Saturday, July 4, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -41

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -41 

      तपस्वी की आँख खुली, अपने सामने साक्षात् देवराज इंद्र को खड़ा पाया । इंद्र ने तपस्वी को दंडवत प्रणाम किया और बड़े ही प्रेम से बोला - ‘हे तपस्वी ! आपने बड़ा कठोर तप किया है । केवल आप ही देव-लोक के पद पर आसीन होने के अधिकारी हैं । मैं आपका सहायक बनकर आपकी सेवा में रहूँगा । श्रीमन्, मैं आपको देव-लोक का कार्यभार संभालने के लिए आमंत्रित करने आया हूँ ।’ 

             इस प्रकार इंद्र के मुख से स्वर्ग का राज्य मिलने की बात सुनकर भी तपस्वी प्रसन्न नहीं हुआ । उसने स्वर्ग लोक का शासन संभालने से इनकार कर दिया । अब एक बार फिर से चौंकने की बारी देवराज की थी । वे अपने शासन काल में स्वयं के समक्ष खड़ा एक ऐसा मनुष्य देख रहे थे, जिसके मन में स्वर्ग का राजा बनने तक की कामना भी नहीं है, छोटी-मोटी कामनाओं के तो मन में बने रहने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होगा । इंद्र सोचने लगा कि यह तपस्वी तो निश्चित ही ब्रह्म-लोक जाने का अधिकारी है । उसने तपस्वी को कहा – ‘मैं, सब कुछ समझ गया हूँ । आप ब्रह्म-लोक को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं और निश्चय ही वहां जाने के अधिकारी भी हैं । ब्रह्म-लोक के सामने भला देव-लोक की क्या बिसात । परमात्मा आपकी यह इच्छा भी पूरी करे ।’ 

             इतना कहकर इंद्र वापिस अपने लोक जाने को मुड़ा ही था कि अनायास ही उसके मन में एक बात आई । वह सोच रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इस भूलोक के किसी एक मनुष्य की सभी कामनाओं का अंत हो गया हो । कम से कम मुझे इस तपस्वी को पूछना तो चाहिए कि क्या जीवन में उसकी कोई और कामना अभी भी शेष है ?

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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