आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -21
प्रत्येक क्षेत्र में स्पर्धा है, यह हम सभी जानते हैं और सभी इस दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं । जीवन का दूसरा नाम ही स्पर्धा है, स्पर्धा नहीं हो तो जीवन में रस समाप्त हो जाता है । परन्तु इस स्पर्धा में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठना और दूसरों को हेय समझ लेना स्वयं के प्रति आसक्त होना है । अनासक्त कभी भी किसी में कोई कमी नहीं देखता बल्कि कमी अगर है भी तो उसको शालीनता के साथ दूर करने का प्रयास करता है ।
सांसारिक व्यक्तियों में ऐसा आसक्ति भाव देखने को प्रायः मिल जाता है । आध्यात्मिकता में आसक्ति का कोई स्थान नहीं है । जब से धर्म के नाम पर विभिन्न प्रकार के आश्रम और अखाड़े अस्तित्व में आये है, तब से स्वयं की संस्था के प्रति तीव्र आसक्ति दृष्टिगोचर होने लगी है और किसी दूसरे के आश्रम में दोष । कुम्भ के मेले के दौरान अखाड़ों में जो टकराव देखने को मिलता है, वह अपने संगठन के प्रति आसक्ति का प्रदर्शन भर ही तो है, यह दिखाने के लिए कि हमारा अखाड़ा और हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं । केवल अखाड़े ही नहीं बल्कि आज के संत तक किसी सम्मेलन में ऊँचे आसन के लिए आपस में लड़ते दिखलाई पड रहे हैं । जब आप अपने अखाड़े अथवा आश्रम में रहकर उनके प्रति इतने आसक्त हैं तो फिर घर-गृहस्थी क्या बुरी थी ? जब भीतर इतनी आसक्ति है तो फिर घर और आश्रम में अंतर ही कहां रहा ?
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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