आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -43
कामना रखने से व्यक्ति कर्म के प्रति आसक्त होता है । जब कामना पूरी हो जाती है, लोभ पैदा हो जाता है । लोभ पुनः नई कामनाओं को जन्म देता है और फिर से व्यक्ति कर्म में आसक्त हो जाता है । इस प्रकार कामनाएं आसक्ति को जन्म देती है और आसक्ति कामनाओं को । यह दुष्चक्र कभी भी टूट नहीं पाता और मनुष्य इस संसार के आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता । जब हम कामनाओं को नियंत्रित कर लेंगे तो शीघ्र ही अनासक्त-भाव को प्राप्त हो जायेंगे । आइये ! अब जानने का प्रयास करते हैं कि कामनाएं नियंत्रित कैसे हो सकती है ?
कामनाओं को नियंत्रित करने के लिए हमें कामनाओं के विज्ञान को समझना होगा । कामनाएं तभी उत्पन्न होती है, जब इन्द्रियां किसी भोग के प्रति आसक्त हो जाती है । परन्तु इन्द्रियां अकेले भोग प्राप्त नहीं कर सकती, उसके लिए मन का इन्द्रियों के साथ रहना आवश्यक है । मन इन्द्रियों के साथ रहकर कर्म करवाता है, तभी इस शरीर से भोग प्राप्त हो सकते हैं । मन पर प्रभाव बुद्धि का होता है क्योंकि बुद्धि मन से पर अर्थात सूक्ष्म और श्रेष्ठ है । अगर बुद्धि को मन अपने वश में कर लेता है तभी वह इन्द्रियों से कर्म करवाकर भोग उपलब्ध करवा सकता है अन्यथा नहीं । कोई भी भोग कभी भी मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकता । असंतुष्टि फिर नई कामनाओं को जन्म देती है और नयी कामनाओं को पूरा करने के लिए फिर से मन और इन्द्रियां कर्म करने में जुट जाती है । इस प्रकार यह कामनाओं और कर्म का एक अटूट चक्र बन जाता है जिसका टूट पाना लगभग असंभव हो जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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