मौन -8
‘बोलना चाहते हुए भी बोलना नहीं है’, केवल यह वाक् मौन नहीं है । वाक् मौन का उद्देश्य होना चाहिए कि अनावश्यक न बोला जाय, असत्य न बोलें, कटु और कठोर वचन किसी को न कहें तथा मन को शान्त और एकाग्र करने का प्रयास करें । ऐसा करने से आत्म-चिन्तन और साधना में प्रगति होगी । स्मरण रहे कि केवल मुंह बंद रखना ही वाक् मौन नहीं है । यदि मन के भीतर विचारों की उठापटक चलती रहेगी तो वाक् मौन अधूरा है ।
वाक् मौन को सुषुप्ति मौन तक पहुँचने का पहला सोपान कहा जा सकता है । वाक् मौन का व्रत लेते समय ध्यान रखें कि वाणी पर संयम रखना है, सत्य और सर्व हितकारी वचन बोलने हैं तथा अनावश्यक भाषण नहीं करना है । जब इसमें सफलता मिल जाये तो इसी पर नहीं रुकना है बल्कि इंद्रिय मौन की ओर आगे बढ़ना है ।
इंद्रिय मौन में ज्ञानेंद्रियों को विषय उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं हालांकि इन्द्रियाँ विषय-भोग चाहती हैं । इस मौन के केन्द्र में इंद्रियों का संयम होना चाहिए । भीतर ही भीतर मनुष्य भोगों की भूख को अनुभव तो करता हैं परन्तु मौन रहकर वह उस भूख को सहन करने का प्रयास करता है । जो मनुष्य स्वयं को वास्तविक मूक अवस्था तक ले जाना चाहता है, उसके लिए इंद्रिय मौन एक सीढ़ी है । इंद्रिय मौन का उद्देश्य है - इंद्रियों को विषयों का दास होने से बचाना, मन को शान्त रखना, और कामनाओं को नियंत्रण में रखना ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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