Saturday, June 20, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -27

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -27

             इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ऐसी स्थिति आने पर उस समय ‘मेरा’ से भी अधिक ‘मैं’ बड़ा और महत्वपूर्ण हो जायेगा क्योंकि आसक्ति सदैव ‘मेरा’ से ‘मैं’ में अधिक होती है। इसलिए अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम ‘मैं और मेरा’ की सम्पूर्ण भावना का ही परित्याग कर दें । जब हमारे लिए ‘तेरा’ से ‘मेरा’ और ‘मेरा’ से ‘मैं’ अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, तब हम अनासक्त होने की कल्पना तक नहीं कर सकते । यह ‘मैं’ ही हमारा अहं (अहंकार) है । ‘मैं’ नहीं रहेगा तो ‘मेरा’ भी नहीं होगा । अतः ‘मैं-मेरा’ की भावना का त्याग करना है तो ‘मैं’ (अहं अर्थात् अहंकार) को छोड़ दें फिर ‘मेरा’ का भी त्याग हो जाएगा ।

         इस प्रकार हमने आसक्ति से अनासक्त होने के तीन सूत्रों पर अभी तक विचार किया है । आइये ! अब चौथे सूत्र की ओर चलते हैं ।

        एक बहुत बड़ा व्यापारी था । वह व्यापार में इतना अधिक व्यस्त रहता था कि उसके पास सदैव समय का अभाव बना रहता था । व्यस्त इतना जैसे कि कहते हैं न कि उसके पास इतना भी समय नहीं है कि वह साँस भी आराम के साथ ले सके । उसने अपने जीवन में एक ही उद्देश्य बना रखा था, धन कमाना, और अधिक, और अधिक धन कमाना । आखिर एक दिन उसको कुछ फुर्सत के क्षण मिल ही गए । दोपहर का समय था । दुकान पर ग्राहक भी नहीं थे । गर्मी की दोपहर वैसे भी उनींदा सी होती है । सेठ को कर्मचारी का ठाले बैठे रहना वैसे ही पसंद नहीं था । सेठ ने समय काटने के उद्देश्य से ऐसे ही मुनीम को पूछ लिया कि ‘मुनीम जी, जरा बही-खाते देखकर बताएं कि मेरे पास कितना धन है ।’ इधर मुनीम ने बही-खाते खंगालना प्रारम्भ किया और उधर सेठजी को झपकी आने लगी । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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