी कर देगा ।’ इतना सुनते ही उस तपस्वी का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा ।’ तपस्वी करबद्ध होकर इंद्र के सामने खड़ा हो गया और बोला - ‘ अगर आप मेरी इच्छा को जानना और पूरी करना ही चाहते हैं तो गाँव वाली उस रूपवती कन्या को मेरे समक्ष ला कर खड़ा कर दीजिये, मैं उसके साथ विवाह कर अपनी गृहस्थी बसाना चाहता हूँ ।’
इंद्र इतना सुनकर समझ गया कि इस भूलोक में मनुष्य के जीवन से कभी भी कामना समाप्त नहीं हो सकती । इंद्र ने आगे उस तपस्वी की इच्छा पूरी करने के लिए क्या किया, उसको जानना हमारे लिए आवश्यक भी नहीं है । आवश्यक इसलिए नहीं है क्योंकि अगर इंद्र ने उसकी यह एक कामना पूरी भी कर दी होगी, तो वह तपस्वी पुनः कई नई कामनाओं के जंजाल में और अधिक उलझ गया होगा ।
इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का एक और सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - “कामनाओं पर नियंत्रण रखना ।”
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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