Saturday, October 17, 2026

सम्भवामि युगे युगे -45

 सम्भवामि युगे युगे -45

           रात्रि गहराती जा रही है । भीतर सियारामजी शयन कर रहे हैं । बाहर वीरासन लगाए लक्ष्मण पहरा दे रहे हैं । पास ही बैठे गुह कुछ खोए-खोए से बैठे हैं । प्रतीत होता है, भीतर कुछ सोच-विचार चल रहा है । राज्य के भावी उत्तराधिकारी को घने वन में घास-पूस की झोंपड़ी में शयन करते देखकर गुह विषादग्रस्त हो जाते हैं । जल भरे नयनों से कैकेई को भला-बुरा कहने लगते हैं । लक्ष्मण विविध प्रकार से उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि जीव अपने दुःख का कारण स्वयं ही होता है । दुःख के लिए किसी दूसरे को दोष देना उचित नहीं है । सभी अपने-अपने कर्मों का फल पाते हैं । 

         भगवान होकर भी कर्मों का फल भोगना पड़ता है, कैसे ? वे तो कर्ता-भोक्ता है ही नहीं । सत्य तो यह है कि जिसने भी भौतिक शरीर लिया है, उसके शरीर से कुछ न कुछ कर्म तो होंगे ही और उन कर्मों से एक सम्बन्ध बना लेना ही जीव के दुःख-सुख का कारण बनता है । प्रत्येक कर्म का परिणाम भी शरीर को भोगना होगा, उस एक शरीर को नहीं तो भावी दूसरे शरीर को, परंतु कर्मों का परिणाम अवश्य मिल कर रहता है । राम अर्थात् भगवान ने अपने पूर्व के मानव शरीर से ऐसे कौन से कर्म किए थे कि आज वन-वन में भटकना पड़ रहा है । विधि का विधान कभी ग़लत नहीं हो सकता । अतः जो हो रहा है, वह उचित ही हो रहा है, इस बात को स्वीकारना चाहिए । इस ज्ञान को अशिक्षित गुह ने कितना समझा, कह नहीं सकते परंतु इतना अवश्य कह सकते हैं कि हम पढ़े-लिखे कथित शिक्षित लोग भी सबकुछ समझते हुए भी कुछ नहीं समझ पाते । 

            राम का उद्देश्य है, पीड़ित साधुओं को पीड़ा से मुक्त करना, अधर्मियों का विनाश करना तथा इनके साथ-साथ वंचितों से मिलकर उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए एक सेतु का निर्माण करना । तभी तो अवध का राजकुमार निषादराज के गले मिलता है, केवट से गंगा पार कराने का अनुरोध करता है और दलित नारी शबरी के हाथों से बेर खाता है । 

         वे स्वयं गंगा को पार कर सकते थे परंतु नहीं किया क्योंकि उन्हें वंचितों, दलितों और पिछड़ों को भी उनके होने का, उनके अस्तित्व का अनुभव जो कराना था । उनका होना इस समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह संसार को बताना आवश्यक था । यदि हम इस आधुनिक युग में भी इस बात को नहीं समझते तो कमी हमारे में हैं । इसका अर्थ है कि हम अपने भीतर बैठे राम की उपेक्षा कर रहे हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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