मौन -6
ऋषि भी आगे बढ़ते हुए मुनि हो जाता है और मुनि भी ऋषि हो सकता है । नारदजी देवर्षि भी हैं और मुनि भी । विश्वामित्र ऋषि भी हैं और मुनि भी । वशिष्ठजी मुनि कहलाते हैं । जो व्यक्ति ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था तक पहुंच जाता है, फिर उसके पास उस ज्ञान को व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव हो जाता है । ‘शब्दों के अभाव’ से अर्थ है कि उसके शब्दकोश में कोई ऐसा शब्द नहीं है जिससे उस ज्ञान को व्यक्त किया जा सके अर्थात् किसी दूसरे तक पूर्ण रूप से संप्रेषित कर सके । ऐसा मुनि निःशब्द हो जाता है । यह निःशब्दता की अवस्था ही वास्तविक मौन है ।
इतने विवेचन से मुनि के मौन को सुगमता से समझा जा सकता है । ‘योगवासिष्ठ’ में दो प्रकार के मुनि कहे गए हैं - काष्ठ तपस्वी और जीवन्मुक्त । शब्दों के फेर में न पड़ते हुए आगे बढ़ते हैं और मुनि के मौन को समझने का प्रयास करते हैं ।
मौन हुआ पुरुष ही मुनि कहलाता है । परमात्मा की भावना से रहित शुष्क क्रियाओं में बद्ध, निश्चय और हठपूर्वक इंद्रियों को जीतने वाला मुनि काष्ठ मुनि कहलाता है । मौन की सर्वोच्च अवस्था व्यक्ति को जीवन्मुक्त कर देती है । इस विनाशशील संसार के स्वरूप को जानकर जो विशुद्धात्मा और परमात्मा में स्थित ज्ञानी महात्मा बाहर से लौकिक व्यवहार करता हुआ भी भीतर विज्ञानानन्द परमात्मा में तृप्त रहता है, ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त मुनि कहा जाता है । जीवन्मुक्त वह है जो स्थूल शरीर के रहते हुए भी समस्त शरीरों से मुक्त हो गया है । फिर उसके मनुष्य होने और परमात्मा होने के मध्य केवल स्थूल शरीर ही रहता है अन्यथा वह परमात्मा ही है । स्थूल शरीर के गिरते ही वह संसार के आवागमन चक्र से मुक्त होकर परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
।।
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