Saturday, August 22, 2026

मौन -9

 मौन -9

         मनुष्य की पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । इंद्रिय मौन में इन पाँचों का संयम आवश्यक है । आँखों के मौन से अर्थ है अनावश्यक दृश्यों से बचना, जिससे विकार जन्म न लें । श्रवणेन्द्रिय का मौन है, चुग़ली, निंदा आदि व्यर्थ की बातें न सुनना । जिह्वा का मौन है स्वाद की आसक्ति न रखना । त्वचा के मौन से आशय है कि भोग विलास से बचें और स्पर्श सुख के आकर्षण और आसक्ति से मुक्त हों । नासिका का मौन है, गन्ध के प्रति न तो आकर्षण हो और न ही प्रतिकर्षण । 

         प्रत्येक मौन की शुरुआत तो वाक् मौन से होती है परन्तु वाक् मौन को ही मौन समझ लेना साधक की भूल है । उसे वाक् मौन से आगे बढ़ते हुए इंद्रिय मौन को अपनाना चाहिए । परंतु इंद्रिय मौन पर भी अटकना नहीं है, इससे भी आगे बढ़ना है । यह मौन भी वाक् मौन की तरह त्याज्य है अर्थात् इससे भी आगे की यात्रा पर बढ़ना है ।

           काष्ठ मौन, यह मौन का तीसरा भेद है । काष्ठ का अर्थ है, लकड़ी अर्थात् इस मौन में लकड़ी के समान पूर्णतः स्थिर हो जाना, निश्चल हो जाना । इस प्रकार के मौन में शरीर और इंद्रियों के माध्यम से जो भी प्रतिक्रिया दी जा सकती है, उनसे मुक्त हो जाना है । संसार में चारों ओर ऐसे अनेकों विषय बिखरे पड़े हैं, जो आपको विचलित करने का प्रयास करेंगे परन्तु प्रतिक्रिया न देते हुए शारीरिक (स्थूल शरीर) स्तर पर काष्ठ की तरह बने रहना है । इस प्रकार शरीर और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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