Thursday, July 31, 2014

संसार -८

                                 रामचरितमानस,तुलसी की एक अमर कृति है । इस ग्रन्थ में राम-कथा भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती को सुनाते हैं । तुलसी के काल तक,उनके जीवन काल में भी सनातन धर्म में दो बड़े धड़े  थे-शैव और वैष्णव । दोनों ही सम्प्रदाय आपस में झगड़ते रहते थे । शैव सम्प्रदाय वाले शिव के उपासक होते हैं जबकि वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान विष्णु की पूजा करते हैं । संत स्वामी तुलसी दास को  उन दोनों संप्रदायों के बीच का लड़ना-झगड़ना  अच्छा नहीं लगता था । उन्होंने यह संकल्प किया कि किसी भी तरह इन दोनों सम्प्रदायों के बीच का झगडा मिटाया जाना चाहिए,समाप्त हो जाना चाहिए । उस समय में किसी को समझाना बुझाना बड़ा ही खतरनाक होता था । एक को कुछ कहो तो वह आपको दुसरे पक्ष का जान कर आपसे ही झगड पड़ता था । तुलसी ने अपना  विवेक काम में  लेते हुए इस रामचरितमानस की रचना की । इस ग्रन्थ में राम (विष्णु ) की कथा को शिव के मुख से सुनाया गया है । इस ग्रन्थ में स्थान स्थान पर कभी शिव,राम (विष्णु) की प्रशंसा करते हैं और कहीं राम (विष्णु) शिव की प्रशंसा करते हैं । प्रारम्भ में  लोगों ने इस ग्रन्थ को हल्के रूप में लिया परन्तु जब इसका गहराई से लोगों ने अध्ययन किया तो सबकी भ्रान्तिया दूर हो गई  । अंत में दोनों ही  सम्प्रदायों के लोग इसे पढ़कर संतुष्ट हो गए ।
                          मैंने यह बात आपके समक्ष इसलिए रखी है क्योंकि संसार निर्माण में अनुभव तभी  काम आता है जब इतिहास में हुई कमियों को,गलतियों को सुधारकर दूर किया जाय । तुलसी ने उन गलतियों को सुधारकर दोनों सम्प्रदायों के बीच भाईचारा बढ़ाते हुए दीर्घकाल से चले आ रहे वैमनस्य को समाप्त किया । विवेकशील पुरुष केवल मात्र इतिहास को दोहराते नहीं है बल्कि "आज" में जीते हुए नया इतिहास बनाते हैं । तुलसी ने  इतिहास को पीछे छोड़ते हुए  "आज" को जिया और निर्विचार होकर जिया तभी तो हमें इतना अच्छा ग्रन्थ मिला । इस ग्रन्थ के अस्तित्व में आने के बाद दोनों ही सम्प्रदायों के मध्य आज तक किसी प्रकार का कोई झगडा नहीं हुआ ।
                 आने वाल कल भी एक संसार का निर्माण करता  है । यह संसार बीते हुए कल के द्वारा निर्मित संसार की तुलना में सत्य  के अधिक नजदीक है । ऐसा तभी होता है  जब भविष्य की योजनायें परमार्थ के लिए हो । अगर आनेवाले कल से संसार आप अपने स्वार्थ से बना रहे हो,तो फिर दोनों ही संसार निरर्थक है । जितने भी महान व्यक्ति इस संसार में हुए है,सभी ने आनेवाले कल को ध्यान में रखते हुए ,परमार्थ हेतु अपने संसार का निर्माण किया है और ऐसा संसार निंदनीय हो ही नहीं सकता । उन्होंने "आज" को परमार्थ के लिए जीया  है,जिससे आनेवाले कल को बेहतर बनाया जा सके ।भविष्य का संसार उन्होंने वर्तमान में बनाया, न कि बीते हुए कल को ही स्मृतियों में रख कर । ऐसा संसार निर्माण अनुकरणीय है ।
क्रमशः
                                              ॥ हरिः शरणम् ॥    

Wednesday, July 30, 2014

संसार-७

              इस संसार को आप चाहे कितना ही निन्दित करें,संसार किसी भी सूरत में इस निंदा का अधिकारी नहीं है ।  हम अपना संसार स्वयं ही निर्मित करते हैं और दोष भी अपने ही बनाये हुए को देते हैं ,यह कैसा व्यवहार है हमारा ? हमें यह संसार अच्छा इसीलिए नहीं लगता क्योंकि हमने आपना संसार सदैव ही बीते हुए कल से बनाया है और वह भी आने वाले कल के लिए । "आज" को जीने के लिए हम कुछ भी नहीं करते हैं ।अच्छा ,वास्तविक और सुन्दर संसार तो सदैव ही आज के लिए होता है ,"आज" से विलग संसार तो सिर्फ काल्पनिक होता है ,असत्य होता है , मात्र एक सपना होता है । इस सृष्टि में केवल "आज" ही सत्य है शेष सभी सपना है । सभी धर्मशास्त्र हमें "आज" में जीने का कहते हैं । आप न तो बीते हुए कल में जीकर आनंदित हो सकते हैं और न ही आने वाले कल में जीने की  योजनायें बनाकर ।
                    भविष्य के कल का संसार सदैव ही बीते हुए कल के  इतिहास से बनता है । चाहे यह भविष्य का संसार हम आज बना रहें हो,परन्तु उसका आधार सदैव ही बीता हुआ कल ही होता है । बीते हुए कल का कार्य आज हम अगर करते हैं अर्थात इतिहास की पुनरावृति अगर हम करते हैं तो उसकी न तो "आज" के सन्दर्भ में कोई उपयोगिता है और न ही भविष्य में कोई उपयोगिता होगी । इसी लिए मैंने कहा है की इतिहास का अनुभव काम में लेने का कोई औचित्य नहीं है । हाँ, इतिहास का अनुभव तभी काम में आता है जब उस समय की हुई गलतियों को हम दोहराए नहीं और अच्छी बातों को आत्मसात करते हुए आज उसी कार्य को एक नए तरीके से करें । 
                  बीता हुआ कल वापिस लौट कर नहीं आने वाला और आने वाले कल को किसी ने आज देखा नहीं है ,यह  एक सार्वभौमिक सत्य है । इस सत्य को स्वीकार और आत्मसात करते ही हम "आज"को जीना सीख जायेंगे । आज में जीना प्रारम्भ करते ही यह संसार ,जिसकी आप आज तक निंदा करते हुए आ रहे है ,बड़ा ही सुन्दर और आनंददायक प्रतीत होने लगेगा । यह मेरा "आज"का अनुभव है और इस अनुभव का उपयोग केवल "आज"ही किया जा सकता है । भविष्य के कल को यह अनुभव बेमानी हो जायेगा । "आज" में जीने पर व्यक्ति को संसार नज़र ही नहीं आता ,क्योंकि" आज" को निर्विचार होकर ही जिया जा सकता है ।  विचार तो मस्तिष्क में या तो भूतकाल पैदा करता है या आने वाला भविष्य । "आज" का कुछ भी ,किसी प्रकार का विचार नहीं होता है । क्योंकि "आज" एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया में मस्तिष्क में बनी स्मृतियाँ विचारों के रूप में परिवर्तित होकर बह ही नहीं सकती । उनको विचार बनकर बहने के लिए या तो बीता हुआ कल चाहिए या आनेवाले कल की कोई योजना । दोनों ही "आज"में जीने वाले के मस्तिष्क के लिए करना संभव ही नहीं है ।
क्रमशः
                                          ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Tuesday, July 29, 2014

संसार-६

                 मैं यह कभी भी नहीं कहूँगा कि बीते हुए कल की कोई उपयोगिता नहीं है , बीता हुआ कल बेशक  महत्वपूर्ण है । लेकिन बीते हुए कल को मात्र अपनी स्मृतियों में संजोये रखना अनुचित है । यह आपके मस्तिष्क में एक ताना-बाना बुनता है और इसी ताने - बाने को हम अपना संसार बना लेते हैं । बीते हुए  कल की स्मृतियाँ  ही सदैव आपके विचारों को प्रभावित करती है और मस्तिष्क में उठ रहे विचार ही आपका संसार निर्मित करते हैं । विचार सदैव ही स्मृतियों पर आधारित होते हैं और स्मृतियाँ केवल बीते हुए कल की ही हो सकती है ,"आज" की नहीं । "आज" को जीने के लिए आपका निर्विचार होना आवश्यक है । निर्विचार होना ही आपको "आज"आनंदित कर सकता है। मस्तिष्क में उठ रहे विभिन्न विचार आपको "आज" में रहने ही नहीं देंगे और इस प्रकार यह "आज"भी समाप्त होकर कुछ समय पश्चात् बीते हुए कल में परिवर्तित हो जायेगा । फिर प्रातः उठकर आप पुनः यही विचार करेंगे कि बीते हुए कल में तो हम कुछ भी नहीं कर पाए । इसी प्रकार धीरे धीरे समस्त "आज"मुठ्ठी में भरी रेत की तरह फिसलकर बीते हुए कल में बदल जायेंगे । जीवन भर आप बीते हुए कल को याद कर जीते रहेंगे और आप जानते ही हैं कि इतिहास में जीना कोई जीना नहीं होता है ।
                                  मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि आपका इतिहास चाहे कितना ही स्वर्णिम रहा हो या कलुषित ,"आज" उस इतिहास को याद करते रहने की कोई कीमत नहीं है । इतिहास को याद करते हुए वही लोग जीते हैं ,जो "आज" को जीने का हौसला नहीं रखते । आपका संसार बीता हुआ कल ही क्यों हो ?आप "आज " बेहतर तरीके  से जी कर इतिहास क्यों नहीं बना सकते ?बीते हुए कल की कमियों में सुधार कर लेने वाला ही बीते हुए कल का सही उपयोगकर्ता है । बीते हुए कल की स्मृतियां आपके मस्तिष्क में विचार पैदा कर उसे बोझिल बनाती है जबकि उस कल की कमियों को सुधार कर,गलतियों को न दोहराकर आप अपने "आज"को आनंद पूर्वक जीने की क्षमता पैदा कर लेते हैं । बीते हुए कल की उपयोगिता उस समय के अनुभव से लाभ उठाने तक ही सीमित है ,उस अनुभव की पुनरावृति करते रहने से कोई लाभ नहीं होने वाला । भले ही राम ने रावण से और पांडवों ने कौरवों से युद्ध तीर-कमानों और गदाओं से किये होंगे परन्तु आज इनका उपयोग कर कोई भी सेना युद्ध नहीं जीत सकती । वह अनुभव ,वैसा कौशल आज काम नहीं आएगा । आज अगर युद्ध जीतना है तो परमाणु-हथियार काम में लेने ही होंगे ।
                                 आज अगर हम अपने संसार को बीते हुए कल से बनाते रहेंगे तो फिर किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाएंगे । इतिहास को याद करके कोई भी महान नहीं बना है । जितने भी व्यक्ति महान बने है-चाहे आदि गुरु शंकराचार्य हों,स्वामी दयानंद सरस्वती हो या स्वामी विवेकानंद ,सभी "आज"में जीकर ही महान बने है । उन्होंने बीते हुए कल की कमियों को दूर किया और "आज" को नयी सोच और नए संसार में ढालकर एक नया मार्ग बनाया । इसी कारण वे महान बने और एक स्वर्णिम इतिहास बने । "आज" हम उनकी महानता को याद करके मात्र ही जी नहीं सकते ,बल्कि उनके मार्ग की विशेषताओं को आत्मसात कर ही बेहतर जींदगी जी सकते हैं । हमारा संसार उन महान व्यक्तियों के जैसा ही नहीं होना चाहिए बल्कि उनके विचारों और सोच को अपने अनुरूप अपने जीवन में ढालते हुए ही होना चाहिए ।
क्रमशः
                                                ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Monday, July 28, 2014

संसार-५

                                       बीता हुआ कल कभी भी लौटकर नहीं आता फिर भी न जाने क्यों लोग उसकी चर्चा करते रहते हैं ? मै जानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति सवेरे उठते ही सबसे पहले बीते हुए कल को ही याद करता है और इसके तुरंत बाद वह आने वाले कल के बारे में सोचने लगता है । जबकि इस सृष्टि में सिर्फ "आज"का महत्त्व है ,किसी भी "कल" का नहीं । बीता हुआ कल या तो स्वर्णिम रहा होगा या निराशाजनक । स्वर्णिम भी रहा होगा तो आज उसकी क्या उपयोगिता है ? आज़ादी से पूर्व कई राजा-महाराजा रहे होंगे परन्तु आज वे सब साधारण नागरिक है । फिर भी वे सब अपने आपको "घणी खम्मा"और ठाकुर साहेब कहलाना पसंद करते हैं । क्या कहलाने और कह देने मात्र से ही वो राजा या ठाकुर साहेब हो सकते हैं ? नहीं ना । फिर तो उस स्वर्णिम इतिहास की , बीते हुए कल की कीमत दो कौड़ी की ही नहीं हुई ।
                                     उस बीते हुए कल में जीते रहना ही आपके संसार का निर्माण कर रहा है । "आज" कहाँ है  आपके जीवन में ?आपके जीवन में तो केवल "कल" ही भरा हुआ है ।बीते हुए कल की मुश्किलों को याद करते हुए ही नहीं जीयें ,उस कल में मिले सुख को ही याद करते न रहे.। हाँ,बीते हुए कल की गलतियों से सीख लें परन्तु उन गलतियों को सदैव के लिए भूल जाएँ । अगर आपको मात्र गलतियाँ ही याद आती रहेगी तो फिर आप उन गलतियों को दोहरा भी सकते हैं । यह मानव का प्राकृतिक स्वभाव है । आप की गाड़ी जहाँ भी दुर्घटना ग्रस्त हुई है उस दुर्घटना को याद करते रहने से  फिर आप दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं । परन्तु आप इस दुर्घटना का कारण  ढूंढे कि किस गलती के कारण यह दुर्घटना  हुई थी और भविष्य में उस गलती की पुनरावृति न हो, वहीँ तक इस बीते हुए कल की सार्थकता है । प्रायः आपने बड़े राष्ट्रीय उच्च मार्गों पर कई जगहों पर विशाल बोर्ड लगे देखे होंगे-"दुर्घटना संभावित क्षेत्र"। ऐसे बोर्ड लगाने का कोई औचित्य नहीं है । बोर्ड लगाने के बावजूद भी दुर्घटनाएं अक्सर वहीँ पर होती है । बोर्ड लगे होने के बावजूद क्यों ? उसका कारण है मनुष्य का  स्वभाव । वह अति सावधानी से गाड़ी चलाने लगता है और इस अतिरिक्त सावधानी में वह गलती कर बैठता है और दुर्घटना हो जाती है । जबकि प्रशासन को दुर्घटना के कारण जानकर उन कमियों में सुधार करना चाहिए न कि मात्र बोर्ड लगाकर वाहन चालकों को मात्र बीते हुए कल की सूचना देकर उसे याद दिलाते रहें । यह बोर्ड पढ़कर ही चालक बीते हुए कल के आधार पर संभावित दुर्घटना का एक काल्पनिक संसार रच बैठता है और इसी काल्पनिक संसार में उलझ कर वह कोई गलती कर बैठता है जो कि दुर्घटना का कारण बनती है ।
                           ये उदाहरण तो मैंने सबकी जिंदगी से जुड़े हुए दिए हैं । अगर आप चाहे तो ऐसे सैंकड़ों उदाहरण अपनी निजी जिंदगी से भी ढूंढ सकते हैं जो आप  के बीते हुए कल से आपके सपनों का संसार निर्मित कर रहे हैं । चाहे वह आपके बेटे का जन्म हो,बिटिया की विदाई हो,दोस्तों से हुआ झगड़ा हो,यात्रा के अनुभव हो -सभी आपके संसार का निर्माण कर रहे हैं । आप जरा बीते हुए कल को छोड़ दे,उसके बारे में बिलकुल ही सोचना बंद कर दें और फिर जरा ढूंढें कि आपका यह संसार कहाँ है ?
क्रमशः
                                    ॥ हरिः शरणम् ॥

Sunday, July 27, 2014

संसार-४

                                 जिस दिन व्यक्ति को अपने जीवनकाल में प्रतिदिन आनंद  आने लगेगा,वह जीते जी ही इस संसार सागर को पार कर लेगा । संसार का निर्माण स्वतः ही रूक जाता है,जब आप "आज"में जीना शुरू कर देते हैं । संसार तो "बीते हुए कल"और "आने वाले कल" का ही तो नाम है  । जिसको यह पता है अर्थात जो यह जानता है कि "बिता हुआ कल"कभी भी लौट कर वापिस नहीं आने वाला और "आने वाले कल" में मैं रहूँगा या नहीं ,केवल मात्र वही व्यक्ति "आज" में जी सकता है और आनंद भी प्राप्त कर सकता है । हम सब कुछ जानते हैं फिर भी अनजान बने रहना चाहते हैं । संत महापुरुषों ने बार बार हमें अनेकों बार समझाया है और हमारे  सनातन शास्त्र भी यही कहते हैं कि किसी भी कल की मत सोचो ,केवल "आज" पर ध्यान दो परन्तु यह मनुष्य विवेकशील होते हुए भी इस बात की उपेक्षा कर रहा है ।
                             सबसे पहले हम बात करते हैं उस "बीते हुए कल "की । हमारा इतिहास कितने ही शूरमाओं की गाथा कहता होगा परन्तु जरा विचार कीजिये -क्या हम सब  आज भी उन शूरमाओं के वंशज लगते हैं ?हमारा इतिहास सनातन धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले ऋषि दधिची को तो याद करता है परन्तु आज कितने दधिची यहाँ है ?महाराणा प्रताप को  धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना पड़ा था । उस युद्ध को संचालित करने के लिए मेवाड़ के धनाढ्य व्यक्ति भामाशाह ने अपनी समस्त सम्पति राणा को समर्पित कर दी थी । आज कितने यहाँ भामाशाह है यह आपसे और मुझसे छुपा हुआ  नहीं है?हमारे सनातन धर्म की रक्षा का भाव जिन्दा रहना चाहिए था ,वह तो हम कभी के मार चुके हैं और अपने इतिहास अर्थात "बीते हुए कल"को लिए बैठे हैं । मैं कहता हूँ और स्पष्टतः कहता हूँ कि दधिची या भामाशाह की पुनरावृति नहीं हो सकती क्योंकि वह "बीता हुआ कल"है । हमने अपने उस गौरवशाली इतिहास से "आज"को नहीं जी  सकते । हाँ,उनकी जो सनातन धर्म के प्रति आस्था थी ,भावना थी ,उस आस्था और भाव  को आत्मसात करके "आज"को जी सकते हैं और आनंदित हो सकते हैं । इस भाव के साथ जीना इतिहास में जीना नहीं है । अगर हम उस भाव के साथ आज तक जी रहे होते तो सनातन धर्म की सीमायें ईरान से लेकर जापान तक विशाल भू भाग तक फैली हुई थी, से सिकुड़ कर भारतवर्ष के एक छोटे से हिस्से तक नहीं सिमट जाती । जम्मू-कश्मीर में हमारी अमरनाथ यात्रा संगीनों के साये में संपन्न नहीं होती और न ही हमें हमारे नेताओं के रहमोकरम पर  हमारे प्रार्थना स्थलों पर पूजा करने के लिए इजाजत लेने की आवश्यकता होती ।
                                इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हम लोगों ने अपना संसार "बीते हुए कल"से निर्मित किया है । आज भी हमें दुष्टों और दानवों से संघर्ष करने के लिए राम  या कृष्ण के अवतार लेने का इंतजार है । परन्तु ऐसा कभी होगा नहीं । जिस प्रकार दधिची और भामाशाह बार बार पैदा नहीं होते उसी प्रकार राम और कृष्ण भी पैदा नहीं होंगे । हमारे बीच में से ही कोई दधिची या भामाशाह  होगा ,हमारे बीच ही राम या कृष्ण पैदा होगा । कल वाले ये चरित्र आज नहीं आयेंगे और भविष्य में कभी आयेंगे या नहीं,यह देखने के लिए हम होंगे नहीं। तो फिर पुराने और आने वाले कल की क्यों सोचें,यह तो हमारे संसार का निर्माण ही करेगा । जो करना है आज ही करें -उसी आस्था और उसी भाव के अनुसार और फिर परिवर्तन देखें। यह संसार कहाँ ठहरेगा आपके आगे?
क्रमशः
                                       ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Saturday, July 26, 2014

संसार-३

                                   सृष्टि के प्रारंभ में ही इसी सृष्टि में एक शरीर के रूप में आपका प्रादुर्भाव होता है और सृष्टि के अंत में आप ऐसे ही किसी शरीर को त्याग कर इस संसार से पार हो जाते हैं। परन्तु सृष्टि के प्रारंभ से लेकर सृष्टि के अंत होने तक आपके कई शरीर बदलते रहते हैं और आप का संसार यथावत बना रहता है । केवल मात्र शरीर बदल जाने से संसार नहीं बदल सकता । आप एक शरीर, जो कि एक मनुष्य का है ,के साथ इस संसार में है । मनुष्य शरीर के रूप में आपने अपने संसार का निर्माण कर रखा है । जब यह मनुष्य की देह असहाय होने लगती है तब आप इस देह को त्याग कर अपने संसार में उसी प्रकार बने रहने के लिए पुनः एक नए शरीर के साथ आ जाते हैं । यह शरीर आपके द्वारा किये गए संसार निर्माण के अनुसार ही आपको प्राप्त होता है । इसमे कुछ भी विसंगति नहीं हो सकती । अतः यह कहना एकदम उचित है कि एक शरीर की मृत्यु हो जाना  यानि एक शरीर को त्याग देना मात्र ही संसार सागर से पार हो जाना नहीं है । हो सकता है नए शरीर के प्राप्त हो जाने पर आपका परिवेश बदल जाये,वातावरण बदल जाये परन्तु आपके द्वारा बनाया हुआ संसार कभी भी बदल नहीं सकता । इसका कारण क्या है ?
                            संसार चूँकि आपकी सोच का ही पैदा किया हुआ है अतः आपको जो नया शरीर मिलेगा वह आपकी सोच के द्वारा निर्मित किये हुए संसार के अनुसार और उसी परिवेश में मिलेगा । इसका अर्थ यह हुआ कि आप चाहे कितना ही चीखते चिल्लाते रहें कि आपको संसार सागर के पार जाना है,आप पार हो ही नहीं सकते । आप अपनी सोच को तो रत्ती भर भी परिवर्तित नहीं करना चाहते और पार उतरने की खोखली बातें करते हैं । इससे तो अच्छा है कि आप अपने इस संसार में रहते हुए इसीका आनंद लें ,आनंद तो क्या खाक लेंगे क्योंकि इस सोच से निर्मित आपका संसार आपके इर्द गिर्द ऐसा ताना बाना बुनता है कि आप "आज" में कभी बने ही नहीं रहते । इस संसार में बने रहने के लिए व्यक्ति अपनी सोच से बाहर कभी निकल ही नहीं पाता । और सोच कभी भी "आज" को जीने की नहीं होती । सोच या तो आने वाले कल के लिए होती है या फिर बीते हुए कल की । "आज "को जीने के लिए किसी सोच की,किसी विचार की आवश्यकता नहीं होती है । सोच में जीने वाला,विचारों में जीने वाला व्यक्ति कभी भी "आज" में नहीं जी सकता और जो "आज" को नहीं जी सकता वह सदैव ही आनन्द से महरूम ही रहता है,वह आनंद कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता ।
क्रमशः
                                       ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Thursday, July 24, 2014

संसार -२

                    इस प्रकार मैंने अपने लगभग सभी मित्रों से संसार के बारे में उनके विचार जानने चाहे और सबने उनके उत्तर तत्काल दे भी दिए । क्या ऐसा ही यह  संसार है जैसा कि वे समझते हैं?सभी मित्रों के उत्तर में एक समानता  थी जो आपने भी महसूस की होगी । सबने इस संसार को अपनी नज़रों से ही देखा है । हाँ,एक दम सही सोचा और अनुभव किया आपने । संसार को सबने अपने विवेकानुसार ही देखा है । संसार कहीं पर भी दिखाई नहीं पड़ता और  निंदा इस संसार की करते हैं । संसार कुछ भी नहीं है,कहीं भी नहीं है ,सिर्फ आपकी अभिव्यक्ति मात्र ही यह संसार है । जैसे आप दर्पण के सामने खड़े होकर अपना प्रतिबिम्ब देखते हो और उस प्रतिबिम्ब में स्वयं का होना देखते हो उसी प्रकार आपके विचार,आपकी मानसिकता ,आपकी सोच एक दूसरे के प्रति आदि बातें ही आपके इस संसार का निर्माण करती है । संसार को समझ लेना ही संसार से पार हो जाना है । संसार को समझे बिना ,उसको निन्दित करना और परमात्मा से उससे पार करने की प्रार्थना करना केवल किताबी बातें है ।
                               संसार सागर अथाह है अर्थात इसकी कोई थाह नहीं ले सकता । बहुत ही गहराई और विशालता लिए हुए है यह संसार । और हम इसी संसार सागर से पार होने की बात करते हैं ,अपने दम पर इसे जीत लेने का प्रयास करते हैं । क्या इसे पार कर जाना ,इससे जीत पाना इतना आसान है ? हाँ,इसे पार करने का प्रयास प्रायः सभी करते हैं परन्तु यह सभी प्रयास इसकी विशालता को देखते हुए बौने ही साबित होते हैं । इसे पार करने के लिए गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता होती है । किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु किया गया गंभीर प्रयास आपकी सफलता की आधारशिला है । आखिर इस संसार सागर को पार करने से क्या अभिप्राय है ? क्यों हम इस संसार सागर में रहना नहीं चाहते ? जब तक हम इस संसार को समझ नहीं लेते तब तक ये प्रश्न अनुत्तरित ही रहेंगे ।
                   सबसे पहले हमें यह जानना और समझना होगा कि संसार सागर में आना और इसे पार कर लेना क्या है ?प्रायः हम इस संसार में शारीरिक रूप से प्रकट होने को ,अर्थात जन्म लेने को संसार में आना और शरीर को त्याग देना ,शरीर की मृत्यु हो जाने को ही संसार सागर से पार उतर जाना कह देते हैं । इस संसार में सृष्टि के प्रारंभ में प्रथम बार शरीर धारण कर जन्म लेना अवश्य ही इस संसार सागर में आना है परन्तु उस शरीर को त्याग देना,मृत्यु को प्राप्त हो जाना ही संसार सागर से पार चले जाना नहीं है । इस संसार सागर में सृष्टि के प्रादुर्भाव के साथ ही प्रथम बार शरीर के साथ आना अवश्य ही आपकी मर्जी से नहीं हुआ है परन्तु इसको पार कर जाना अवश्य ही आपकी मर्जी पर निर्भर है । हाँ,यह आपका अभी का शरीर ,आपका यह जन्म आपकी मर्जी से अवश्य मिला है परन्तु इस शरीर से मुक्ति के लिए और आगे भविष्य में और नए शरीर न मिले उसके लिए भी आपको प्रयास करने होंगे और वही वास्तव में इस संसार सागर के पार चले जाना होगा ।
क्रमशः
                                   ॥ हरिः शरणम् ॥