आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -29
दूसरे दिन सेठ ने एक बैलगाड़ी पर ब्राह्मण को दान में देने के लिए बहुत सी खाद्य सामग्री को लादा और अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ब्राह्मण के घर की ओर प्रस्थान किया । सेठजी ज्योंही ब्राह्मण के घर पहुंचे ब्राह्मण आँगन में ही खड़ा मिल गया । सेठ ने खाद्य सामग्री उतरवाना प्रारम्भ किया तो ब्राह्मण पूछ बैठा - ‘सेठजी, यह सब क्या है ?’ सेठ ने कहा कि आपके लिए एक महीने का राशन-पानी है । ब्राह्मण ने ऊँची आवाज़ में अपनी पत्नी को पूछा - ‘भाग्यवान, सायं के भोजन के लिए घर में खाद्य सामग्री है या नहीं ।’ पत्नी ने उत्तर दिया - ‘शाम के भोजन के लिए खाद्य सामग्री तो घर में पर्याप्त है ।’ ब्राह्मण ने विनयपूर्वक सेठ से कहा- ‘सेठजी, हमें आज कोई सामग्री नहीं चाहिए । कल की मैं चिंता नहीं करता । कल की कल देखेंगे । अतः यह सब खाद्य सामग्री लेकर आप लौट जाएँ ।’
ब्राह्मण के वचन सुनकर सेठ सुन्न होकर रह गया । वह सोचने लगा कि कहाँ यह साधारण ब्राह्मण जो कल के भोजन तक की चिंता नहीं कर रहा और कहाँ मैं एक सेठ, जो अपनी आठवीं पीढ़ी की चिंता अभी से कर रहा हूँ ।
इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का चौथा सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - “संतुष्टि पूर्ण जीवन।” हमारा जीवन संतुष्टि पूर्ण होना चाहिए । हमारी समस्या यही है कि हम अपने जीवन में कभी भी संतुष्ट नहीं होते । सोशल मीडिया पर आपमें से बहुतों ने पढ़ा होगा - ‘जो प्राप्त है वह पर्याप्त है’ । परन्तु क्या हमने इस वाक्य को अपने जीवन में उतारा है अथवा उतारने का प्रयास भी किया है ? नहीं, बिलकुल भी प्रयास नहीं किया है । अगर हम इस वाक्य को आत्मसात करने का प्रयास भी करते तो कम से कम 50 प्रतिशत लोगों के जीवन से आपाधापी समाप्त हो गयी होती ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरण
म् ।।
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