Tuesday, December 23, 2025

रुचि/भूख

 रुचि / भूख

            प्रत्येक व्यक्ति की रुचि भिन्न-भिन्न होती है । कुछ लोग भोजन में रुचि रखते हैं, कुछ की रुचि पढ़ने, लिखने में होती है और कुछ की घूमने फिरने में । रुचि जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाती है तब उसे ‘भूख’ कहा जाता है । इस भूख को शांत करने के लिए व्यक्ति अनेकों प्रयास करता है । कहने का अर्थ है कि इस संसार में सभी के पीछे एक प्रकार की भूख लगी है । 
              मुख्य बात है कि आपका भोजन कैसा है, आप क्या पढ़ते/लिखते हैं, कैसी जगह जाते हैं, घूमते-फिरते हैं, आप कैसे लोगों के संग उठते-बैठते हैं ?  कहने का अर्थ है कि आपकी रुचि सात्विक है, राजसिक अथवा तामसिक । सात्विक भोजन आपकी पेट की भूख को शांत करेगा और शरीर को पुष्ट भी । घूमना यदि तीर्थों की ओर है तो ऐसा भावपूर्ण पर्यटन आपके अन्तर्मन को शुद्ध बनाता है । इसी प्रकार सात्विक पठन-पाठन और लेखन स्वयं को जानने की जिज्ञासा को शांत करते हैं । आत्म-ज्ञान की भूख जाग्रत होते ही सोच, विचार और आचरण बदल जाते है । पढ़ने, सुनने, बोलने और लिखने में एक प्रकार की संतुष्टि का अनुभव होता है । 
            कुछ समय के लिए लेखन से हुई दूरी से मुझे जीवन में कुछ अभाव का अनुभव हुआ, संभवतः संतुष्टि का अभाव । लेखन से आत्मसंतुष्टि मिलती है । दूसरी बात, पाठक भी पुनः लेखन प्रारम्भ करने का बार-बार आग्रह कर रहे हैं ।  विचारों को जो गति लेखन से मिलती है, वह मुझे किसी अन्य साधन से नहीं मिली । लेखनी जब चलती है, तब न जाने भीतर से इतने विचार कहाँ से प्रकट हो जाते हैं ? लेखनी तो आपकी हो सकती है परंतु भाव जागृत करने में निःसंदेह अदृश्य शक्ति की भूमिका रहती है । लेखनी उठती भी तभी है, जब भीतर भाव जगते हैं । लेखनी तो केवल उन भावों को भाषाबद्ध करती है । लेखन की भूख का सीधा सम्बन्ध भीतर उठ रहे भावों से है ।
          आत्मकल्याण में लेखन की भले ही प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती हो परंतु अध्यात्म पथ पर अग्रसर करने में इसका महत्वपूर्ण स्थान है । लेखन से आत्मकल्याण की भूख सदैव बनी रहती है । 
        तो बात चल रही थी भूख की । चलिए ! इसी भूख पर बात को आगे बढ़ाते हैं । प्रत्येक जीव को भूख विरासत में जन्मजात मिलती है । भूख का अर्थ है - किसी चीज़ की आवश्यकता को अनुभव करना । यह आवश्यकता किसी की भी हो सकती है । शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है तो भूख लगती है । मन को मनोरंजन की भूख होती है । आर्थिक अभाव वाले को धन की भूख होती है । आध्यात्मिक व्यक्ति को आत्म-ज्ञान की भूख होती है । भूख का अनुभव होता है तो यह निश्चित है कि उस भूख को शान्त करने के लिए कोई न कोई भोज्य पदार्थ अवश्य उपलब्ध है । उसकी अनुपस्थिति में भूख का अनुभव हो ही नहीं सकता ।
          भूख के अनुभव से जो भोज्य पदार्थ ग्रहण किया जाता है उससे जीव को तुष्टि अर्थात् तृप्ति-सुख का अनुभव होता है । तुष्टि से पुष्टि होती है अर्थात् भोक्ता पुष्ट होता है । पुष्टि का अर्थ है जीवन में ऊर्जा का संचार । जब तुष्टि और पुष्टि का अनुभव हो जाता है तब भूख मिट जाती है अर्थात् क्षुधा निवृत्ति हो जाती है । यह क्षुधा निवृत्ति तब तक ही रहती है जब तक कि भोक्ता को तुष्टि और पुष्टि में किसी कमी का अनुभव नहीं हो । कमी का अनुभव होते ही भूख पुनः जाग्रत हो जाती है । भूख अन्य जीवों के लिए केवल शरीर को पुष्ट बनाए रखने का आधार मात्र है परन्तु मनुष्य की भूख का केवल एक मात्र यही कारण नहीं है । मनुष्य की भूख के कई कारण हो सकते है ।
           मनुष्य अपनी अनेकों प्रकार की भूख के कारण ही विभिन्न योनियों में भटकते हुए संसार-चक्र से बाहर निकल नहीं पा रहा है । स्वामीजी कहते हैं कि हमें भूख लगती है इसका अर्थ है कि इस भूख को शान्त करने के लिए कहीं न कहीं भोजन अवश्य ही है । यदि भोजन नहीं होता तो भूख भी नहीं होती । इसी प्रकार स्वयं को जानने की जिज्ञासा है तो उस जिज्ञासा को शान्त करने के लिए कहीं ज्ञान भी है । कहने का अर्थ है कि आप जानते तो हैं कि आप शरीर नहीं है बल्कि इस शरीर से भिन्न है परन्तु अज्ञानवश आप इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं । 
        क्या कारण है कि मनुष्य की यह भूख मिटती ही नहीं है ? भोजन मिल जाने पर भी इस शरीर की भूख सदैव के लिए शान्त क्यों नहीं होती, बार-बार  भोजन पाने की आवश्यकता क्यों रहती है ?  जब तक हमें भूख की प्रकृति का ज्ञान नहीं होगा, तब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाएगा । चलिए ! पहले मनुष्य की भूख को जानने का प्रयास करते हैं ।
          भूख दो प्रकार की होती है - सांसारिक और आध्यात्मिक । सांसारिक भूख जीव को विभिन्न योनियों में भटकाती है जबकि आध्यात्मिक भूख उसे मुक्त करती है । जब तक सांसारिक भूख से विमुखता नहीं होती तब तक आध्यात्मिक भूख का जाग्रत होना असम्भव है । दोनों भूख एक साथ जाग्रत नहीं रह सकती । प्रायः व्यक्ति दोनों भूख की बात करता अवश्य है परंतु वास्तव में वह आध्यात्मिक रूप से भूखा होने का केवल नाटक ही करता है । 
            सांसारिक भूख को शान्त करने के लिए भटकने वाला जीव कभी भी आध्यात्मिक नहीं हो सकता । हाँ, सांसारिक भूख की अवहेलना कर आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने की ललक सांसारिक भूख को एक सीमा तक शान्त अवश्य कर देती है ।
         सांसारिक भूख भी तीन प्रकार की होती है - शारीरिक (स्थूल शरीर की), मानसिक (सूक्ष्म शरीर की) और सामाजिक । शारीरिक भूख भी दो प्रकार की होती है - आवश्यकता मय भूख और वासनामय भूख । शरीर को ऊर्जायुक्त को बनाए रखने के लिए जो भूख पैदा होती है, वह आवश्यकता की भूख है । यह भूख भोजन के रूप में अन्न-जल ग्रहण करने पर एक बार के लिए शान्त हो जाती है । जब शरीर को पुनः ऊर्जा की आवश्यकता होती है तो यह भूख फिर जाग उठती है ।
           दूसरी शारीरिक भूख है, वासनामय भूख । यह स्पर्शजन्य भूख है । प्रथम बार किसी विषय के इंद्रिय-स्पर्श से सुख की जो अनुभूति होती है, जीव उसी सुख को बार-बार अनुभव करना चाहता है । इस प्रकार उसी सुख को पुनः प्राप्त करने की भूख  पैदा हो जाती है । चाहे कितनी ही बार इंद्रिय को विषय रूपी भोजन मिल जाए फिर भी यह भूख शान्त नहीं होती बल्कि प्रत्येक बार इसकी तीव्रता बढ़ती ही जाती है । इस प्रकार यह भूख जीवन में कभी भी शान्त नहीं हो पाती । यहाँ तक कि शरीर के क्षीण होते जाने पर भी यह भूख समाप्त नहीं होती । तब वह भूख शारीरिक स्तर को छोड़कर मानसिक स्तर पर स्थानांतरित हो जाती है । व्यक्ति जिस भोग को शरीर के स्तर पर भोग नहीं सकता, उसको वह अब मानसिक स्तर पर भोगने लग जाता है । इस प्रकार सांसारिक भूख शारीरिक से मानसिक भूख तक विस्तारित हो जाती है ।
         शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ है - त्वचा (स्पर्शेन्द्रिय), कान (श्रवणेन्द्रिय), नाक (घ्राणेंद्रिय), आँख (दर्शनेन्द्रिय) और जिह्वा (स्वादेन्द्रिय) । इनके पाँच विषय क्रमश इस प्रकार हैं - स्पर्श, शब्द, गंध, रूप और रस । विषय अपने से सम्बन्धित इंद्रिय के संपर्क में आता है, तब उस स्पर्श से उस विषय का ज्ञान होता है । उस ज्ञान से जीव को सुख या दुःख का अनुभव होता है । जिस विषय से उसे सुख का अनुभव होता है, उसे जीव बार-बार प्राप्त करना चाहता है और जिससे दुःख होता है उसकी उपेक्षा करना चाहता है । एक ही विषय कभी दुःख देता है और कभी सुख । इसी सुख-दुःख से राग - द्वेष पैदा होते हैं ।
            सुख-दुःख का अनुभव होना उस विषय की मात्रा, समय, परिस्थिति और स्थान आदि पर निर्भर करता है । जैसे अपने विरोधी की आलोचना जब सुनते हैं तो सुख का अनुभव होता है और प्रियजन की आलोचना सुनने पर दुःख का । मिष्ठान्न कम मात्रा में जो रस प्रधान करता है, अत्यधिक मात्रा में उपभोग करने पर वह दुःखी करता है । राग-रंग, संगीत आदि विवाह समारोह में तो सुख देते हैं परन्तु शोक की अवस्था में उन्हें देखकर ही उपेक्षा का भाव पैदा होता है ।
        इंद्रिय सुख को प्राप्त करने में पाँच कर्मेन्द्रियाँ अपना सहयोग देती है । कर्मेन्द्रियों की सक्रियता सुख-दुःख के अनुभव पर निर्भर करती है । मूल बात यह है कि इंद्रिय-सुख की चाहना ही मनुष्य की वासनामय भूख को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाती है । 
          संसार के जितने भी सुख हैं, सब स्पर्शजन्य सुख है । मनुष्य शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । संयोग से जब कोई एक भी विषय इनसे स्पर्श करता है तब शरीर को एक प्रकार के सुख का अनुभव होता है । इस प्रकार प्रथम स्पर्श से होने वाले सुख को संयोगजन्य सुख कहा जाता है । इस स्पर्श-संयोग से अनुभव हुए सुख को हमारी इन्द्रियाँ बार-बार चाहने लगती है । इस बार-बार की चाहना को ही वासना कहा जाता है । इससे सिद्ध होता है कि  जीव की आवश्यकतामय भूख तो मिट सकती है परन्तु वासनामय भूख का मिटना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है ।
          राजा भृर्तहरि कहते हैं - 
           भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता:
                    तपो न तप्तं  वयमेव तप्ता: ।
           कालो न यातो वयमेव याता:
                    तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा: ।। वैराग्य शतक /7 ।।
अर्थात् भोगों को हमने नहीं भोगा बल्कि भोगों ने हमें ही भोग लिया । तपस्या हमने नहीं की बल्कि हम ख़ुद तप गए । काल अर्थात् समय कहीं नहीं गया बल्कि हम स्वयं ही चले गए । इतना होने के बाद भी मेरी कुछ पाने की तृष्णा जीर्ण नहीं हुई बल्कि हम स्वयं ही जीर्ण हो गए ।
         भागवतजी के नवम् स्कंध में राजा ययाति का प्रसंग आता है । दानवों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से उनका विवाह हुआ था । देवयानी के साथ पूर्व में हुई एक घटना के कारण दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा को विवश होकर देवयानी की दासी बनना पड़ा । भला एक पुरुष एक ही स्त्री से कब संतुष्ट हुआ है, भले ही उसने प्रेम-विवाह ही क्यों न किया हो । जो सुख वस्तु/व्यक्ति के प्राप्त नहीं होने पर मिलता है वह सुख उसके प्रति हमारा आकर्षण होने के कारण है । उस वस्तु/व्यक्ति के मिल जाने पर वह सुख पहले जितना  नहीं रह जाता है । स्त्री/पुरुष का आकर्षण भी ऐसा ही है, जो सुख उनके न मिलने पर मिलता है, वह सुख उनके मिल जाने पर धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जाता है । वैसा ही सुख पुनः पाने के लिए पुरुष किसी दूसरी स्त्री के आकर्षण में फँस जाता है । ययाति भी ऐसे पुरुषों में से एक थे । शर्मिष्ठा के साथ भी एक दिन उनका सम्बन्ध बन ही गया ।
          देवयानी को जब इस अपवित्र सम्बन्ध के बारे में पता चला तो वह ययाति से रूठकर अपने पिता के पास चली गई । कामान्ध ययाति भी भला पीछे कहाँ रहने वाला था । ययाति पर दृष्टि पड़ते ही शुक्राचार्यजी ने उसे असमय ही बूढ़ा होने का श्राप दे डाला । ययाति का शरीर तत्काल ही वृद्ध हो गया । ययाति ने बड़ी अनुनय-विनय की और इससे देवयानी के सुख में आने वाली असामयिक बाधा से होने वाले अनिष्ट का वास्ता दिया । तब शुक्राचार्यजी ने कहा कि वह इस श्राप से मुक्त होने के लिए किसी भी व्यक्ति को अपनी वृद्धावस्था देकर उससे उसकी युवावस्था ले सकता है ।
         ययाति के पाँच पुत्र थे - यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पूरू । प्रथम चार पुत्रों ने ययाति की अनुचित माँग ठुकरा दी । सबसे छोटे पुत्र पूरू ने ययाति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और पिता से वृद्धावस्था लेकर उन्हें अपनी युवावस्था दे दी । पूरू जानता था कि यह शरीर मरणधर्मा है, इसको संसार की सेवा में लगा देना ही इसका सदुपयोग करना है ।
       पिता की कामना ने पुत्र को समय से पहले बूढ़ा कर दिया । पिता ययाति अपने पुत्र की युवावस्था पाकर कई वर्षों तक काम-सुख भोगता रहा, फिर भी उसको तृप्ति नहीं मिली । काम व्यक्ति को उम्रभर असंतुष्ट बनाए रखता है, संतुष्टि तो कामना रहित होने में है । यह तृप्ति मिलती है - त्याग से । भोग से भला कोई कभी तृप्त हुआ है ? ययाति की युवावस्था उधार की थी इसलिए कई वर्षों तक बनी रही परन्तु समय तो कभी रूकता नहीं, वह तो अपनी गति से भागता जाता है । ययाति युवा रहा परन्तु बढ़ती उम्र ने उसे कुछ सोचने को विवश कर दिया । उसे अपने किए पर बड़ी ग्लानि हुई । उसने देवयानी से अपने पतन की चर्चा की और भोगों से वैराग्य ले लिया । देवयानी से वे कहते हैं - 
        न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
        हविषा कृष्णवत् र्मेव भूय एवाभिवर्धते ।। 9/19/14 ।।
विषयों को भोगने से भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती । जिस प्रकार घी की आहुति डालने पर आग और अधिक भड़कती है, वैसे ही भोगों से भोगवासनाएँ और अधिक प्रबल होती है ।
         ययाति ने अपने असमय वृद्ध हुए पुत्र पूरू को उसकी युवावस्था लौटा दी और अपने चार बड़े पुत्रों में राज्य के विभिन्न भाग करके बाँट दिया । सबसे छोटे पुत्र पूरू ने चूँकि उनकी माँग को तत्काल पूरा किया था, उसे सभी संपत्तियां देते हुए अपने राज्य पर अभिषिक्त किया और वन में चले गए ।
       सामाजिक वर्जनाएँ और शारीरिक विवशताएँ भले ही पुरुष को स्त्री-भोग से रोक दें फिर भी रूप-रस को भोगने से वह कभी बाज़ नहीं आता । मनुष्य के जीवन की विडम्बना है कि वह विषय- भोग में आकण्ठ डूबा हुआ है । आज तक भोगों से कभी कोई तृप्त नहीं हुआ है । शरीर की आवश्यकता अनुसार भोज्य पदार्थ सभी को मिलते हैं परंतु जब आवश्यकता मय भूख वासना बन जाती है तब उसका अन्त नहीं आता । विषय-भोग ही जीवन में दुःख का कारण बनते हैं । विषयों की यह तृष्णा ही उसके दुःख का कारण है ।
       या दुस्त्यज्या दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते ।
       तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ।। भागवत - 9/19/16 ।।
      विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्ग़म स्थान है । मंदबुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से इसका त्याग कर सकते हैं । शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन होती जाती है । अतः जो कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र से शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिए ।
      प्रत्येक व्यक्ति यह बात जानता है, फिर भी भोगों से उसका वैराग्य नहीं हो पाता । इसीलिए अष्टावक्र महाराज राजा जनक को कहते हैं - 
        मुक्तिमिच्छासि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज ।
        क्षमार्जवदयातोषसत्यं पियूषवद् भज ।। अ.गी. -1/2।।
हे प्रिय ! यदि तू मुक्ति को चाहता है, तो विषयों को विष के समान त्याग दे और क्षमा, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत के सदृश सेवन कर ।            
       शरीर की वासनामय भूख मानसिक भूख है ।  यह वास्तव में स्थूल शरीर की भूख न होकर सूक्ष्म शरीर की भूख है । दोनों ही शरीरों की भूख में अधिक अंतर नहीं है । मन में किसी वस्तु अथवा पदार्थ और क्रिया के प्रति आसक्ति हो जाती है, तब मानसिक भूख तीव्र हो जाती है । अभी तक हमने काम-भोग की चर्चा की है । दूसरी वासनामय भूख, संग्रह की भूख है । काम-भोग के बाद इस वासनामय भूख का दूसरा उदाहरण धन का संग्रह करना है । धन का संग्रह करने वाला धन का उपयोग कर ही नहीं सकता । धन कमाना अनुचित नहीं है बल्कि धन को महत्वपूर्ण मानकर केवल उसका संग्रह करने लग जाना अनुचित है । धन की आवश्यकता सबको रहती है । आवश्यकतानुसार उपयोग कर शेष धन का सदुपयोग करते हुए उसे सद्कार्यों में लगा देना उचित है । ऐसा करने से धन के संग्रह की भूख समाप्त हो जाती है । 
           विषय-भोग स्थूल शरीर के स्तर पर भोगा जाता है । उस भोग से मिले सुख-दुःख का अनुभव सूक्ष्म शरीर को होता है । जब स्थूल देह मरती है तब सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर का त्याग कर देता है, फिर स्थूल शरीर को किसी प्रकार के सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता । विषय-भोग से मिले सुख-दुःख का अंकन सूक्ष्म शरीर में ही होता है । इसी के आधार पर सूक्ष्म शरीर में ही अधिक भोग मिलने की कामना (वासना), विषय के प्रति आसक्ति, व्यक्ति के प्रति ममता, स्थान आदि के प्रति मोह, धन को संग्रहित करने की प्रवृति आदि पैदा होते हैं । ये सभी सूक्ष्म शरीर में संग्रहित होते रहते हैं । इन्हीं के कारण व्यक्ति विभिन्न शरीर लेता-त्यागता रहता है । 
           मुख्य रूप से हम धन के संग्रह की प्रवृति को ही सूक्ष्म शरीर की भूख कहते हैं । धन कमाना अनुचित नहीं है क्योंकि धन से ही हम स्थूल शरीर की आवश्यकता पूरी करते हैं । जीवन की दो वास्तविकताओं को जानते हुए भी हम उनसे अनजान बने रहते हैं । पहली वास्तविकता - इस जीवन में स्थूल धन का जितना भी संग्रह किया है, उसको शरीर छोड़ने पर कोई भी अपने साथ नहीं ले जा सकता । हम भलीभाँति जानते हैं कि जितना धन हमने अर्जित कर संग्रहित कर लिया है, वह हमारे पूरे जीवन के लिए पर्याप्त है, फिर भी हम ‘और अधिक, और अधिक’ की रट लगाते रहते हैं । दूसरी वास्तविकता -  धन से केवल पदार्थ ही क्रय किए जा सकते हैं जिनकी व्यवस्था कर्म-सिद्धान्त के अनुसार परमात्मा ने जन्म से पूर्व ही निश्चित कर रखी है । उस प्रारब्ध से न तो रत्ती भर कम मिलना है न ही अधिक । फिर भी हम जीवन भर धन कमाने और उसको संग्रहित करने में लगे हैं । यह मानसिक भूख नहीं है तो और क्या है ? 
          मन सूक्ष्म शरीर का मुख्य अंग है, जो हमें चौरासी के चक्कर में डाले रखता है, उससे बाहर निकलने नहीं देता । इसीलिए संग्रह की भूख को सूक्ष्म शरीर की भूख कहा गया है । 
           धन के लोभी व्यक्ति के मन में धन अपना विशेष स्थान बना लेता है जिससे वह उसका कितना ही संग्रह करले फिर भी भूखा का भूखा ही रह जाता है । वास्तव में धन के त्याग से जो सुख मिलता है, वह धन के संग्रह से नहीं मिलता । स्वामीजी कहते हैं कि किसी वस्तु के आकर्षण से जो सुख मिलता है, वह उस वस्तु के ज्ञान से नहीं मिलता - यह सिद्धांत है । धन के आकर्षण ( लोभ) से जो सुख मिलता है, वह धन के ज्ञान से नहीं मिलता ।
          वासनामय भूख जब विस्तार पाती है तो मन तक अपना फैलाव कर लेती है । शरीर जब किसी विषय विशेष के प्रति आसक्त होकर क्रिया को करने में असहाय हो जाता है तब व्यक्ति मन में उसी विषय से सुख भोगने के लिए क्रिया (चिन्तन) करने लगता है अर्थात् मन के माध्यम से वह उस क्रिया का सुख लेता रहता है । उस क्रिया से मानसिक सुख तो मिल सकता है परंतु भूख नहीं मिट सकती ।
           शारीरिक भोग की तरह ही मानसिक भोग से भी व्यक्ति कभी तृप्त नहीं हो सकता क्योंकि संसार की वस्तुएँ चाहे स्थूल रूप में हो अथवा काल्पनिक रूप में, भोग के लिए बनी ही नहीं है, वे तो केवल उपयोग के लिए है । जितनी आवश्यकता है, केवल उतनी का ही उपयोग करेंगे तो भूख कभी विस्तारित नहीं होगी ।
          शास्त्रों में शारीरिक भोग से भी मानसिक भोग को अधिक पतन करने वाला बताया है । शारीरिक रूप से तो किसी एक विषय का भोग कर आप कुछ समय के लिए शान्त हो जाते हैं परंतु मानसिक भोग को आप अनिश्चित काल तक सतत भोगते हुए अशान्त बने रहते हैं । शारीरिक भूख को मिटाने के लिए आप इंद्रियों के माध्यम से विषय-भोग करते हुए रस लेते हैं परन्तु मानसिक भूख में आपके सामने विषय नहीं होता, फिर भी आप उसका रस लेते रहते हैं । गीता में भगवान ने कहा है कि इंद्रियों को विषयों से हटाने वाले मनुष्य के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता अर्थात् उसकी शरीर और संसार में रसबुद्धि बनी रहती है । (गीता-2/59) । इस प्रकार कहा जा सकता है कि शारीरिक भूख से मानसिक भूख अधिक उग्र और विनाशकारी होती है । 
     अब बात करते हैं, सामाजिक भूख की । भोग और संग्रह के पश्चात् बात आती है, सामाजिक मान-सम्मान की । भोग स्थूल शरीर की भूख है, संग्रह सूक्ष्म शरीर की भूख है और मान-सम्मान की चाह रखना सामाजिक भूख है । जब व्यक्ति के पास संग्रह अधिक हो जाता है, तब वह चाहता है कि समाज में उसकी प्रतिष्ठा हो, समाज से उसे मान-सम्मान मिले, समाज उसकी प्रशंसा करे । प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और प्रशंसा की चाह रखना सबसे बड़ा और ख़तरनाक ज़हर है । सामाजिक भूख को शान्त करने के लिए व्यक्ति भोग और संग्रह से कभी भी मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि ये एक दूसरे के पूरक हैं । सामाजिक स्तर पर इतनी अधिक प्रतिस्पर्धा है कि अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के प्रयास में व्यक्ति कोल्हू का बैल बन जाता है ।
         इस प्रकार सांसारिक भूख के बारे में हमने अल्प रूप से चर्चा की । सांसारिक भूख कंचन, कामिनी और कीर्ति की भूख है । कंचन के संग्रह में लग जाना मानसिक भूख है । कामिनी को भोगने अर्थात् शरीर के सुख की कामना के कारण यह शारीरिक भूख है । कीर्ति की कामना रखना सामाजिक भूख है । कंचन, कामिनी और कीर्ति की भूख तब तक शान्त नहीं हो सकती जब तक हम इस संसार को महत्व देते रहेंगे । संसार दिखता अवश्य है परंतु वास्तव में वह है नहीं । इसी प्रकार कंचन, कामिनी और कीर्ति हमें आकर्षित करती अवश्य है परन्तु उनका अस्तित्व नहीं है, वे स्थाई नहीं है । कंचन अर्थात् धन आने-जाने वाला है, कामिनी का यौवन भी एक दिन ढल जाने वाला है और कीर्ति भी सदैव के लिए नहीं रहेगी ।
          सांसारिक भूख के बाद बात करते हैं आध्यात्मिक भूख की । अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर  मनुष्य ने अहम् के कारण एक अलग संसार  बना लिया है, जिसमें आसक्त होकर उसमें फँस गया है । इससे मुक्त होने के लिए उसके भीतर जो छटपटाहट होती है, वह उसकी आध्यात्मिक भूख है । संसार अपरा प्रकृति है और जीव परा प्रकृति के अन्तर्गत है । संसार क्षर है, जीव अक्षर है । क्षर से मुक्त होने के लिए अक्षर अर्थात् जीव की प्रकृति (परा प्रकृति) का ज्ञान होना आवश्यक है । अध्यात्म का यही अर्थ है कि जीव अपने स्वभाव को जाने । अक्षर जीव उस अक्षर परमात्मा का अंश है जिसे उत्तम पुरुष कहा जाता है । स्वयं को जानने के लिए हमें संसार से अपने आपको अलग करना होगा । संसार से अलग होने के लिए अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना होगा तभी हम अहम् से स्वरूप तक पहुंचेंगे । इस प्रकार मनुष्य जीवन की यह आध्यात्मिक भूख उसकी ‘स्वभाव से स्वरूप तक’ की यात्रा कराती है ।
            सांसारिक भूख और आध्यात्मिक भूख, दोनों ही भूख हैं, फिर इनमें अंतर क्या है ? सांसारिक भूख को जितना हम मिटाने की कोशिश करते हैं, वह उतनी ही अधिक भड़कती है । सांसारिक भूख के कारण जीवन अशांति से घिरा रहता है । आध्यात्मिक भूख का पहले तो जाग्रत होना कठिन है और जब जाग्रत हो जाती है तब जीवन में शांति का अवतरण होने लगता है । आध्यात्मिक भूख ऐसी भूख है जिसको मिटाने के प्रयास मात्र से ही जीवन में संतुष्टि का अनुभव होने लगता है । सांसारिक भूख के लिए कितने ही प्रयास कर लें वह आपको सदैव असंतुष्ट ही बनाए रखती है । सांसारिक भूख संसार के भोजन को चाहती है और आध्यात्मिक भूख परमात्मा के भजन को ।
             संसार की भूख के लिए “और, और, और अधिक” की चाह बढ़ती ही जाती है ।  कितना भी कर लो, इस ‘और’ का अन्त कभी नहीं आता । यह ‘और-और’ ही असंतुष्टि है । जीव जब इस ‘और-और’ की उपेक्षा करने लगता है, तब जाकर इस ‘और’ की लालसा धीरे-धीरे कम होने लगती है । जितनी सांसारिक भूख कम होगी उतनी ही आध्यात्मिकता की तरफ़ उन्मुखता होगी । इस प्रकार कहा जा सकता है कि सांसारिक भूख से विमुखता ही आध्यात्मिक भूख की जागृति का आधार है ।
          संसार की भटकन और अशांति से मुक्ति तभी मिल सकती है, जब इस बात की स्वीकारोक्ति हो जाए कि सांसारिक भूख कभी मिट नहीं सकती । इसी स्वीकारोक्ति के साथ ही व्यक्ति की आध्यात्मिक भूख जाग्रत हो जाती है । विषयों से एक बार का मिला सुख ही सांसारिक भूख के मूल में है । प्रत्येक विषय-सुख एक दिन आपको दुःखी करेगा ही, यह सत्य बात है । दुःखी होने पर हम फिर उसी सांसारिक सुख की चाहना करने लगते हैं, जिसकी परिणीति दुःख में हुई है । यही हमारी सबसे बड़ी भूल है । हमें यह समझना होगा कि जीवन में दुःख का आगमन होता ही इसीलिए है कि हम संसार से विमुख हो जाएं । जो इस रहस्य को जान जाता है वह संसार में रहते हुए भी वीतरागता को प्राप्त हो जाता है ।
              संसार से हुआ वैराग्य ही आध्यात्मिकता की राह खोलता है । वैराग्य से संसार की भूख मिट जाती है और आध्यात्मिक भूख जग जाती है । संसार से हुआ वैराग्य पुनः राग में परिवर्तित नहीं हो जाए, इस बारे में सबको सदैव सचेत रहना आवश्यक है ।
          आध्यात्मिक भूख ज्ञान से मिटती है । इस भूख के मिटते ही संसार तिरोहित हो जाता है और केवल परमात्मा शेष रह जाते हैं । एक परमात्मा के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है । “वासुदेव सर्वम्” का बोध ही अध्यात्म का लक्ष्य है । आध्यात्मिक भूख की समाप्ति आत्म-बोध के साथ होती है । इस अवस्था को उपलब्ध होते ही व्यक्ति सच्चिदानन्द स्वरूप को पा लेता है ।
          सांसारिक भूख मिटती नहीं है, ऐसे में आध्यात्मिक भूख को जाग्रत कैसे किया जा सकता है ? उत्तर छोटा सा भी और सरल सा भी -  ' संसार से अलग होकर' । जब तक संसार के साथ सम्बन्ध है तब तक भोग और संग्रह से मुक्ति मिलनी असंभव है । इनके कारण षट् विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर अर्थात् ईर्ष्या) उत्पन्न होते है जो व्यक्ति के जीवन को अव्यवस्थित कर देते हैं । संसार की ओर से दृष्टि हटाते ही विकार मिटने लगते हैं । इसके लिए या तो हमें संसार से सम्बन्ध तोड़ना है या परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ना है । एक काम करते ही दूसरा काम स्वतः हो जाता है ।
           हम संसार में आसक्त होकर अपने आप को भूल गए हैं । संसार दिखता अवश्य है पर वह स्थाई नहीं है । इसमें इतनी मन्द गति से परिवर्तन होता है कि हम इसको ही स्थाई मान बैठते हैं । जब तक हमें होश आता है, तब तक हमारे पास न तो समय रहता है और न ही शक्ति । सत्संग हमें इस बात का अनुभव कराता है, जिससे हम समय और शक्ति के शेष रहते संभल जायें । अतः जहां भी सत्संग मिले, उसका लाभ अवश्य ही लें ।
        आध्यात्मिक भूख जाग्रत करने के लिए हमें संसार से अलग होना होगा, इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार छोड़ कर कहीं पलायन कर जायें । गीता में भगवान कहते हैं कि जैसे कमल के पत्ते, जल में रहते हुए भी जल से लिप्त नहीं होते (पद्मपत्रमिवाम्भसा-5/10), वैसे ही हमें संसार में रहते हुए उसमें लिप्त होकर प्रभावित नहीं होना है । इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए सतत स्वाध्याय और सत्संग करना चाहिए ।
          श्रीमद् भागवत महापुराण में नौ योगीश्वरों की कथा आती है । वसुदेवजी को यह कथा नारदजी सुना रहे हैं जिसमें राजा निमि और नौ योगीश्वरों का संवाद है । राजा निमि को आध्यात्मिक भूख है । निमि प्रश्न पूछते हैं कि परम कल्याण का स्वरूप क्या है ? और उसका साधन क्या है ? तब उनमें से एक योगीश्वर कविजी सांसारिक और आध्यात्मिक भूख की तुलना करते हुए इस प्रश्न का उत्तर देते हैं - 
भक्ति: परेशानुभवो विरक्ति-
        रन्यत्र चैष त्रिक एककाल: ।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नत: स्यु-
        स्तुष्टि: पुष्टि: क्षुदपायोऽनुघासम् ।।भागवत - 11/2/42 ।।
अर्थात् जैसे भोजन करनेवाले को प्रत्येक ग्रास के साथ तुष्टि (तृप्ति अथवा सुख), पुष्टि (जीवनशक्ति का संचार) और क्षुधा- निवृत्ति - ये तीनों एक साथ होते जाते हैं, वैसे ही जो मनुष्य भगवान की शरण लेकर उनका भजन करने लगता है, उसे भजन के प्रत्येक क्षण में भगवान के प्रति प्रेम, अपने स्वरूप का अनुभव और सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य - इन तीनों की एक साथ ही प्राप्ति होती जाती है ।
         इस प्रकार भागवतजी में भगवान की शरण में जाकर उनका भजन करने को सांसारिक भूख से निवृत्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन बताया है ।
         भागवतजी के पूर्ववर्णित श्लोक में दोनों ही भूख (सांसारिक और आध्यात्मिक) की तुलना की गई है । भक्ति की तुलना तुष्टि (संतुष्टि) से की जा सकती है क्योंकि दोनों ही आनन्द की अवस्था तक ले जाती है । शरीर की भूख को भोजन मिलने से सुख मिलता है उसी प्रकार आध्यात्मिक भूख में भजन (भक्ति) से आनन्द का अनुभव होता है । ईश्वर का अनुभव और पुष्टि (पोषण) समकक्ष कहे जा सकते हैं, क्योंकि दोनों ही जीवन को पोषित करते हैं - भोजन शारीरिक जीवन को और परमात्मा का अनुभव आध्यात्मिक जीवन को ।
         अंत में विरक्ति और क्षुधा-निवृत्ति की तुलना की जा सकती है क्योंकि दोनों ही व्यक्ति को और अधिक पाने की इच्छा (लालसा) से मुक्त करते हैं । भोजन करते समय व्यक्ति न केवल अन्य कार्यों में रुचि खो देता है अर्थात् उनसे विमुख हो जाता है बल्कि तुष्टि के अनुसार उस भोजन के प्रति उसकी रुचि उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है इसी प्रकार जो व्यक्ति आनंदघन परमात्मा का अनुभव कर रहा होता है उसे अन्य सांसारिक वस्तुओं में रुचि नहीं रहती जिससे ईश्वर के प्रति उसका अनुराग बढ़ता ही जाता है । 
          विरक्ति शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है । प्रायः हम विरक्ति और त्याग को समानार्थी ले लेते हैं परंतु ऐसा है नहीं । विरक्ति सांसारिक वस्तुओं से वैराग्य है जबकि त्याग में प्रत्येक आनंददायक वस्तु का उपयोग भगवान की सेवा में उचित रूप से किया जाता है ।
        अपने लिए जिस भी वस्तु/ व्यक्ति को स्वयं के लिए आनन्ददायक समझते हों, उसको भगवान की और भगवान के लिए मानकर उनको अर्पित करते हुए उनकी शरण में चले जाने का नाम ही भक्ति है । सांसारिक भूख मिटती नहीं है, यह सोचकर व्यथित नहीं होना है बल्कि परमात्मा की शरण लेकर संसार की सभी वस्तुओं को उन्हें अर्पित कर देना है । इससे भक्ति में तुष्टि, पुष्टि और क्षुधा-निवृत्ति; इन तीनों का एक साथ अनुभव हो जाता है । फिर संसार के प्रति आसक्ति ही परमात्मा के प्रति अनुरक्ति अर्थात् प्रेम में परिवर्तित हो जाती है । इससे आध्यात्मिक भूख बढ़ेगी, परन्तु वह भूख सांसारिक भूख की तरह हमें अशान्त नहीं करेगी ।
            सांसारिक भूख आसक्ति के कारण तीव्र से तीव्रतर होती जाती है जो जीवन में अशान्ति लाती है । आध्यात्मिक भूख में परमात्मा के भजन से उनके प्रति अनुरक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है, जिससे जीवन में शान्ति का आगमन होता है । 
       भागवतजी में शुकदेवजी महाराज परीक्षित को कहते है -
    अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी: ।
    तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुष परम् ।। 2/3/10 ।।
           जो बुद्धिमान पुरुष है - वह चाहे निष्काम हो, चाहे समस्त कामनाओं से युक्त हो अथवा केवल मोक्ष चाहता हो - उसे तीव्र भक्तियोग के द्वारा केवल पुरुषोत्तम भगवान की ही आराधना करनी चाहिए ।
              हम सब प्रकृति और शरीर के अधीन है क्योंकि हम इन्हीं में स्थित है । हम स्वाधीन हैं ही नहीं । ‘स्व’ के अधीन होते ही शरीर और संसार गौण हो जाते हैं । स्वाधीन होने के लिए हमें अपने भीतर झांकना होगा । मेरी इस बात पर मेरे मित्र प्रश्न कर बैठते हैं कि स्वयं के भीतर झांकना कैसे होगा ? उत्तर बहुत ही सरल है परंतु वैसे कर पाना बहुत कठिन । हम दूसरों के घर के भीतर तो झांकते है पर अपना घर देखते नहीं है । इसलिए दूसरों के भीतर झांकना बन्द कर दें और स्वयं के भीतर प्रवेश करें । 
           गंभीरता से देखें तो हम सब अपने अंदर से ही संचालित हो रहे हैं । स्वयं के भीतर उचित-अनुचित, सत्य-असत्य, सुख-दुःख के मध्य सदैव ही एक प्रकार का युद्ध छिड़ा है । हम तो एक दोलक की भाँति द्वंद्व से घिरे एक पक्ष से दूसरे पक्ष के मध्य दोलन करते रहते हैं । यदि हम इनमें से किसी एक पर ठहर सकते हैं तो दोलन बंद हो सकता है । किसी एक पर रूकने से पूर्व ख़्याल रखें कि सुख की चाह और दुःख को दूर करने की इच्छा से किए जाने वाले कर्म का स्रोत बाहर है, आपके भीतर नहीं । इस बात को अनुभव करें और स्वयं को इस बाह्य स्रोत से अलग कर लें, आप स्वतः ही स्वयं के भीतर प्रवेश कर जाएंगे ।
           सांसारिक भूख बाहर की भूख है और यह भूख कभी समाप्त नहीं होगी । इसके शान्त होने की प्रतीक्षा करेंगे तो भ्रम में ही रहेंगे क्योंकि यह कभी भी शान्त होने वाली नहीं है । इस भूख की तो उपेक्षा ही करनी पड़ेगी तभी आध्यात्मिक भूख जगेगी अन्यथा नहीं । इसके लिए बाहर संसार की ओर देखना बन्द कर दें और स्वयं के भीतर प्रवेश करें, तभी शान्ति का अनुभव होगा ।
         सांसारिक भूख वासना की भूख है, जबकि आध्यात्मिक भूख व्यक्ति की मुमुक्षा है । जब व्यक्ति के भीतर मुमुक्षा जाग्रत होती है, तब वह सांसारिक भूख और प्यास सब कुछ भूल जाता है । शारीरिक भूख और प्यास इस अनित्य शरीर से सम्बंधित है, इस भौतिक शरीर से सम्बंधित है जबकि आत्मिक भूख यानि मुमुक्षा आत्म-कल्याण से सम्बंधित है । सांसारिक भूख और प्यास आसक्ति (वासना) के अंतर्गत आती है जबकि आध्यात्मिक भूख (मुमुक्षा) परमात्मा से प्रेम (अनुरक्ति) का मार्ग है  । 
         सांसारिक भूख और प्यास के शांत होने पर शारीरिक और मानसिक सुख मिलता है परन्तु समय पाकर यह भूख पुनः जाग्रत हो उठती है और व्यक्ति पुनः दौड़ पड़ता है, बाहर इस संसार में, इसको शांत करने के लिए । मुमुक्षा को शांत करने के लिए मनुष्य को संसार को त्यागकर स्वयं के भीतर प्रवेश करना पड़ता है । मुमुक्षा  के शांत हो जाने पर मनुष्य को अतुलनीय आनन्द प्राप्त होता है । 
       हमें भूख होनी चाहिए आत्म-कल्याण की, शारीरिक सुख की नहीं । शारीरिक भूख को वरियता देने वाला भगवान से वरदान में भौतिक सुख सुविधाएँ ही मांगता है जबकि आत्म-कल्याण के लिए भूखा व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का वर मांगता है । सदैव स्मरण रहे  - जिसकी जैसी मांग होती है, परमात्मा उसको उसी अनुरूप देता है ।  
           लेख का समापन करने से पहले एक बार स्वामीजी की कही वह बात उद्धृत करना चाहूँगा, जिसके आधार पर यह लेख लिखना सम्भव हुआ है । स्वामीजी कहते है कि हमें नित्य की भूख होनी चाहिए अनित्य की नहीं । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जब तक हमें अनित्य की भूख है, तब तक नित्य की भूख जाग्रत नहीं हो सकती । अनित्य की भूख राग-द्वेष में उलझा देती है, जिससे वह शान्त होने के स्थान पर और अधिक उग्र हो जाती है । नित्य की भूख को जगाने के लिए हमें वीतरागी होना होगा । संसार से वैराग्य होने पर ही हमें नित्य का ज्ञान होगा ।
           प्रश्न उठता है कि नित्य क्या है और अनित्य क्या है ? स्वामीजी उत्तर देते हुए कहते हैं कि जो भी परिवर्तनशील है, वह सब अनित्य है । शरीर का गर्भ के रूप में बनना शुरू होने के साथ ही उसका मरना प्रारम्भ हो जाता है । सब कहते हैं कि हम जी रहे है, जबकि सत्य है कि हम प्रतिक्षण मर रहे हैं । हमारा मरना नित्य हो रहा है । जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होगा ही, यह निश्चित है । उत्पन्न होना अनित्य है और नष्ट होना नित्य है । पदार्थ और क्रिया उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं । उनका उत्पन्न होना अनित्य है जबकि नष्ट होना नित्य है । पदार्थ और विषयों का संयोग अनित्य है  क्योंकि इनका संयोग होगा ही, कहा नहीं जा सकता परंतु इनका वियोग होना नित्य है क्योंकि संयोग का वियोग होगा ही, यह निश्चित है । इसी प्रकार हमें बड़ाई, मान, सम्मान मिलेगा ही यह निश्चित नहीं है इसलिए ये सब भी अनित्य है ।
            हमारी कामना, कर्म, राग-द्वेष, बड़ाई, मान-सम्मान आदि सब अनित्य हैं । संसार मिटने वाला है, इसलिए यह अनित्य है, इसको नित्य न मानें । हम (स्वरूप) और परमात्मा सदा रहने वाले हैं, अतः केवल इनको ही नित्य मानें । अनित्य को अनित्य मानते ही उसकी भूख (सांसारिक भूख) मिट जाती है और नित्य की भूख (आध्यात्मिक भूख) जाग्रत हो जाती है ।
सार-संक्षेप 
              इंद्रिय के विषय-संयोग से जो स्पर्शजन्य सुख मिलता है उससे ही भूख पैदा होती है । यह अंतहीन भूख है, यह सांसारिक भूख है । इस अंतहीन भूख से जीवन में अशान्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता । इस भूख से तो विमुख ही होना पड़ेगा, चाहे आज हो जाएं चाहे कल । इस विमुखता से भूख का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है । अब यह भूख आध्यात्मिक भूख बन जाती है, स्वयं को जानने की भूख । यही भूख आपको परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ।
         भूख चाहे सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक, दोनों ही प्रकार की भूख को भोजन की आवश्यकता होती है । सांसारिक भूख का भोजन है - संसार के पदार्थ । आध्यात्मिक भूख का भोजन है - परमात्मा का भजन, उसकी भक्ति । दोनों भूख में एक ही अंतर है कि सांसारिक भूख में सुख की इच्छा होने के कारण जीवनभर असंतुष्टि और अशान्ति बनी रहती है जबकि आध्यात्मिक भूख में सभी इच्छाओं के त्याग कर देने से वह भूख जीवन को संतुष्टि और शान्ति प्रदान करती है । इसी शान्ति का नाम आनन्द है । ऐसे आनन्द को उपलब्ध होने के लिए हमें प्रकृति में स्थित बने रहने से हटकर ‘स्व’ में स्थित होना होगा ।
            जब तक प्रकृति और शरीर में स्वयं को स्थित होना मानते रहेंगे, तब तक आध्यात्मिक भूख जाग्रत नहीं होगी और न ही सांसारिक भूख स्थाई रूप से कभी शान्त होगी । इसके लिए स्वयं को शरीरस्थ/प्रकृतिस्थ न मानकर ‘स्व’ में स्थित (स्वस्थ) मानें । ऐसा मानना तनिक कठिन लगे तो कम से कम संसार में रहते हुए संसार से दृष्टि हटाकर अपने स्वरूप पर दृष्टि जमाए रखें । इतने प्रयास से ही आप स्वरूप तक पहुँचकर ‘स्व’ में स्थित हो सकते है । इस अवस्था को स्वस्थ हो जाना कहते हैं । 
।। हरिः शरणम् ।।
डॉ. प्रकाश काछवाल

Saturday, July 26, 2025

एकान्त

 एकान्त  

    एकांत और अकेलापन, दोनों एक से प्रतीत होते हुए भी भिन्न हैं । एकांत में मनुष्य व्याकुल नहीं होता परन्तु अकेलापन उसे काट खाने को दौड़ता है । एकांत में एक का भी अन्त हो जाता है, ऐसे में व्यथित कौन हो ? चंचल मन अकेलेपन में सहारे के लिए किसी दूसरे को ढूँढता है जबकि शान्त मन अकेला होने की अवस्था में स्वयं में ही खो जाता है । यही एक का अन्त अर्थात् एकान्त है जहां न कोई विचार है और न ही चिन्तन।

     प्रत्येक प्रकार के चिन्तन से मुक्त होने के लिए मौन होना आवश्यक है, मौन बाहर से भी और भीतर से भी । फिर जो द्रष्टा-भाव पैदा होता है, वही आपको परमात्मा तक ले जाता है । इसी के अनुभव के लिए लेखन से अवकाश ले रहा हूँ । कब तक ? कह नहीं सकता, आगे हरि इच्छा ।

।। हरिः शरणम्।।

Friday, July 25, 2025

यथेच्छसि तथा कुरु

 कर्म-स्वतंत्रता

         संसार में जितने भी जीव है, वे सब पूर्व मानव जीवन में किए गए कर्मों का फल भोगने के लिए ही शरीर धारण किए हुए है । वे अपनी इच्छा से कोई कर्म कर ही नहीं सकते । कई बार हमें लगता है कि कोई पशु अपनी इच्छा से किसी मनुष्य को लात मार रहा है, कोई किसी दूसरे प्राणी को काट रहा है आदि, परंतु ऐसा करना उसकी इच्छा पर तनिक भी निर्भर नहीं है । ऐसा जो भी वह करता है, सब पूर्व मनुष्य जीवन के कर्मों से बने प्रारब्ध के कारण ही करता है । मनुष्य भी इसी प्रकार प्रारब्ध के अधीन होकर बहुत कुछ करता है परन्तु साथ ही उसे अन्य प्राणियों के विपरीत अपनी इच्छा से कर्म करने की स्वतंत्रता भी है ।

    अपनी इच्छा से कर्म करने की स्वतंत्रता मनुष्य को नहीं मिलती तो एक दिन इस संसार कि गति रुक जाती क्योंकि इच्छा से किए गए कर्म जिनका फल उस जीवन में नहीं मिल पाता, वे ही प्रारब्ध बनकर दूसरे शरीर में जाकर फल देते हैं । मनुष्य जीवन में स्वेच्छा से कर्म करने की स्वतंत्रता से ही चौरासी लाख योनियों में जीव का आवागमन सतत निर्बाध गति से चलता रहता है ।

        यह तो हुआ कर्म स्वतंत्रता का एक पहलू । दूसरी ओर देखें और विचार करें तो अनुभव होता है कि मनुष्य इस कर्म-स्वतंत्रता का सदुपयोग कर अपने मूल स्वरूप तक पहुँचकर सांसारिक आवागमन से मुक्त भी हो सकता है । परंतु ऐसा करना किसी-किसी मनुष्य के लिए ही संभव हो सकता है अन्यथा तो अधिकतर तो संसार के चक्कर में पड़कर अनेक जन्मों में विभिन्न प्राणियों के शरीर धारण करते हुए सुख-दुःख भोगते रहते हैं । परमात्मा ने मनुष्य को रचते ही उसे कर्म-स्वतंत्रता देते हुए कह दिया - ' जैसी तुम्हारी इच्छा, वैसे ही करो'  अर्थात् ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ ।

       भगवान ने इस सृष्टि का सृजन किया । प्रकृति के गुणों से होने वाली विभिन्न क्रियाओं से एक-एक कर बहुत प्रकार के पदार्थ बने । सभी पदार्थ अपने भीतर चल रही विभिन्न क्रियाओं से बनते रहे, बिगड़ते रहे । परमात्मा ने उन पदार्थों में से कुछ में जीवन देकर उन्हें जीव बना दिया । फिर भी उनके बनने-बिगड़ने की आवृति में कोई परिवर्तन नहीं आया । अंततः उन्होंने अपनी माया से मनुष्य नाम का जीव बनाया और उसे केवल प्राकृतिक क्रियाओं के भरोसे ही नहीं छोड़ा बल्कि उसे अपनी इच्छानुसार क्रियाओं को परिवर्तित करने की क्षमता भी दे दी । यही क्रियाएँ उसके द्वारा किए जाने वाले कर्म कहलाती हैं । अपनी इच्छानुसार की जाने वाली क्रियाओं के कारण उसे जो स्वतंत्रता मिली है, उसे ही कर्म-स्वतंत्रता कहते हैं ।

          मनुष्य की यह कर्म-स्वतंत्रता उसे भोग की ओर भी ले जा सकती है और योग की ओर भी । कर्म स्वतंत्रता का सदुपयोग कर मनुष्य आत्म-बोध को उपलब्ध हो अपने मूल स्वरूप को पा सकता है । उसका मूल स्वरूप है - सच्चिदानन्द अर्थात् वह सत्य है, चैतन्य भी है और सदैव आनंद की अवस्था में रहने वाला भी है ।  प्रश्न है, क्या मनुष्य ने अपनी कर्म-स्वतंत्रता का उपयोग आत्म-बोध के लिए किया है ? जिसने अपनी इस स्वतंत्रता का इस प्रकार सदुपयोग किया है, वह अपने मूल स्वरूप तक पहुँचकर सांसारिक आवागमन से मुक्त  है ।

          प्रश्न है कि इस कर्म-स्वतंत्रता का उपयोग मनुष्य किस प्रकार कर सकता है ? एक दृष्टांत के माध्यम से चर्चा को आगे बढ़ाते हैं ।

              एक मूर्तिकार ने मनुष्य की एक समान तीन मूर्तियां बनाई और उन्हें प्रदर्शन के लिए रखा । तीनों मूर्तियाँ एक ही वजन की, एक जैसी दिखाई देने वाली थी, कहीं कोई रत्ती भर भी अंतर नहीं । प्रदर्शन में कलाकार द्वारा सब दर्शकों से एक ही प्रश्न पूछा - ‘ इन तीनों में से कौन सी मूर्ति सबसे अधिक क़ीमती है ?”  उत्तर देने का इच्छुक दर्शक एक-एक कर तीनों मूर्तियों के पास जाता, उनका गंभीरता से अवलोकन करता और वापस लौट जाता क्योंकि उसे तीनों में जरा सा अंतर भी नज़र नहीं आता । ऐसे में भला क़ीमत का आकलन कैसे हो पाता ? 

               एक-एक कर सभी दर्शक उन तीनों में से किसी एक क़ीमती मूर्ति को छाँटने में असफल रहे । तभी प्रदर्शनी में एक बुद्धिमान दर्शक ने प्रवेश किया । उस दर्शक से भी मूर्तिकार ने वही प्रश्न किया - “ इन तीनों मूर्तियों में से कौन सी मूर्ति सबसे क़ीमती है ?” बुद्धिमान दर्शक ने एक पल के लिए तीनों मूर्तियों को निहारा । सचमुच सभी मूर्तियाँ दिखने में एक समान थी । उनमें से किसी एक मूर्ति को सर्वश्रेष्ठ बताना वाक़ई बड़ा मुश्किल था ।

         उस दर्शक ने एक तिनका उठाया और पहली मूर्ति के एक कान में डाला । रास्ता बंद होने के कारण तिनका आगे नहीं बढ़ा । फिर तिनके को दूसरे कान में डाला । तिनका जरा सा भी आगे नहीं बढ़ा क्योंकि वहाँ भी आगे रास्ता बंद था । उसके बाद उसने उसी तिनके को दूसरी मूर्ति के कान में डाला । तिनके को आगे बढ़ने का रास्ता मिला । आगे बढ़ते-बढ़ते वह तिनका दूसरे कान के पार हो गया । अब उस दर्शक ने तीसरी मूर्ति के कान में तिनका डाला । तिनके को रास्ता मिलता गया और वह आगे बढ़ता गया । इस प्रकार पूरा तिनका उस एक मूर्ति के भीतर प्रवेश कर गया । दर्शक ने मूर्तिकार से कहा कि यह तीसरी मूर्ति सबसे क़ीमती है ।

           बाहर से एक समान दिखाई देने वाली मनुष्य की मूर्तियाँ भी भीतर से भिन्न-भिन्न हो सकती है, यह एक मूर्तिकार की कल्पना है । सोचिए ! उस महान सृजनकर्ता की कल्पना कितनी अद्वितीय होगी जिसने जीता-जागता मनुष्य बनाया, इस बात पर किसी प्रकार की कोई शंका नहीं की जा सकती । 

          मूर्तिकार द्वारा बनाई गई मनुष्य की तीन मूर्तियों की तरह परमात्मा की सर्वोत्तम कृति मानव भी तीन प्रकार के हैं । प्रथम प्रकार के मानव तो अपनी इच्छा से ही सब कुछ करते हैं, किसी की सुनते तक नहीं हैं । दूसरी प्रकार के वे मनुष्य हैं जो सुनते तो सबकी है परंतु उनका करना अपनी सोच के अनुसार ही होता है अर्थात् वे एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से बाहर निकाल देते हैं । वे सुने हुए पर तनिक सा भी विचार नहीं करते । तीसरे प्रकार के मनुष्य विशिष्ट होते हैं । वे ध्यान से सब कुछ सुनते हैं, उस पर विचार करते हैं और फिर उचित निर्णय लेकर अपनी इच्छा से ही सब कुछ करते हैं ।

         तीनों प्रकार के मनुष्य एक समान हैं, तीनों करते भी अपनी इच्छानुसार ही हैं फिर भी तीनों के करने में भिन्नता है और उनके परिणाम भी उन्हें भिन्न-भिन्न मिलते हैं । इससे सिद्ध होता है कि जिस इच्छा से कर्म किए जाते हैं और जैसी करने वाले की क्षमता होती है, इन दोनों बातों के एक समान होते हुए भी कर्म का प्रकार और उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होकर व्यक्ति के जीवन को बहुत प्रभावित करते हैं । हम इन तीनों में से मनुष्य की जिस श्रेणी में आते हैं, हमारा जीवन भी उसी प्रकार का होगा ।

            अर्जुन कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में युद्ध करने अथवा न करने के द्वंद्व में फँसकर विषादग्रस्त हो गया था । इसी उहापोह में उसे युद्ध न करना ही युक्तिसंगत प्रतीत होने लगा था । वह कुरुक्षेत्र के युद्ध से पलायन करता, इससे पहले ही भगवान श्रीकृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा - “अर्जुन ! तुम यह क्या करने जा रहे हो ? युद्ध से पलायन करने का परिणाम जानते हो ? एक क्षत्रिय होकर युद्ध-भूमि में आकर नपुंसक जैसा व्यवहार कैसे कर रहे हो ?”

             भगवान के इसी कटाक्ष ने अर्जुन को भीतर तक बींध दिया । भगवान के द्वारा कहे गए इन शब्दों ने अर्जुन को बहुत कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया । “नहीं, मैं नपुंसक नहीं हूँ । नपुंसक नहीं हूँ तो फिर मेरे मस्तिष्क में युद्ध से पलायन करने का विचार ही क्यों आया ? ओह ! मेरे पितामह, मेरे गुरु, मेरे भाई, मेरे सम्बन्धी सब मेरे विरुद्ध युद्ध करने को तैयार है । मैं नपुंसक नहीं हूँ, इसका अर्थ यह तो नहीं है कि मैं अपने प्रियजनों को ही मार डालूँ । नहीं, मैं मेरे प्रियजनों को भूमि के एक टुकड़े को पाने के लिए मार नहीं सकता ।”

              मनुष्य के जीवन में विषाद की अवस्था तभी आती है जब वह जो कुछ करना चाहता है, वैसा चाह कर भी नहीं कर पाता । द्वंद्व की इस अवस्था में उसके द्वारा लिए गए निर्णय प्रायः परिस्थिति के प्रतिकूल (विपरीत)  ही होते हैं । ऐसे समय में किसी मार्गदर्शक का साथ मिल जाए तो व्यक्ति विषाद की अवस्था से बाहर आ सकता है । अर्जुन को साथ मिला भगवान श्रीकृष्ण का, वे उसके सारथी जो थे । 

                  विषादग्रस्त अर्जुन ने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान की ओर देखा और कहा - “यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् । मेरे लिये जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह कहिए । मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण हूँ, इसलिए मुझे शिक्षा दीजिए ।”

             अर्जुन ने भगवान से शिक्षा मांगी, ज्ञान चाहा । फिर श्रीकृष्ण के मुख से जो ज्ञान का अविरल प्रवाह उस युद्ध भूमि पर हुआ वैसा इतिहास में आज तक कहीं और कभी नहीं हुआ । शरीर के जन्मने- मरने से प्रारंभ हुआ ज्ञान कर्म, ध्यान, भक्ति आदि को स्पष्ट करते हुए अपनी सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच गया । बीच-बीच में भगवान से अर्जुन प्रश्न कर अपनी शंकाएँ उठाते रहे और श्रीकृष्ण उनके उत्तर देते रहे । अंततः अर्जुन को गुह्य से गुह्यतर ज्ञान मिल गया । 

          ज्ञान का समापन करते हुए भगवान ने अर्जुन को कहा - 

   इति ते ज्ञान माख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं मया ।

   विमृश्यैतदशेषेण  यथेच्छसि तथा कुरु ।। गीता -18/63।।

        हे अर्जुन ! क्या तूने गूढ़ से भी गूढ़ ज्ञान का ध्यानपूर्वक और एकाग्रता से श्रवण किया है ? क्या तेरा मोहजनित अज्ञान नष्ट हो गया है ? क्या तुझे स्मृति प्राप्त हो गई है ? यदि यह सब हुआ है तो तू इस पर विचार कर और जो तुझे उचित लगे वह कर - ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ ।

           अर्जुन भगवान को कहते हैं कि  “यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् । मेरे लिये जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह कहिए ।” (गीता -2/7) । बहुत सा ज्ञान देने के उपरांत भगवान अब कह रहे हैं - “यथेच्छसि तथा कुरु” अर्थात् जो उचित लगे, वह कर ।(गीता -18/63) । भगवान ने इतने रास्ते बताकर फिर से अर्जुन को द्वंद्वात्मक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया । ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ तो वे ज्ञान देने से पहले भी कह सकते थे और रथ छोड़ द्वारिका चले जाते । परंतु नहीं, उन्होंने पहले कल्याण के सभी रास्ते बताए और फिर अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता अर्जुन को दे दी । 

           पहले से ही अर्जुन कुरुक्षेत्र की युद्ध-भूमि में अपने सगे-संबंधियों को सामने खड़ा देखकर द्वंद्वात्मक स्थिति में फँसकर विषादग्रस्त है और अब भगवान ने ज्ञान देकर विषाद-मुक्त होने के लिए कह दिया कि तुम्हें जो भी उचित लगे, वह कर । अर्जुन चाहता तो युद्ध से अब भी पलायन कर सकता था अगर उसकी स्थिति प्रथम अथवा द्वितीय श्रेणी के मनुष्य की सी होती । ऐसी स्थिति में अर्जुन होता तो भगवान के कथन को या तो सुनता ही नहीं अथवा सुनता तो भी उसे दूसरे कान से निकाल देता अर्थात् उस पर विचार तक न करता । परन्तु अर्जुन तो तीसरी श्रेणी का मनुष्य है, जो भगवान के कथन पर विचार कर रहा है । अर्जुन उनके कथन पर विचार करते हुए समझ नहीं पा रहा है कि भगवान ने सारा ज्ञान देकर भी ‘उचित लगे, वैसा कर’ कहकर उसे अनिर्णयात्मक स्थिति में लाकर क्यों खड़ा कर दिया ?

           इस प्रश्न का समाधान करने के चलिए जानते है कि मनुष्य की ऐसी कौन सी विशेषताएँ हैं, जो उसे अन्य जीवों से भिन्न बनाती हैं ? 

          आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत्त् पशुभिर्नराणाम् ।

          धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीना: पशुभि: समाना: ।।

आहार, निद्रा, भय और मैथुन, ये सभी चीजें पशुओं और मनुष्य में समान हैं । धर्म ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से भिन्न बनाता है । धर्म के बिना मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं है ।

         मनुष्य में आहार, निद्रा, भय और मैथुन से जो अतिरिक्त विशेषता है, वही उसको अन्य प्राणियों से भिन्न बनाती है और वह विशेषता है - धर्म की पालना । धर्म ही मनुष्य जीवन का आधार है, बिना धर्म के मनुष्य बिना सींग पूँछ का पशु ही है । धर्म का अर्थ है कर्तव्य पालन, जो सही हो वही करना । अन्य जीव तो केवल प्रारब्ध के भोग भोगने के लिए कर्म करते हैं परंतु मनुष्य उनके अलावा भी कर्म करने को स्वतंत्र है । परमात्मा ने यह कर्म स्वतंत्रता मनुष्य को अपना धर्म-पालन करने के लिए दी है, जिससे वह अपना कर्तव्य निभा सके ।

            परमात्मा ने कर्म स्वतंत्रता के साथ मनुष्य को धर्म-पालन के लिए दूसरी शक्ति विवेक के रूप में दी है । विवेक के कारण ही मनुष्य को अपने कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध होता है । विवेक का सदुपयोग कर मनुष्य सुख-दुःख से निकलकर आनन्द को उपलब्ध हो सकता है ।

         इस प्रकार परमात्मा ने मनुष्य को विवेक और कर्म-स्वातंत्र्य, ये दो शक्तियाँ विशेष रूप से कृपा करके दी है,  जिससे वह धर्म-पालन करते हुए भोगों से सुख भी प्राप्त करे और निष्काम-कर्म करते हुए भोग-कर्मों में आसक्त भी न हो । भोगों में आसक्त मनुष्य संसार में ही उलझकर रह जाता है और उचित कर्म करने के लिए विवेक का सदुपयोग नहीं कर पाता । 

       पुनः चलते हैं, भगवान द्वारा कहे गए उस कथन की ओर जिसमें वे कहते हैं कि “यथेच्छसि तथा कुरु” अर्थात् जो उचित लगे, वह कर । “यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्”, विषादग्रस्त अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से चाहता है कि वे उसे जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह रास्ता दिखाए । गीता के दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से लेकर अठारहवें अध्याय के बासठवें श्लोक तक अर्जुन को विभिन्न कल्याणकारी साधन बतलाए परंतु अब कह रहे हैं कि तुम्हें जो उचित लगे वह कर । यह बात तो वे उसी समय कह सकते थे, जब अर्जुन ने उनसे निश्चित कल्याणकारी मार्ग पूछा था । प्रश्न उठता है कि फिर भगवान ने ऐसा क्यों कहा ?

          दो विशेष शक्तियाँ जो भगवान ने मनुष्य को दी है - विवेक और कर्म-स्वातंत्र्य, उनका उपयोग करके ही मनुष्य उचित निर्णय ले सकता है । भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की कर्म स्वतंत्रता का सम्मान किया है । वे जानते है कि अर्जुन तीसरी श्रेणी का मनुष्य है । उसने उनकी बात को बड़ी एकाग्रता से सुना है । अब वह अपने विवेक के अनुसार क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसका निर्णय ले सकता है ।

           भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गुह्य से भी गुह्य ज्ञान दिया है । इस ज्ञान को देने का उनका उद्देश्य था - अर्जुन के अज्ञान को नष्ट करना । अज्ञान के कारण ही तो अर्जुन मोहग्रस्त होकर विषाद की अवस्था में चला गया था । अज्ञान तभी नष्ट हो सकता है, जब ज्ञान प्रदान करने वाले को हम गंभीरता के साथ और एकाग्र होकर सुने । केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है, उस ज्ञान पर विचार कर उसे अपने जीवन में उतारना महत्वपूर्ण है । जीवन में ज्ञान सभी को उपलब्ध है केवल उसकी विस्मृति हो जाने के कारण हम सही समय पर उसका उपयोग नहीं कर पाते और विषाद की अवस्था में चले जाते हैं । किसी योग्य व्यक्ति (गुरु) से ज्ञान सुनने पर विस्मृत ज्ञान की पुनः स्मृति हो जाती है ।

        भगवान कुछ करते नहीं है, वे तो केवल आपकी स्मृति लौटाते हैं । अपने भीतर उपस्थित ज्ञान (विवेक) से हम कर्म स्वतंत्रता से अपने धर्म की पालना कर सकते हैं । स्मृति का अर्थ भूतकाल के घटनाक्रम को याद करना नहीं है । पुरानी घटनाओं को याद कर के तो हम संताप को ही आमंत्रित करते हैं । यहाँ स्मृति से अर्थ है  जो कुछ हमने पूर्व में ज्ञान प्राप्त किया है, जिस ज्ञान को हमने सांसारिक क्रिया कलापों में उलझकर भूला दिया है, उसको पुनः उपयोग में लाना । मनुष्य के भीतर प्राप्त ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता, केवल उसकी विस्मृति होती है । विस्मृति का कारण है, सांसारिक पदार्थों और क्रियाओं में ममता कर लेना । भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के भीतर उत्पन्न हुए उसी ममत्व को झुठलाया है, जिससे उसे वास्तविक ज्ञान की स्मृति हो आई ।

             ममता के वशीभूत होकर अर्जुन कर्म के स्वरूप को भूल गया था । वह ममता में उलझकर कथित ज्ञानियों जैसी बातें करने लगा था । जैसे मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य को और न ही किसी प्रकार के सुख को । इन आतताइयों को मारने पर हमें पाप ही लगेगा । कुल को नष्ट कर हम कुल-धर्म को नष्ट कर देंगे, इससे कुल में पाप बढ़ जाएगा । मैं भीष्म पितामह, गुरु द्रोण आदि को मारना नहीं चाहता, इससे तो अच्छा है भीख माँगकर जीवन निर्वाह करना । विषाद की इस अवस्था में आकर अर्जुन अपना क्षत्रिय धर्म भूल गया है । वह नहीं जानता कि उसका स्वभाव-कर्म क्या है, उसका कर्तव्य क्या है ? यहीं से गीता भगवान श्रीकृष्ण के मुख से प्रस्फुटित होती है, जो अर्जुन को कर्मयोग की स्मृति करा देती है ।

       यथार्थ में गीता कर्म-शास्त्र है । क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए और क्यों करना चाहिए ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण ने इस शास्त्र में दिए हैं । गीता कर्म करने से पहले व्यक्ति की पात्रता निश्चित करती है । बिना पात्रता के कोई भी व्यक्ति कर्म करने को उद्यत ही नहीं होगा । किसी कारण से कर्म का स्वरूप जाने बिना कोई कर्म करता भी है तो वह उल्टे-सीधे कर्म करेगा या कर्म को बीच में ही अपूर्ण छोड़ देगा । इसी की स्मृति दिलाने के लिए भगवान ने अर्जुन को कर्म के स्वरूप को स्पष्ट किया है । अकर्म, निष्काम कर्म और विकर्म के भेद को स्पष्ट करते हुए अन्त में सब कुछ अर्जुन पर छोड़ दिया कि वह विचार कर अपनी पात्रता के अनुसार उचित कर्म करे । 

      कर्म के स्वरूप का ज्ञान कराने से पूर्व भगवान ने स्वरूप के बोध के लिए सांख्य-योग कहा है । बोध से अर्थ है, आत्म-अनात्म का ज्ञान । ‘शरीर को ही स्वरूप समझने’ से विमुख होकर ‘स्वयं के वास्तविक स्वरूप’ को जानने का नाम ही आत्म-बोध है । गीता के दूसरे अध्याय में अपनी बात शुरू करते हुए भगवान ने देह-देही के अंतर को स्पष्ट करते हुए अर्जुन को उसकी अनश्वरता के बारे में आश्वस्त किया है । केवल देह मरती है, देही नहीं । देह के रूप में जन्म लेने वाले की देह का मरना निश्चित है और मरने वाली देह का दूसरा जन्म होना निश्चित है । यथार्थ में न तो कोई मरता है, न ही कोई मार सकता है । इस प्रकार अर्जुन को विषाद से बाहर निकालने का भगवान प्रयास करते हैं जिससे उसे स्पष्ट हो जाए कि मनुष्य का स्वरूप यह शरीर नहीं है बल्कि वह उससे भिन्न है, अनश्वर है ।

       जब तक आत्म-बोध नहीं होता, तब तक कर्म स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं है । बोध ही तो विवेक है, जो करने और न करने के मध्य के अन्तर का ज्ञान कराता है । कर्म स्वतंत्रता का सदुपयोग मनुष्य तभी कर पाता है, जब उसका विवेक जाग्रत हो जाए अन्यथा तो प्रायः इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग ही होता है ।

         अपने स्वरूप का बोध कराने के साथ गीता आचरण को भी महत्व देती है । स्वरूप के ज्ञान को केवल  सैद्धांतिक ही न मानें बल्कि उसको आचरण में लाना भी आवश्यक है । यही अध्यात्म है । कोरी स्वरूप के संबंध में बातें कहना, सुनना ही अध्यात्म नहीं है । कर्म-स्वतंत्रता उन्हीं के लिए है, जो आत्म- बोध को उपलब्ध हो चुके है । दूसरे अध्याय में ही अर्जुन को आत्म-बोध हो गया था तभी तो वह आगे युद्ध की बात न करके अपने कल्याण की बात करने लगा है । आत्म- बोध होने के बाद ही भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म-योग कहा है और उसे कर्मों को करने के लिए प्रेरित किया है । 

            बिना बोध के मनुष्य में कर्तापन का अहंकार रहता है । आत्म-बोध ही मनुष्य को कर्मफल के उत्तरदायित्व से मुक्त करता है । श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में अर्जुन को कभी भी बाध्य नहीं किया कि तुम्हें ऐसा करना ही होगा । यही उनके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को दी गई कर्म-स्वतंत्रता का सम्मान करना है । गीता ज्ञान के समापन से पूर्व उन्होंने अर्जुन को कभी योगी होने का कहा है, कहीं भक्त होने का कहा है, लेकिन आदेशात्मक रूप से कुछ भी करने के लिए बाध्य नहीं किया कि तुम्हें ऐसा करना ही होगा । यथार्थ को स्पष्ट करते हुए केवल इतना ही कहा है कि अर्जुन उनकी कही गई बातों पर विचार करे और आगे क्या करना है, इसका निर्णय वह स्वयं करे ।

         आज के मनुष्य का अपनी इच्छाओं पर कोई नियंत्रण नहीं है । वह अपनी इच्छाओं का ग़ुलाम है । इच्छाओं की दासता कर्म-स्वतंत्रता नहीं है । मनुष्य अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए ही कर्म कर रहा है और वह भी बिना कर्म का स्वरूप जाने । और तो और वह अपने द्वारा किए गए कर्मों को उचित भी ठहरा रहा है । आज आवश्यकता इस बात की है कि गीता के शाश्वत ज्ञान को मनुष्य अपने जीवन में उतारे और कर्म-स्वतंत्रता को सही रूप से समझे । अगर हम इस कार्य में असफल रहते हैं तो फिर ईश्वर अपने प्राकृतिक न्याय से उसे ठीक करने को बाध्य होंगे । प्राकृतिक न्याय अर्थात् प्रकृति के सिद्धांतों की अवहेलना करने पर मिलने वाला दण्ड । इतने से भी यदि सुधार नहीं होता और अन्याय अधिक बढ़ जाता है तो फिर परमात्मा को धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अवतरित होना पड़ता है ।

         गीता में श्रीकृष्ण (परमात्मा) ने अर्जुन (मनुष्य) को कर्म-योग के अनुसार आचरण करने पर कर्म-स्वतंत्रता दी है । उचित कर्म करने के लिए उसे ज्ञान, ध्यान, भक्ति आदि मार्गों से प्रेरित किया है । मनुष्य अपने जीवन में एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, इसलिए उसका कर्म से विमुख होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता । अपने लाभ-हानि को देखकर अगर कोई कर्म से मुँह मोड़ने का प्रयास भी करता है तो वह उसमें सफल नहीं हो सकता क्योंकि अंततः स्वभाव के अनुसार प्रकृति उससे कर्म करवा ही लेगी । भगवान ने अर्जुन को यही तो कहा था कि तुम क्षत्रिय हो, तेरे स्वभाव में युद्ध लड़ना है । आज मोहवश तुम युद्ध से भागने का प्रयास कर रहे हो परंतु तेरा क्षत्रिय स्वभाव एक दिन तुम्हें युद्ध भूमि में अवश्य ही ले आएगा ।

           कर्म कैसे हों ? इसके लिए भगवान अठारहवें अध्याय तक अर्जुन को विभिन्न कोणों से समझाते हैं । जब भगवान समझ जाते हैं कि अर्जुन सचमुच समझ गया है तब सब कुछ उस पर ही छोड़ देते हैं । फिर भी अन्त में भगवान अपनी तरफ़ से सबसे महत्वपूर्ण बात कह ही देते हैं - ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ जा । यह सुनकर अर्जुन आश्वस्त हो जाता है कि अब जो भी मुझे उचित लगेगा, वह करूँगा क्योंकि परमात्मा ने जो ज्ञान दिया है, उससे मेरा मोह नष्ट हो गया है । मोह ही अज्ञान है । मोह के नष्ट होते ही ज्ञान प्रकट हो जाता है, फिर किसी से अनुचित कर्म हो ही नहीं सकते । 

सार - संक्षेप 

                   श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म के बारे में विस्तार से समझाकर ही युद्ध करने अथवा न करने का निर्णय अर्जुन पर छोड़ दिया था । गीता-ज्ञान से उपजे विवेक का सदुपयोग करने से अर्जुन के सामने स्पष्ट हो गया था कि युद्ध करने अथवा न करने वाला मैं कौन होता हूँ ? जीवन में जो भी परिस्थितियाँ सामने आती है, बिना विचलित हुए समता के साथ उनका सामना करना ही विवेकवान पुरुष का लक्षण है । जीवन में सब कुछ स्वभावानुसार पूर्व में ही निश्चित किया हुआ होता है, ऐसे में युद्ध करने अथवा न करने वाला अर्जुन कौन होता है ? सबसे महत्वपूर्ण बात : प्रकृति द्वारा होने वाली क्रियाओं को अपने द्वारा करना मान लेना ही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है । इसलिए किसी भी क्रिया के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना अनुचित है ।

            ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ से तात्पर्य है, विवेक का सदुपयोग कर निर्णय लेना । उपरोक्त ज्ञान पर विचार करने के उपरान्त अर्जुन को भी युद्ध करना उचित लगा । विवेक और कर्म-स्वतंत्रता ही निष्काम कर्म की ओर ले जाते हैं । परमात्मा की शरण लेकर ‘फल की इच्छा’ और ‘करने का अभिमान’, इन दोनों से रहित होकर किए जाने वाले कर्म ही युद्ध का परिणाम निश्चित कर देते हैं ।

             तभी संजय ने युद्ध समाप्ति से पूर्व ही धृतराष्ट्र को स्पष्ट संदेश दे दिया -

    यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।

    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

    जहां ज्ञान के प्रतीक साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण हैं, जहां कर्मयोगी के प्रतीक गांडीवधारी अर्जुन है जोकि ज्ञान द्वारा प्रशस्त कर्म-मार्ग पर चलने को उद्यत है; वहीं पर श्री (लक्ष्मी, सरस्वती, ऐश्वर्य आदि) है, वहीं पर विजय है, विभूति और ऐश्वर्य है । वही ध्रुव अर्थात् अचल नीति है । संजय कहते हैं - ‘हे राजन् ! मेरा भी यही मत है ।’

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल


Thursday, July 10, 2025

गुरु - पूर्णिमा

            महाभारतकालीन सत्यवती, एक मत्स्य कन्या थी क्योंकि उसका जन्म एक मछली के गर्भ से हुआ था । इन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता है क्योंकि इनके शरीर से मछली की गंध आती थी । एक मछुआरे ने इनका लालन-पालन किया । युवती हो जाने पर वह नाव चलाकर लोगों को यमुना नदी के आर-पार लाती ले जाती थी । एक बार ऋषि पराशर उनकी नाव में पार जाने के लिए बैठे । सत्यवती के शरीर से निकलने वाली मछली की गन्ध को उन्होंने अपने तप के प्रभाव से दूर कर दिया । इसी यात्रा में ऋषि पराशर के मिलन से सत्यवती गर्भवती हो गई । उस गर्भ से जिस बालक का जन्म हुआ उसका नाम श्रीकृष्ण द्वैपायन था जो बाद में वेद व्यास नाम से प्रसिद्ध हुए । वेद व्यास जी का जन्म एक द्वीप पर हुआ था और जन्म से वे कृष्ण वर्ण थे, इस कारण इनका नाम श्रीकृष्ण द्वैपायन पड़ा । वेद व्यासजी सात चिरंजीवियों में से एक है । ऐसा विश्वास किया जाता है कि वे आज भी इस पृथ्वी पर जीवित हैं ।

            उनका जन्म आषाढ़ मास की पूर्णिमा को हुआ था । उनकी विलक्षण प्रतिभा के कारण इस दिन को गुरु-पूर्णिमा भी कहा जाता है । उन्होंने अपनी प्रतिभा से जो ग्रंथ लिखे, वे आज सनातन धर्म के आधार ग्रंथ हैं । उन्होंने वेदों का संकलन, मीमांसा, ब्रह्म-सूत्र, अठारह पुराण, महाभारत महाकाव्य आदि कई ग्रंथ लिखे ।  

         गुरु-पूर्णिमा के दिन गुरु-पूजन किया जाता है । गुरु ही मनुष्य को उसके जीवन का उद्देश्य बताते हुए मार्गदर्शन करते हैं । आज आदर्श गुरु मिलने असंभव से होते जा रहे हैं । यही कारण है कि समाज को सही दिशा नहीं मिल पा रही है । जिस दिन गुरु सही मायने में गुरु हो जाएंगे और शिष्य उनके प्रति श्रद्धा, निष्ठा रखते हुए पूर्ण रूप से समर्पित हो जाएगा, उस दिन सनातन संस्कृति पुनः अपने सर्वोच्च शिखर को छू लेगी ।

              कलयुग में सच्चा गुरु वह है जो शास्त्रों के ज्ञान के आधार पर भक्ति का मार्गदर्शन करता है । शास्त्रों का पूर्ण ज्ञाता होने के साथ-साथ गुरु को अनुभव सिद्ध भी होना चाहिए । अनुभव सिद्ध गुरु ही सत्य का मार्ग दिखा सकता है । गुरु ही शिष्य को मोक्ष की ओर ले जा सकता है जिससे वह सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है । गुरु ही व्यक्ति को मर्यादा में रहकर भक्ति करने का संदेश देता है ।

              आइए ! गुरु-पूर्णिमा के दिन हम सब संकल्प करें कि गुरु के द्वारा दिए गए ज्ञान को अपने जीवन में उतारें । सही अर्थों में यही गुरु की पूजा होगी । आप सभी को गुरु - पूर्णिमा की शुभकामनाएं ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

बंदऊँ गुरु पदकंज

 बंदऊँ गुरु पदकंज

“सा विद्या या विमुक्तये - ज्ञान वही है जो मनुष्य को मुक्त कर दे ।” (विष्णु पुराण - 1/19/41)

           ज्ञान और विवेक, ये दो शब्द मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं । सभी मनुष्यों में जन्म-जात दोनों ही होते हैं । ज्ञान ही विवेक में परिवर्तित होता है, जिसमें गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । ज्ञान मनुष्य के सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवन में उपयोगी है परंतु विवेक उसे मनुष्य-जीवन के उद्देश्य से परिचित कराता है । जिस प्रकार चाक से घड़ा बन सकता है परन्तु उस घड़े को निखार देकर उपयोगी बनाने में कुम्हार की विशेष भूमिका रहती है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त मनुष्य में विवेक जाग्रत करने में गुरु की आवश्यकता होती है । 

            ज्ञान तो अनेक शास्त्रों में भरा पड़ा है । उस ज्ञान को उपयोगी बनाकर अनुभव करना मुख्य बात है । गुरु शास्त्रों का ज्ञाता भी होता है और अनुभव सिद्ध भी । ऐसा गुरु आपकी अंगुली पकड़ कर उस दिशा का ज्ञान करा देगा, जिसका हमें अभी तक ज्ञान नहीं है । उस दिशा में चल पड़ना ही विवेक है । केवल गुरु को सुनना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि सुने हुए को जीवन में उतारना महत्वपूर्ण है । गुरु आपके साथ नहीं चलेगा, उस मार्ग पर चलना आपको ही पड़ेगा । गुरु स्वयं के साथ आपको नहीं बाँधेगा उलटे आपको मुक्त कर देगा । इसलिए आदर्श गुरु मिलने को गोविंद का मिल जाना कहा गया है ।

          आज गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर हम सबको अपने गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना चाहिए । गुरु का अर्थ है - जो आपके अज्ञान रूपी अंधकार का नाश कर आपको ज्ञान रूपी प्रकाश से सरोबार कर दे । गुरु इसीलिए वंदनीय है । तुलसी मानस में बालकाण्ड के प्रारम्भ में गुरु-वन्दना करते हुए कहते हैं -

बंदऊँ गुरु पदकंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।

महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ।। सोरठा -5 ।।

     मैं उन गुरु महाराज के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में साक्षात् श्री हरि ही है और जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं ।

          इस जीवन में कई आध्यात्मिक महापुरुषों का सानिध्य मिला परन्तु भीतर की मुमुक्षा को हरिः शरणम् के आचार्य श्री गोविन्दराम जी शर्मा ने पहचान कर आगे की यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया है, ऐसा कार्य कोई आदर्श गुरु ही कर सकता है । उनके मार्गदर्शन से आंतरिक-परिवर्तन को जो गति मिली है, उसको व्यक्त करने के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्दों का अभाव है । उनका स्मरण, उनके प्रति आदर भाव प्रातः जागने से लेकर रात को सोने तक तो सदैव बना ही रहता है, साथ ही साथ बढ़ता भी जा रहा है । आज गुरु-पूर्णिमा के पावन अवसर पर उन्हें साष्टांग प्रणाम करते हुए मैं स्वयं को रोमांचित अनुभव कर रहा हूँ ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल

          

Wednesday, July 9, 2025

यत् दृष्टं तत् नष्टं (यद्दृष्टंतन्नष्टं)

 ‘यत् दृष्टं तत् नष्टं’ 

                 आदि कैलाश ॐ पर्वत की सप्त दिवसीय यात्रा में जो कुछ भी हमने देखा, क्या वह सदा के लिए रहने वाला है ? हमें इतने जीव इस संसार में दिख रहे हैं क्या वे भी सदा के लिए रहने वाले हैं ?  हमारा यह शरीर, जिसको हम इतना सजाते-संवारते है, क्या यह कभी मरेगा नहीं ? तनिष्क ज्वेलर्स अपने विज्ञापन में कहते हैं - “हीरा है, सदा के लिए” पर क्या हीरा (Diamond) सदा के लिए है ?

       जब यहां जो भी दिखलाई पड़ रहा है, वह सब जाने वाला है तो फिर यहाँ रहने वाला कौन है ? जो जाने वाला है, वह सब असत् है और जो सदैव रहने वाला है उसे सत् कहा जाता है । असत् दिखलाई पड़ रहा है और सत् अदृश्य है । ॐ सत् है लेकिन ‘ॐ पर्वत’ सत् नहीं है, कैलाशपति सत् है पर ‘आदि कैलाश पर्वत’ नहीं, हम सत् हैं परंतु हमारा यह शरीर नहीं ।  

           जो भौतिक दृष्टि की पकड़ में आता है, वह सब नाशवान है । प्रत्येक पर्वत (आदि कैलाश हो चाहे ॐ पर्वत ) नाशवान है । संसार की प्रत्येक वस्तु प्रतिदिन नाश की ओर अग्रसर है । जो प्रतिपल नष्ट होता जा रहा हो और साथ ही स्पष्ट रूप से दिखलाई भी पड़ रहा हो, उसके शाश्वत होने का भ्रम हो जाना स्वाभाविक है । नाशवान की इस दिखलाई पड़ने वाली इस सत्ता का क्या कारण है अर्थात् असत् की दिखलाई पड़ने वाली इस सत्ता के पीछे किसकी भूमिका है ? जब तक हम दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु की सत्ता के पीछे छिपे वास्तविक सत्तावान को नहीं देखेंगे तब तक हम सुषुप्त अवस्था में ही रहेंगे । वास्तव में असत् की दिखलाई पड़ने वाली वह सत्ता उसी अविनाशी के कारण है ।

            हम जाग्रत तो हैं परंतु केवल भौतिक रूप से, तभी तो विनाशशील के पीछे छिपे अविनाशी को नहीं देख पा रहे हैं । जिस दिन धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे विनाशशील में भी अविनाशी को देखने लगेंगे, उसके बाद चहूँ ओर उस एक के ही दर्शन होंगे, जो कभी भी नष्ट नहीं होता । 

       ‘यत् दृष्टं तत् नष्टं’ अर्थात् जो दिखलाई पड़ रहा है, वह सब नष्ट होने वाला है । 

यह या वह 

       एक राज्य का इकलौता राजकुमार रोगग्रस्त होकर मृत्यु शैया पर पहुँच गया । राजा-रानी ने बहुत चिकित्सा करवाई, आस-पास के राज्यों से नामी-गिरामी चिकित्सकों तक को बुलवा लिया, उन्हें बहुत क़ीमती पुरस्कारों का लालच भी दिया परन्तु राजकुमार की बीमारी कम होने के स्थान पर बढ़ती ही चली गई । एक दिन राजवैद्य ने क्षमा माँगते हुए कह दिया कि आज की रात राजकुमार के जीवन की अंतिम रात है । शोकग्रस्त राजा-रानी ने राजकुमार की इस अंतिम रात को उसकी शैया के पास ही बैठकर बिताने का निश्चय किया ।

             इंतज़ार की घड़ियाँ बड़ी लम्बी होती है । भौतिक शरीर की भी जागते रहने की अपनी क्षमता होती है । दिन भर के थके राजा की आंख लग गई । राजा स्वप्नावस्था में चले गए । सपना भी मनुष्य को वही आता है, जिसका दिन भर चिन्तन चलता रहता हो । सपने में भी राजा, राजा ही बना हुआ है और उस राजा के चार सुन्दर राजकुमार है । सपने वाला राजा अपने राजमहल में रानी के साथ आमोद-प्रमोद में व्यस्त हैं । पास ही चारों राजकुमार खेल रहे हैं । राजकुमारों की आपस में हो रही नोंक-झोंक को देखकर दोनों मुदित हो रहे हैं । अचानक एक राजकुमार किसी बात को लेकर बड़ी ज़ोर से रोने लगता है । रोने की तेज आवाज़ सुनकर स्वप्न देख रहा राजा चौंककर नीन्द से जाग जाता है ।

             सामने शैया पर राजकुमार की मृत देह पड़ी है और उस के पास बैठी रानी विलाप कर रही है । राजा कभी मृत राजकुमार को देखता है, कभी विलाप करती रानी को और कभी मन ही मन में अपने सपने वाले राजकुमारों को । रानी तो रो रही है और पास ही राजा किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ बैठा है । रानी झिंझोड़ कर राजा को कहती है कि अपना इकलौता बेटा चला गया और आप रो नहीं रहे हैं । संज्ञा शून्य हो कर क्यों बैठे हो ?  इस पर राजा ने बड़ी मार्मिक बात कही - ‘ इस एक राजकुमार के लिए रोऊँ या उन चार राजकुमारों के लिए, जो अभी-अभी मेरे पास खेल रहे थे ।’ रानी के बात समझ में आई अथवा नहीं, पर राजा के समझ में अवश्य आ गई कि ‘यद्दृष्टंतन्नष्टं - जो दिखाई देता है, वह सब नष्ट होने वाला है ।’

          जो कुछ भी हमारे द्वारा देखा जाता है, वह सब नाशवान है । स्वप्न में भी और जाग्रत अवस्था में, दोनों ही प्रकार के दिखने में कोई अन्तर नहीं है । स्वप्न हम देखते ही इसलिए हैं कि जीवन में किसी चीज़ का अभाव है । वास्तविक जीवन में उस अभाव की पूर्ति नहीं हो पाती, उस अभाव को हम सपने में पूरा कर लेते हैं । सपने में अभाव का दूर होना हो अथवा वास्तविक जीवन में हो, वह सब फिर से अभाव में जाने वाला है । इसलिए कहा गया है कि जो भी देखा जाता है, वह सब नाशवान है । 

            मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह दृश्य को द्रष्टा भाव से न देखकर उसको शरीर के आधार पर देखता है । शरीर में इंद्रियाँ है और इंद्रियों की दृष्टि से दिखलाई पड़ने वाला प्रत्येक दृश्य आपको अपने साथ बांध लेता है । मनुष्य प्रत्येक दृश्य से राग/द्वेष करने लगता है । यही आसक्ति उसके सांसारिक बंधन का कारण बनती है । सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि स्वप्न में देखे गए दृश्य भी मनुष्य को भ्रमित कर देते हैं । आइए ! पहले यह जानने का प्रयास करते हैं कि स्वप्न और जाग्रत, दोनों अवस्थाओं की दृष्टि में मूलभूत अन्तर क्या है ?

          आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो दोनों अवस्थाओं में तनिक भी अंतर नहीं है । जाग्रत अवस्था में मनुष्य की दृष्टि में आने वाली प्रत्येक वस्तु स्थूल रूप में ही होती है और उसको स्थूल इंद्रियों के माध्यम से छूकर, देखकर, सूंघकर, चख कर अथवा सुनकर अनुभव किया जा सकता है । स्वप्न में दिखलाई देने वाली प्रत्येक वस्तु स्थूल रूप से उपस्थित न होते हुए भी स्थूल रूप में ही दिखती है परन्तु उसको केवल मन के द्वारा ही अनुभव किया जाता है और मन के इस अनुभव में सूक्ष्म इंद्रियों की भूमिका रहती है । सूक्ष्म इंद्रियों की क्रियाओं की प्रतिक्रिया स्वप्न देख रहे व्यक्ति की स्थूल इंद्रियों में भी प्रतिबिम्बित होती है । जैसे स्वप्न में फुटबॉल खेल रहे व्यक्ति के पैर में हो रही गति बाहर शरीर के पैर में भी देखी जा सकती है । कई बार तो सपने में गोल करने का अवसर मिलने पर वास्तविक पैर भी किक मार देता है । 

                स्वप्न में वस्तु के स्थूल रूप से अनुपस्थित होते हुए भी स्थूल इंद्रियों में प्रतिक्रिया वैसी ही होती है जैसी जाग्रत अवस्था में उस वस्तु को अनुभव करने से होती है । यही कारण है कि स्वप्न में देखे गए घटनाक्रम को भी मनुष्य वास्तविक समझ लेता है, जबकि उसका वास्तविकता से दूर का भी सम्बन्ध नहीं होता । इसी प्रकार वास्तविक जीवन में भी जो कुछ देखा जाता है, उसके शाश्वत होने का भ्रम ही होता है । देखा जाने वाला सब कुछ नाश की ओर जा रहा है । ऐसा क्यों और कैसे होता है ? आइए ! इसके पीछे के विज्ञान को जानने का प्रयास करते हैं ।

              प्रत्येक स्थूल वस्तु का निर्माण पदार्थ से होता है । पदार्थ प्रकृति में सतत चल रही क्रियाओं का परिणाम है । इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक पदार्थ अथवा वस्तु क्रिया के कारण ही अस्तित्व में आते हैं और यह क्रिया उस पदार्थ के भीतर भी सतत चलती रहती है । इन क्रियाओं के कारण ही पदार्थ प्रतिपल अपना स्वरूप परिवर्तित करता रहता है । यह परिवर्तन प्रायः इतनी धीमी गति से होता है कि हमारी दृष्टि उसको पकड़ नहीं पाती । यह परिवर्तन ही पदार्थ को नाश की ओर ले जाता है । निष्कर्ष है कि क्रिया से ही पदार्थ का निर्माण होता है और वह क्रिया ही उसे नाश की ओर ले जाती है । क्रिया का प्रारम्भ पदार्थ की उत्पत्ति है और क्रिया का समापन उस पदार्थ की समाप्ति ।

         जाग्रत और स्वप्न, दोनों अवस्थाओं में ही क्रिया की भूमिका है । इसलिए न तो जाग्रत को सत् कहा जा सकता है और न ही स्वप्न को । केवल पदार्थ ही स्थूल दृष्टि की पकड़ में आता है, उसके भीतर चल रही क्रिया नहीं । आधुनिक विज्ञान ने ऐसे साधन विकसित कर लिए हैं, जिससे क्रिया को भी देखा जा सकता है । आज विज्ञान उस अवस्था में पहुँच गया है, जहां वह कह सकता है कि पदार्थ दिखलाई अवश्य दे रहा है परन्तु वास्तव में पदार्थ कहीं है ही नहीं, केवल क्रिया ही क्रिया है । यही बात तो हमारे सनातन धर्म-ग्रंथ सहस्राब्दियों से कहते आ रहे हैं कि जगत् में क्रिया के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । हमारे ऋषियों ने तो इससे भी आगे बढ़कर कहा है कि केवल पदार्थ ही नहीं बल्कि प्रत्येक क्रिया का भी अन्त होता है । प्रत्येक क्रिया को भी एक दिन अक्रियता में समाहित हो जाना होता है ।

           प्रत्येक क्रिया का आदि है अन्त भी है परन्तु जहां से क्रिया का आगमन होता है और जिसमें क्रिया को समाहित होना होता है, उस अक्रियता का कोई आदि-अन्त नहीं है । अक्रियता से क्रिया का जन्म होता है और क्रिया से पदार्थ का । हम अपनी स्थूल दृष्टि से पदार्थ को देख कर उसकी सत्ता समझ लेते हैं जबकि पदार्थ की सत्ता क्रिया के कारण है परन्तु क्रिया की भी स्वतंत्र सत्ता नहीं है । क्रिया का अस्तित्व भी अक्रियता पर टिका है, अतः मुख्य सत्ता अक्रियता की हुई । अक्रियता जिसमें है और जिसकी है, एक वही शाश्वत है । पदार्थ और क्रिया का आदि-अन्त है परन्तु उस शाश्वत का न कोई आदि है और न ही अन्त । वह दिखलाई नहीं दे रहा परंतु अदृश्य होकर भी केवल एक उसी की सत्ता है । उसके बिना न तो कोई क्रिया होती है, न पदार्थ बनता है, न कोई आदि कैलाश है और न ही कोई ॐ पर्वत ।

                  संसार में जितने भी पदार्थ दिखलाई पड़ रहे हैं, वे सब अभाव में अर्थात् ‘न होने’ में जा रहे हैं । कहने का अर्थ है कि अभाव में भाव का होना, कभी नहीं हो सकता । गीता में भगवान ने कहा है -

       नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । 

       उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: ।।' (गीता - 2/16)

     असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है । तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने इन दोनों का ही तत्त्व देखा है अर्थात् अनुभव किया है ।

          असत् की सत्ता नहीं है, फिर भी वह दिखलाई कैसे पड़ रहा है ? एक साधारण व्यक्ति की दृष्टि में आने वाली वस्तु उसे असत् नज़र नहीं आती क्योंकि हमारी सोच ही ऐसी बन गई है कि जो आँखें देख रही हैं, भला ! वह असत् कैसे हो सकती है ? ऐसा सोचना भी कुछ सीमा तक सही है परन्तु ऐसा तभी सही है जब हम प्रत्येक दिखने वाली में सत्तावान अविनाशी को देखें । इसके लिए हमें सत्-असत् के ज्ञान की अवस्था तक पहुँचना होगा । तत्त्वदर्शी महापुरुष को तो सत् और असत् दोनों का अनुभव है परन्तु साधारण मनुष्य को सत् प्रतीत होने वाली वास्तव में असत् है, इस बात का ज्ञान नहीं है । अक्रियता से क्रिया, क्रिया से पदार्थ और पदार्थ का नष्ट होकर क्रिया का पुनः अक्रियता में समा जाना ही सत्-असत् का ज्ञान है ।

          हमें असत्, सत् के रूप में दिखलाई पड़ता है क्योंकि उसको हम अपनी इंद्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं । असत् का इस प्रकार सत् के रूप में अनुभव होना और अन्ततः उसका नष्ट हो जाना,  इस पूरी प्रक्रिया को जान लेने पर ही हमारी सारी भ्रांतियां दूर होगी उससे पहले नहीं । 

         मनुष्य शरीर की संरचना अन्य सभी प्राणियों में सबसे जटिल है । यह दो स्तर पर कार्य करता है। बाह्य और आंतरिक । शरीर से बाहर जाने के लिए आपकी चेतना इंद्रियों के माध्यम से यात्रा करती है और आपको संसार के पदार्थों से परिचय कराती है । यह चेतना की इंद्रिय यात्रा है । इंद्रिय यात्रा करने वाली चेतना ही हमारा अशुद्ध अहम् है । 

         आंतरिक स्तर पर जो यात्रा होती है, उसमें इंद्रियों की कोई भूमिका नहीं होती, इसलिए इसको अतीन्द्रिय यात्रा कहा जाता है । अतीन्द्रिय यात्रा करने वाली चेतना हमारा शुद्ध अहम् है । दोनों ही यात्राओं में चेतना (अहम्) की भूमिका होती है । हम इसी वास्तविकता को जीवन भर भूले रहते हैं । हमारे नेत्र केवल देखने के उपकरण मात्र है परंतु जो देखता है, वह तो हमारे भीतर बैठा है । नेत्रों को बंद कर लेने पर भी वह रहता है । वही चेतना है । उसी को द्रष्टा कहकर सम्बोधित किया जाता है । 

        बाहरी यात्रा में पदार्थ को जाना जाता है और भीतरी यात्रा में अपदार्थ को । यह चेतना ही बाहरी और भीतरी, दोनों यात्राओं की द्रष्टा है । 

          यथार्थ में पदार्थ और अपदार्थ में किसी प्रकार का विभाजन नहीं है, दोनों एक ही हैं । भौतिक दृष्टि में द्रष्टा की अवहेलना कर दें तो सब कुछ पदार्थ है जबकि द्रष्टा की दृष्टि में सब कुछ अपदार्थ ही है । पदार्थ में परिवर्तन होते हैं, वह नष्ट होने की ओर अग्रसर है, इसलिए उसे असत् कहा जाता है । अपदार्थ का नाश नहीं होता, इसलिए उसे सत् कहा जाता है । तत्त्वदर्शी महापुरुष असत् और सत् दोनों को जानता है, इनका उन्हें अनुभव होता है क्योंकि वह सर्वत्र केवल एक सत्तावान को ही देखता है । महापुरुष की दृष्टि और साधारण व्यक्ति की दृष्टि में मूलभूत यही अन्तर है । क्या कारण है, इस प्रकार से देखने का ? कारण है - हमने पदार्थ के प्रति आसक्ति रखकर स्वयं को प्रतिदिन नाश की ओर जाने वाली वस्तुओं के साथ जोड़ रखा है ।  

            ‘यद्दृष्टंतन्नष्टं’ का अर्थ है, "जो भी देखा जाता है, वह नाशवान है।" इसका मतलब है कि जो भी भौतिक चीजें देखी जाती है या जिनका अनुभव किया जाता है, वे सभी दृश्य अस्थायी होते हैं और अंततः नष्ट हो जाते हैं । यह एक धार्मिक या आध्यात्मिक विचार है, जो हमें यह बताता है कि इस भौतिक दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है ।

           यह कथन आत्मा और अनात्मा के बीच के अंतर को भी दर्शाता है । अनात्मा अर्थात् पदार्थ । आत्मा अर्थात् अपदार्थ । शरीर और संसार सब पदार्थ के अन्तर्गत हैं । आत्मा, जो कि स्थिर है, वही एकमात्र चीज है जो वास्तव में है । अन्य सभी चीजें, जो कि दिखलाई दे रही हैं, वे अस्थायी और नाशवान हैं । आत्म-अनात्म विवेक का अर्थ है स्वयं (आत्मा) और संसार तथा शरीर (अनात्मा) के बीच अंतर करना । यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो कई धार्मिक और दार्शनिक परम्पराओं में पाई जाती है । इतने विवेचन का निष्कर्ष है कि हमें इन दो तत्वों का स्पष्ट रूप से ज्ञान होना चाहिए -

(अ) अनात्मा (शरीर और संसार):- यह वह है जो परिवर्तनशील, सीमित और अस्थायी है । इसमें शरीर, मन और संसार शामिल हैं ।

 (आ) आत्मा (स्वयं):- यह वह है जो स्थायी, असीम और अपरिवर्तनीय है । यह वह है जो ज्ञान और चेतना का स्रोत है ।

           आत्म-अनात्म विवेक का ज्ञान होने से, व्यक्ति को यह समझने में सहायता मिलती है कि वह क्या है और क्या नहीं है ? आत्म-अनात्म विवेक हो जाने पर दो लाभ हैं - एक तो उसे ज्ञान हो जाता है कि वह स्वयं कौन है । इससे स्वयं के साथ एक मजबूत संबंध स्थापित बन जाता है और दूसरा, स्वयं को जान जाने के कारण संसार के प्रति आसक्ति से मुक्त होना सम्भव हो जाता है । ऐसा हो जाने पर आपका जब अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति से सामना होता है और आप क्रोध, भय या दुःख जैसी नकारात्मक भावनाओं का अनुभव करते हैं, तब आप स्वयं को उस भावना से अलग कर सकते हैं । आप समझ सकते हैं कि ये भावनाएं वास्तव में आपका स्वभाव नहीं हैं बल्कि ये परिस्थितियां आने-जाने वाली (अस्थायी) और परिवर्तनशील हैं । जब आप अपने सुख के लिए किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति को महत्व देते हैं, तो आत्म-अनात्म विवेक से समझ सकते हैं कि वास्तव में वे आपके आनन्द के स्रोत नहीं है ।  तब यह समझ में आ जाता है कि सच्चा सुख और संतोष तो आंतरिक है ।

          संसार और शरीर को सत्ता आपने दी है, उनमें आसक्त होकर । गीता में भगवान कहते हैं -  “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।” अर्थात असत् की सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है । जिस असत् की तो सत्ता नहीं है, उसको तो 'नहीं' कहा जाता है और जिस सत् का कहीं अभाव नहीं है, उसको 'है' कहा जाता है । अतः जो नहीं है, वह 'नहीं' ही है और जो है, वह 'है' ही है । स्वामीजी कहते हैं - संसार पहले नहीं था, अन्त में नहीं रहेगा और वर्तमान में भी निरन्तर नाश में जा रहा है । संसार में सिवाय नष्ट होने के कुछ तत्त्व है ही नहीं, यह अभाव-रूप ही है । नाशवान् शरीर-संसार में जो 'है-पना' दिख रहा है, यह 'है-पन' संसार का नहीं होकर परमात्मा का है । नित्य-निरन्तर बदलने वाले को 'है' मानना गलती है । 'नहीं' को 'है' मान लेने से 'है' रूप परमात्मा की तरफ दृष्टि नहीं जा रही है; नहीं को नहीं मानते ही 'है' का अनुभव हो जाएगा ।

      मानस में तुलसी लिखते हैं - 

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू ।

मायाधीस ग्यान गुन धामू ।।

जासु सत्यता तें जड माया ।

भास सत्य इव मोह सहाया ।। बालकाण्ड - 117/7-8 ।।

       यह जगत् प्रकाश्य है और भगवान राम प्रकाशक हैं । वे माया के स्वामी और ज्ञान तथा गुणों के धाम हैं । जिनकी सत्ता से, मोह की सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य भासित होती है । 

       यही आत्म-अनात्म विवेक है । इस विवेक के जाग्रत होने से मनुष्य को अपना स्वरूप समझ में आ जाता है, फिर स्वरूप में स्थित होते देर नहीं लगती । स्वयं और शरीर का भेद समझ में आ जाने पर मनुष्य का प्रत्येक परिस्थिति में मन और भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित हो जाता है । साथ ही संसार से आसक्ति छूट जाने पर शांति का अनुभव होता है । आत्म-अनात्म विवेक ही हमें आत्म- साक्षात्कार की अवस्था तक ले जाता है ।

             आत्म-अनात्म विवेक एक जीवन भर की यात्रा है । इसका अभ्यास करने और इसे पूर्ण रूप से समझने की आवश्यकता है । यह आपको अपने भीतर के सत्य को खोजने और एक सार्थक जीवन जीने में सहायक सिद्ध हो सकता है ।

           इस चेतन-अचेतन चराचर जगत् को शरीर के स्तर पर देखेंगे तो इसके प्रति आसक्ति पैदा होगी ।  शरीर और इंद्रियों से अनुभव की जाने वाली प्रत्येक वस्तु नाश की ओर अग्रसर है । हमारी इनके प्रति आसक्ति ने ही इनको सत्ता दी है । यही कारण है कि उनमें जब परिवर्तन होता है अथवा वे नष्ट हो जाती है, तब हमें दुःख होता है । संसार का कोई भी पदार्थ क्रियाविहीन नहीं है और यह क्रिया ही उसको बनाती-बिगाड़ती है । इसलिए महत्व क्रिया का है, पदार्थ का नहीं । क्रिया का मूल (अक्रिय परमात्मा) जो है, केवल उसी के कारण पदार्थ सत्ता में आता है अन्यथा स्वयं पदार्थ की कोई सत्ता नहीं है । अतः प्रत्येक परिवर्तित होने वाली वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्य में केवल एक सत्तावान परमात्मा को देखने से हमें उनमें होने वाला परिवर्तन सुखी-दुःखी नहीं कर सकेगा । भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं - 

समं   सर्वेषु   भूतेषु   तिष्ठन्तं  परमेश्वरम् ।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति ।। 13/27 ।।

      जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियों में परमेश्वर को नाशरहित और समरूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में सही देखता है ।

           "यद्दृष्टंतन्नष्टं" का उपयोग प्रायः इस विचार को व्यक्त करने के लिए किया जाता है कि भौतिक संसार में प्रत्येक प्रकार की मोह-ममता, आसक्ति, राग आदि (attachment) से दूर रहना चाहिए और एक आत्मा (परमात्मा) पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए । सब जगह और सबमें एक परमात्मा को ही देखें, यही ‘अदृष्टंतन्नष्टं’ लेख का सार है । 

श्री नारायण स्वामी कहते हैं -

नारायण तब जानिये, लगन लगी या काल ।

जित तित में दृष्टी परै, दीखैं मोहनलाल ।।

- अनुराग रस (177) 

           इसी के साथ इस लेख के समापन की आज्ञा चाहूँगा । आप ‘वासुदेव सर्वम्’ के भाव को अपने हृदय में स्थान देंगे, तभी इस लेख की सार्थकता है ।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।