Sunday, June 21, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -28

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -28

               कोई आधा घंटा लगा होगा मुनीम को हिसाब-किताब लगाने में । भली-भांति निरीक्षण कर मुनीम ने झपकी लेते सेठ को जरा ऊँची आवाज में कहा कि ‘सेठजी, आपके पास इतना धन जमा हो गया है कि आपकी सात पीढ़ियां बिना कुछ कमाए अपने जीवन में मौज कर सकती है ।’

       सेठ को एक झटका सा लगा और उसकी नींद उड़ गयी । वह उठ बैठा और सोचने लगा कि सात पीढ़ी तक तो ठीक है परन्तु आठवीं पीढ़ी क्या खाएगी ? उसने विचार किया कि मुझे और अधिक धन कमाना चाहिए, अपने खर्चों में और अधिक कटौती करनी चाहिए । अब उसने अपने और पत्नी के खर्चों में कटौती करना प्रारम्भ कर दिया । एक गरीब व्यक्ति की तरह रहने लगा । सदैव इसी बात की चिंता करता रहता कि अधिक से अधिक धन कैसे इकट्ठा किया जाये ? इस प्रकार उस सेठ की धन में गहरी आसक्ति हो गयी । उसकी पत्नी और मुनीम उसे बहुत प्रकार से समझाते, परन्तु सेठ पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

  कुछ समय बाद एक संत पुरुष ने उस नगर में प्रवेश किया । एक दिन सेठ के घर पर भी वह आया । सेठ को चिंता मग्न देखकर उसने कारण पूछा । सेठ ने अपनी व्यथा बताई कि उसने सात पीढ़ियों के खाने का इंतजाम कर दिया है परन्तु उसके बाद की पीढ़ियां क्या खाएगी ? संत सब कुछ समझ गए । उन्होंने कहा कि शहर के बाहर एक ब्राह्मण परिवार रहता है, केवल वह ही इस बात का उत्तर दे सकता है, वहाँ जाकर उससे इस प्रश्न का उत्तर पूछे ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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