मौन -7
मौन एक तपस्या है । मौन होना इतना सुगम नहीं है, जितना सुगम इसको समझा जाता है । मनुष्य की विशेषता है कि वह एकान्त में भी मौन होकर मौन नहीं रह पाता । वह बाहर से भले ही किसी से बतिया न रहा हो परंतु भीतर ही भीतर वह बड़बड़ाता रहता है । प्रश्न है कि फिर ‘मौन’ क्या है ? उत्तर जानने के लिए सबसे पहले यह जानते हैं कि मौन कितने प्रकार के हैं और उनमें कौन सा मौन वास्तव में ‘मौन’ की श्रेणी में आता है ।
योगवाशिष्ठ में मौन के चार भेद बताए गए हैं - वाक्, इंद्रिय, काष्ठ और सुषुप्ति मौन । पहले तीन प्रकार के मौन वास्तव में काष्ठ मौन ही हैं और ऐसे मौन का अनुपालन करने वाला काष्ठ मुनि कहलाता है । काष्ठ मौन मन की स्फुरणा है, चित्त का चलन है । अतः ये तीनों मौन ही उपादेय (useful) नहीं है वरन् त्याज्य है ।
वाक् मौन में केवल शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति नहीं दी जाती । यह केवल ऊपरा-ऊपरी का मौन है अर्थात् दिखावटी मौन है । जानबूझकर न बोलना ही इसका आधार है । आजकल मौन-व्रत की एक परम्परा चल निकली है । आसपास के वातावरण में होने वाली प्रत्येक घटना पर दृष्टि और कान लगे रहते हैं और भीतर ही भीतर उन घटनाओं का विवेचन भी चलता रहता है । विवेचन से जो प्रतिक्रिया निकलनी चाहिए वह नहीं निकाल सकते क्योंकि मौन-व्रत जो है । इस प्रकार मन मसोसकर शब्दों के माध्यम से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है । वाक् मौन में मन सहित सभी ज्ञानेद्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ पूर्ण रूप से सजग रहती है । वाक् मौन केवल वाक् कर्मेन्द्रिय को बलपूर्वक दबाने का प्रयास भर है अर्थात् बहुत कुछ बोलना चाहते हुए भी कुछ नहीं बोलना है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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