Friday, October 16, 2026

सम्भवामि युगे युगे -44

 सम्भवामि युगे युगे -44

            अनजान राहों पर जब कोई यात्रा प्रारम्भ होती है, तब सांसारिक व्यक्ति बड़ा व्यथित होता है जबकि एक आध्यात्मिक पुरुष उसे अच्छा अवसर मानता है । चौदह वर्ष कोई कम नहीं होते वन में बिताने के लिए । यहां तो सुबह पास के किसी खेत में भी चले जायें तो थोड़ी देर बाद ही घर लौटने के लिए शाम होने की प्रतीक्षा करने लगते हैं । जहां देखने-बोलने के लिए कोई दूसरा न हो वहां एक पल भी एक घड़ी जितना लम्बा प्रतीत होता है । निर्जन वन उन्हीं को काट खाने को दौड़ता है जो निरुद्देश्य वहां जाकर बैठते हैं । राम का वनगमन निरुद्देश्य नहीं है ।

            इस संसार में हम सभी एक दूसरे से इतने गहरे से सम्बन्धित हैं कि आपका प्रत्येक कार्य, व्यवहार, यहाँ तक कि आपके हृदय की धड़कन तक दूरस्थ बैठे किसी दूसरे जीव तक को प्रभावित करते हैं । ऊपरी दृष्टि से देखकर भले ही कैकेयी के द्वारा दशरथ से मांगे वर को दोष दे दें परंतु गहराई से चिंतन करेंगे तो पायेंगे कि कहीं दूर से आई पुकार ने राम के अन्तर्मन को प्रभावित किया है । पुकार को सुनने के लिए भी तो राम जैसा हृदय चाहिए । राम जैसा हृदय हो तो फिर प्रकृति भी पुकार को सम्बन्धित हृदय तक पहुंचाने के लिए विशेष भूमिका तैयार कर लेती है ।

              रथ शृंगवेरपुर पहुंच चुका है । थोड़ी दूर ही दक्षिण दिशा में कलकल बहती मां गंगा का तट दिखाई पड़ रहा है । भगवान राम, अपनी भार्या सीता और अनुज लखन के साथ रथ से उतरते हैं और दूर बहती गंगा मां को प्रणाम करते हैं । निषादराज गुह अपने राज्य की सीमा में आए दोनों राजकुमारों और जनकदुलारी का अभिवादन करते हैं और आग्रह करते हैं कि वे रात्रि विश्राम उनके निवास स्थान पर करे । पिता की आज्ञा का वास्ता देकर राम मना कर देते हैं । निषादराज अपने अधीनस्थों को साथ लेकर वहीं वन में एक छोटी सी अस्थाई कुटिया का निर्माण कर देते हैं । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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