Wednesday, August 7, 2019

गुरु-22

गुरु-22
      दत्तात्रेयजी महाराज को गुरु मिलने का क्रम जारी है। उन्होंने अपना 21वां गुरु माना है,एक बाण बनाने वाले को। बाण बनाना कोई आसान कार्य नहीं है।बाण बनाने के लिए पूरी तन्मयता और एक ही स्थान पर टिक कर बैठने की आवश्यकता होती है।जब दत्तात्रेयजी ने देखा कि बाण बना रहे व्यक्ति के पास से ही राजा की सवारी भी निकल गयी और उस कारीगर को इस बात का तनिक से भी आभास नहीं हुआ, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। बुद्धि का उपयोग कर इस घटना का सार जब उनको मिला तो उस बाण बनाने वाले कारीगर को भी उन्होंने अपना गुरु मान लिया।
           दत्तात्रेयजी कहते हैं कि आसन और श्वास को जीतकर वैराग्य तथा अभ्यास के द्वारा अपने मन को वश में कर उसे अपने लक्ष्य में लगा देना चाहिए। जैसे बाण बनाने वाला अपने अभ्यास और तन्मयता से उच्च कोटि के बाण का निर्माण कर लेता है।
         इस संसार में सारा खेल मन का ही है।"मनः एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयो" अर्थात मनुष्य के बंधन का कारण उसका मन है और मन ही उसके लिए मुक्ति का मार्ग खोल सकता है। मोक्ष का मार्ग खोलने के लिए मन का उपयोग कैसे किया जाता है, बाण बनाने वाले से सीखा जा सकता है।आसन और श्वास को जीतकर वैराग्य धारण करें और अभ्यास करते हुए मन को वश में करें। फिर मन को जीवन के एक मात्र लक्ष्य, परमात्मा की ओर लगा दें।जब मन परमात्मा में स्थिर हो जाता है तो फिर कर्मवासना भी जाती रहती है।इस प्रकार जिस का चित्त अपनी आत्मा में स्थिर हो जाता है, उसे फिर बाहर भीतर किसी भी बात का ज्ञान नहीं रहता।
      बाण बनाने वाले का चित्त भी स्थिर था, तभी तो उसको पास से गुज़र गई राजा की सवारी का भान तक नहीं हुआ।एक ही स्थान पर शरीर को स्थिर रखते हुए, मन को केवल बाण बनाने के लक्ष्य पर स्थिर करते हुए ही उत्कृष्ट श्रेणी का बाण बनाया जा सकता था। एक निपुण कारीगर की यही पहचान होती है कि वह अपना कार्य कितनी तन्मयता और मन तथा शरीर को स्थिर रखकर करता है। यही आधार आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।दत्तात्रेयजी ने यह सीख बाण बनाने वाले कारीगर को बाण बनाते देखकर ही ली है, इसीलिए उन्होंने उसको अपना गुरु माना है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Tuesday, August 6, 2019

गुरु-21

गुरु-21
          एक परिवार के सभी सदस्य केवल एक कुमारी कन्या  को घर की देखभाल के लिए छोड़कर किसी आवश्यक कार्य से बाहर गए हुए थे। कन्या विवाह योग्य थी और उसके माता पिता किसी योग्य वर की तलाश में थे। संयोग से उसी दिन उस कन्या को देखने के लिए कुछ लोग उनके घर पधारे। घर पर उस समय कुमारी के अतिरिक्त कोई अन्य के न होने के कारण उसी कन्या ने सबका आतिथ्य-सत्कार किया। अतिथियों को भोजन कराने की तैयारी करने के किये वह घर के अंदर जाकर धान कूटने लगी। उसने दोनों हाथों में चूड़ियाँ पहन रखी थी, जो धान कूटते समय तेज आवाज़ कर रही थी।उसे अनुभव हुआ कि तेज़ आवाज़ से अतिथियों को पता लग जायेगा कि वह भीतर धान कूट रही है। उस समय स्वयं के द्वारा धान कूटा जाना निर्धनता का प्रतीक माना जाता था। धान कूटने की आवाज़ कहीं अतिथियों तक नहीं पहुंच जाए इसलिए उसने प्रत्येक कलाई में दो दो चूड़ियां रखी और शेष सभी चूड़ियाँ एक एक कर तोड़ डाली और फिर से धान कूटने लगी। परंतु यह क्या ? चूड़ियां तो फिर भी बज रही थी। अंततः उसने दोनों कलाइयों से एक एक चूड़ी और तोड़ डाली और एक एक चूड़ी ही पहने रखी। अब धान कूटने पर कोई आवाज़ नहीं हो रही थी।
         दत्तात्रेयजी कहते हैं कि राजा यदु! मैं भी उस समय घूमता घामता लोगों का व्यवहार देखने उधर ही चला आया था। जब मैंने उस कुमारी कन्या का इस प्रकार चूड़ियों को तोड़ डालने का यह कृत्य देखा तो मुझे ज्ञान हुआ कि जब बहुत सारे लोग एक साथ रहते हैं तब आपस में बहुत कलह होती है।दो लोग भी साथ रहते हैं तो भी कुछ न कुछ बातचीत तो चलती ही रहती है। अतः परमात्मा के ध्यान के लिए सबसे अच्छा है कि उस कुमारी कन्या के हाथ में एक एक रह गई चूड़ियों की तरह अकेले ही रहा जाए।
      राजस्थान में इससे मिलती जुलती एक बात कही जाती है -
एक का भजन, दो की पढ़ाई।
तीन की गप्प, चार की लड़ाई।।
        कहने का अर्थ है कि अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर होने वाले व्यक्ति को किसी के साथ की इच्छा नहीं रखनी चाहिये। किसी अन्य का साथ होना इस मार्ग की प्रगति में बाधक है। परमात्मा की ओर जाने वाले व्यक्ति को अकेले ही चलना पड़ता है। फिर अकेलेपन को एकांत में परिवर्तित होते देर नहीं लगती। फिर परमात्मा के अतिरिक्त कोई शेष नहीं रहता, "मैं" भी नहीं।एक से अधिक का साथ रहने पर ऐसा हो पाना सदैव के लिए असंभव ही बना रहेगा।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Monday, August 5, 2019

गुरु-20

गुरु-20
         दत्तात्रेय महाराज कहते हैं कि-
-मैं अपने आप में ही क्रीड़ा करता रहता हूँ।
-घर व परिवार वालों को जो चिंता होती है,वैसी मुझे कभी भी नहीं होती है।
-मैं अपनी आत्मा में ही रमन करता रहता हूँ।
-मुझे मान-अपमान का कोई ध्यान/बोध ही नहीं है।
      हे राजन्!यह शिक्षा मैंने एक बालक से ली है इसीलिए मैं सदैव मौज में रहता हूँ। इस संसार में इस निश्चिंत और परमानन्द अवस्था को केवल दो प्रकार के ही व्यक्ति प्राप्त होते हैं-एक तो भोला भाला निश्चेष्ट बालक और दूसरा गुणातीत पुरुष।
         बालक को तो सांसारिक क्रियाकलापों का ज्ञान नहीं होता लेकिन जीवन में सांसारिक अनुभव कर लेने वाले व्यक्ति के लिए पुनः बालक बनकर उस जैसा व्यवहार करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। कठिन इसलिए है क्योंकि वह सभी प्रकार के कर्म जो उसके द्वारा होते हैं वह उन कर्मों का होना न मानकर स्वयं के द्वारा किया जाना मानकर उनका कर्ता बन जाता है। वास्तव में देखा जाए तो कर्म किसी व्यक्ति द्वारा किये जाते नहीं हैं बल्कि प्रकृति के गुणों के कारण स्वयमेव ही होते हैं। जब हम कर्मों का गुणों के कारण होना समझ लेते हैं, उसी दिन से हमारा व्यवहार अपने आप ही एक बालक की तरह हो जाएगा।
         कर्मों का गुणों के द्वारा होना और अपने में गुणों का न होना, ये दोनों बात मान लेना ही गुणातीत हो जाना है। प्रकृति के तीन गुण, सत्व,रज और तम ही प्रत्येक कर्म सम्पन्न होने के कारण है। ऐसे कर्म क्रिया कहलाते हैं। गुणों के कारण होने वाली क्रियाओं को अपने द्वारा किया जाने वाला कर्म मान लेना ही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है।जब हम इन गुणों से भिन्न होकर, इन गुणों से आगे बढ़कर सोचेंगे तो हमें अनुभव होगा कि इतने दिन हम ही भ्रम में थे कि सब कुछ जो क्रियाएं प्रकृति के गुणों के कारण हो रही थी, उन्हें हम अज्ञानवश अपने द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले कर्म मान रहे थे। इस अवस्था को उपलब्ध हो जाने वाला पुरुष ही गुणातीत कहलाता है।गुणातीत पुरुष ही बालक का स्वभाव अपना सकता है। बालक और गुणातीत पुरुष में भी अंतर होता है हालांकि उनकी क्रियाओं में कोई अंतर नहीं होता। बालक को संसार का ज्ञान नहीं होता, उसको इस बात का बोध ही नहीं होता कि कोई उसका सम्मान कर रहा है अथवा अपमान।परंतु गुणातीत पुरुष को मान अपमान का ज्ञान अवश्य होता है परंतु उनका अनुभव उसे दोनों अवस्थाओं में एक समान होता है अर्थात वह मान अपमान पर ध्यान देने की स्थिति से बहुत ऊपर उठ चुका होता है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Sunday, August 4, 2019

गुरु-19

गुरु-19
         मनुष्य के साथ सबसे बड़ी विडंबना है कि वह अपनी पसंद की वस्तुओं को इक्कट्ठा करता है। एक दिन यही वस्तु संग्रह उसके दु:ख का बहुत बड़ा कारण बनता है। हमारी सुख की चाहना ही हमें संग्रह करने को बाध्य करती है परंतु हम यह भूल जाते हैं कि संग्रह  ही दुःख का जनक है। संग्रह के कारण उस संग्रहित वस्तुओं पर सदैव ही दूसरों की नज़र बनी रहती है और अवसर पाकर वह उनको अपने अधिकार में करना चाहता है। अगर वह उन्हें किसी भी प्रकार अधिकृत कर भी लेता है, तो फिर उसके लिए भी एक दिन वह संग्रह दुःख का कारण बन जाता है। अकिंचन मनुष्य, जिसकी कोई चाहना ही नहीं है, वह संग्रह में विश्वास ही नहीं करता।यहां तक कि वह किसी भी बात का मानसिक संग्रह तक भी नहीं करता। यही कारण है कि चाहना रहित पुरुष सदैव सुखी रहता है। अतः अकिंचन भाव युक्त पुरुष ही परमात्मा को पाने का अधिकारी होता है।
           यह ज्ञान दत्तात्रेयजी ने अपने 18वें गुरु कुरर पक्षी से लिया। कैसे लिया? इसके पीछे भी एक वृतांत है। एक कुरर पक्षी का पेट भर हुआ था फिर भी ताज़ा मांस के एक टुकड़े को पड़े देखकर मन ललचा गया। बाद में खा लेने की सोचकर उसने वह टुकड़ा अपनी चोंच में उठा लिया। वह उसको छुपाने के लिए कोई सुरक्षित स्थान की तलाश कर रहा था।बस, इतना ही पर्याप्त था, उसके जीवन में दुःख को प्रारम्भ करने के लिए। दूसरे पक्षियों ने जब उसकी चोंच में वह मांस का टुकड़ा देखा, तो सभी छीनने के लिए उसके पीछे पड़ गए। अब वह आगे आगे, शेष सभी उसके पीछे पीछे। चोंच मारकर सब उसे घायल कर रहे थे। वह पीड़ा से व्याकुल था। आखिर उसकी चोंच से वह मांस का टुकड़ा नीचे गिर गया। मांस के उस टूकड़े के छूटते ही सभी अन्य पक्षियों ने उसको पीड़ा देना भी छोड़ दिया और उस मांस के टुकड़े को लेने उस ओर चले गए। तब उस कुरर पक्षी को यह अनुभव हुआ कि झगड़ा व्यक्तिगत न होकर अधिग्रहित किये गए मांस के उस छोटे से टुकड़े के लिए था, जिसे उसने भविष्य में खाने के लिए संग्रहित करने का प्रयास किया था।उसकी समझ में आ गया था कि संग्रह ही दुःख का कारण है।
         दत्तात्रेयजी ने उस दिन कुरर पक्षी से सीख ली कि मनुष्य को कभी भी संग्रह नहीं करना चाहिए अन्यथा उसके जीवन से दुःखों का निवारण कभी भी नहीं हो पायेगा।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Saturday, August 3, 2019

गुरु-18

गुरु-18
    वैराग्य के पैदा होते ही पिङ्गला ने वहीं ड्योढ़ी पर खड़े खड़े एक गीत गाया।परमात्मा को समर्पित वह गीत बड़ा ही अनुपम था।पिङ्गला जो गीत गा रही थी उसका सार है कि "हाय हाय, मैं भी इंद्रियों के वश में हो गई।मेरे मोह की असीमता को तो देखो, जो उन दुष्ट पुरुषों से विषय सुख पाने की कामना जीवन भर करती रही, जिनका स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं था।मेरे स्वयं के भीतर परमात्मा निवास करते हैं, जो परम सुख और परम धन को देने वाले हैं। मैं उनको भी भुला बैठी।भला, मेरे जितना भी कोई मूर्ख होगा।जगत के पुरुष तो अनित्य हैं जबकि परम पुरुष नित्य हैं। जगत के पुरुष तो प्रेम देने का नाटक भर करते हैं जबकि वास्तविक प्रेम करने योग्य तो परमात्मा ही हैं।हाय हाय!मैंने जीवन भर क्या किया?उन पुरुषों के पीछे पड़ी रही, जो केवल भय, दुःख, आधि-व्याधि,शोक और मोह के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे सकते थे। मैंने व्यर्थ ही वेश्या वृति के माध्यम से ऐसे पुरुषों का सेवन किया।मैंने व्यर्थ ही अपने शरीर और मन को क्लेश दिया। मेरा यह हाड़ मांस से बना शरीर बिक गया, केवल कुछ धन के लिए। धन से मैं संसार के सुख चाहती रही।कैसा दुर्भाग्य है मेरा।"
          पिङ्गला आगे कहती है-"वैसे तो यह मिथिला विदेहों की नगरी है, जीवन-मुक्त पुरुषों की नगरी है, केवल एक मूर्ख मैं ही हूँ जो यहां निवास करती हूँ।केवल मैं ही एक ऐसी स्त्री हूँ जो परमात्मा को छोड़कर अन्य पुरुषों की अभिलाषा करती हूँ। अब मैं भी अपने आपको देकर उस परमपिता प्रभु को खरीद लूंगी, उनसे लक्ष्मी की तरह व्यवहार रखूंगी और प्रेम करूंगी।
       आज परमात्मा मेरे पर प्रसन्न हुए हैं, जो मेरे में वैराग्य भाव उत्पन्न हुआ है।अवश्य ही मेरे द्वारा पूर्व में किये गए किसी शुभ कर्म से विष्णु भगवान मुझ पर प्रसन्न हुए हैं।अब मैं प्रारब्ध स्वरूप जो मुझे मिल जाएगा, उसी में संतुष्ट रहूंगी।आज से मैं किसी अन्य पुरुष की ओर न ताककर केवल अपने प्रभु के साथ ही विहार करूंगी।" सत्य है, जिस समय मनुष्य विषयों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, उसी समय से वह अपनी रक्षा करने में समर्थ हो जाता है।
        इस प्रकार पिङ्गला वेश्या ने ऐसा निश्चय कर धनी पुरुषों से मिलने वाले विषय सुख और धन मिलने की आशा का परित्याग कर दिया और शांत भाव से जाकर अपनी सेज पर सो गई। आशा ही सबसे बड़ा दुःख है और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है।जब पिङ्गला वेश्या ने पुरुष की आशा त्याग दी तभी वह सुख से सो सकी।दत्तात्रेय भगवान कह रहे हैं कि इसी प्रकार हमें भी संसार के किसी भी प्राणी से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए क्योंकि आशा ही सभी प्रकार के दुःखों की जननी है। पिङ्गला वेश्या के वृतांत से हमें यही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Friday, August 2, 2019

गुरु-17

गुरु-17
        बहुत प्राचीन समय की बात है।मिथिला नगर में एक वेश्या रहती थी। उसका नाम था पिङ्गला। उसका प्रतिदिन एक ही कार्य था। शाम होते ही सज धज कर अपने निवास की ड्योढ़ी पर आकर खड़ी हो जाती और अपनी अदाओं से रास्ते से गुजरने वाले पुरुषों को आकर्षित करती। उन्हें पैसे के बदले शारीरिक सुख लेने के लिए आमंत्रित करती। वास्तव में उसे शारीरिक सुख प्राप्त करने की कोई कामना नहीं थी बल्कि उसके मन में पुरुषों को शारीरिक सुख देने के बदले उनसे मिलने वाले धन की कामना रहती थी । इस प्रकार विदेह नगरी में रहते हुए उसे कई वर्ष बीत गए। उसने अपने शरीर का उपयोग कर बहुत सारा धन इक्कट्ठा कर लिया था।
          एक दिन इसी प्रकार सज धज कर वह अपने घर की ड्योढ़ी पर खड़ी होकर किसी पुरुष का इंतज़ार कर रही थी। लोग बाग आ जा रहे थे। सभी उस पर एक उड़ती हुई दृष्टि डालते और आगे बढ़ जाते।उसे पुरुष की कामना नहीं थी बल्कि उससे मिलने वाले धन की आशा थी। उसके मन मे धन की कामना इतनी अधिक दृढ़ हो गई थी कि आने जाने वाले पुरुष को देखकर वह यही सोचती कि वह कोई बहुत धनी व्यक्ति है। वह आधी रात तक घर के भीतर बाहर इसी आशा से जाती आती रही कि कभी न कभी कोई अधिक धनी व्यक्ति तो उसकी ओर आकर्षित होगा ही परंतु उस दिन कोई उसकी ओर आकर्षित नहीं हुआ।स्त्री के शरीर की भी एक क्षमता होती है, उसके शरीर के आकर्षण को भी एक न एक दिन ढलना होता है। इसी अवस्था को प्राप्त होने जा रहे पिङ्गला के शरीर को आज कोई ग्राहक नहीं मिला।पिङ्गला को तो शारीरिक सुख नहीं बल्कि धन पाने की अभिलाषा रहती थी परंतु आज....आज ही क्या, अब आगे भी इस शरीर के बदले किसी भी प्रकार के धन प्राप्त होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। पिङ्गला वेश्या व्यथित हो गई। उसको इतने वर्षों तक अपने किये हुए कर्मों पर बहुत पश्चाताप हो रहा था। वैसे तो आशा रखना ही अनुचित है और फिर धन की आशा रखना तो बहुत ही अनुचित बात है।किसी धनी से धन पाने की आशा में इंतज़ार करते करते उसका मुख सुख गया।अब उसे अपनी वृति के प्रति ग्लानि हो रही थी। ग्लानि के कारण उस वेश्या पिङ्गला को वैराग्य उत्पन्न हो गया।
क्रमश:
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Thursday, August 1, 2019

गुरु-16

गुरु-16
           दत्तात्रेयजी के सोलहवें नंबर की गुरु है, मछली।नदी और अन्य जल स्रोत में मछली स्वतंत्र रूप से तैरती रहती है।प्रायः हम देखते हैं कि जब लोग नाव से यात्रा करते हैं तब उनमें से कुछेक लोग नदी में आटे से बनी छोटी छोटी गोलियां डालते रहते हैं। उन गोलियों को खाने के लिए मछलियां नाव के पास आ जाती है। मछली पकड़ने का शौक रखने वाले भी ऐसा ही करते हैं। वे आटे से बनी गोली अथवा अन्य कोई  भोजन कांटे में लगाकर उस कांटे को नदी में डाल देते हैं।कांटे के एक छोर से एक डोरी बंधी होती है और दूसरे छोर पर वह  डोरी एक लकड़ी से बंधी होती है, जिसे मछली पकड़ने वाला अपने हाथ में पकड़े रहता है। इस उपकरण को वंशी कहा जाता है। मछली को अपना भोजन नज़र आते ही वह उसे खाने को आती है और भोजन को मुंह में लेते ही कांटा उसके भीतर चुभ जाता है।कांटे में फंसते ही मछली उससे मुक्त होने के लिए छटपटाती है,परंतु मुक्त नहीं हो पाती।मछली की छटपटाहट से वंशी हिलने लगती है, जिससे मछलीमार समझ जाता है कि कांटे में मछली फंस गई है। वह वंशी को तत्काल ही जल से बाहर खींच लेता है। जल से बाहर आते ही मछली मर जाती है।इस प्रकार भोजन के स्वाद के चक्कर में मछली अपने प्राणों से हाथ धो बैठती है।
        दत्तात्रेय कहते हैं कि इसी प्रकार मनुष्य को भी मछली की तरह अपनी रस-इन्द्रीयका गुलाम नहीं होना चाहिए। मनुष्य भोजन लेना बंद कर शेष इंद्रियों पर तो सुगमता से नियंत्रण स्थापित कर लेता है परंतु इससे रसनेन्द्रिय का नियंत्रित होना नहीं कहा जा सकता।रसनेन्द्रिय तो भोजन बन्द कर देने से और अधिक प्रबल हो उठती है।मन मे बार बार स्वादिष्ट भजन से रस प्राप्त करने की कामना जाग्रत होती रहती है।इसका अर्थ हुआ कि रसनेन्द्रिय को भोजन बन्द कर दबाया गया है, उसे वश में नहीं किया गया है। मनुष्य तब तक जितेंद्रिय नहीं हो सकता, जब तक वह रसनेन्द्रिय को अपने वश में नहीं कर लेता।जब वह रसनेन्द्रिय को वश में कर लेता है तब सभी इंद्रियों को वश में करना संभव हो जाता है।
           इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य को सबसे पहले अपनी जिव्हा को वश में करना चाहिए। जिव्हा ही एक मात्र इन्द्रिय है जो बहुत प्रयास करने के बाद भी नियंत्रित नहीं हो पाती। मछली के साथ होने वाली कांटे में फंसने वाली घटना से यह सीखा जा सकता है कि रसनेन्द्रिय को वश में रखना क्यों आवश्यक है?
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।