Monday, June 15, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -22

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -22

                अहंकार पूर्ण जीवन आपकी स्वयं के प्रति आसक्ति को ही व्यक्त करता है । किसी में जरा सा भी दोष देखना ही अपने अहं को पोषित करना है । किसी में दोष देखने की भावना रखना ही अहंकार है, जिसके कारण ही व्यक्ति सदैव अपने अतिरिक्त सभी में दोष देखता रहता है और स्वयं को श्रेष्ठ समझता है । इस दुष्चक्र से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है - ‘किसी में भी दोष न देखना’ । निश्चित ही यह सूत्र आपको अनासक्ति की ओर ले जा सकता है ।

        अभी कुछ दिनों पहले एक बड़ी ही प्यारी ज्ञानवर्धक कहानी आचार्यजी से सुनने को मिली थी । दो सगे भाइयों में बड़ा ही अटूट प्रेम था । दोनों भाई विवाहित थे । दोनों की पत्नियाँ भी उनके मनोनुकूल मिली थी । दोनों भाई एक दूसरे से अलग रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे । दोनों के एक-एक पुत्र था । दोनों ही बच्चों पर प्रत्येक भाई का इतना अधिक स्नेह था कि देखने वाले को प्रतीत ही नहीं होता था कि कौन सा बालक किस भाई का पुत्र है ? प्रातः दोनों भाई काम पर जाने के लिए घर छोड़ देते और पीछे से दोनों की पत्नियाँ आपस में मिलजुलकर घर का सारा कार्य निपटाती । सायं दोनों घर लौटकर साथ-साथ ही भोजन करते और विश्राम करने चले जाते । दोनों में सम्पति, घर आदि को लेकर आपस में किसी भी प्रकार का कोई विवाद नहीं था ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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