Saturday, June 13, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -20

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -20 

             सूफी संत के इस दृष्टान्त से अनासक्त होने का दूसरा सूत्र निकल कर हमारे सामने आता है - ‘किसी भी व्यक्ति में दोष न देखना’। जब हम किसी अन्य व्यक्ति में दोष देखने लगते हैं तो दूसरे कोण अर्थात् परोक्ष रूप से हम स्वयं की प्रशंसा कर रहे होते है । स्वयं की प्रशंसा करना अपने लिए पतन की राह को प्रशस्त करना है । अपने आपको दूसरे से उच्च समझना ही स्वयं के प्रति आसक्त होना प्रदर्शित करता है । परम पिता कहते हैं कि इस संसार में सभी एक समान है, तो फिर स्वयं को अन्य से अलग समझना हमारी सबसे बड़ी भूल है ।

          दूसरे में दोष ढूँढना, स्वयं को श्रेष्ठ बताना है । स्वयं में श्रेष्ठता देखना और दूसरों में दोष ढूंढना, व्यक्ति में अहंकार की भावना पोषित करता है । इस प्रकार की आसक्ति ही अहंकार की जननी है । मनुष्य अपने जीवन में सबसे बड़ी भूल यही करता है कि वह अपने क्षेत्र में अन्य लोगों से स्वयं को बेहतर समझता है । मैं अपने चिकित्सा क्षेत्र में अन्य क्षेत्र के व्यक्तियों से श्रेष्ठ तो हो सकता हूँ परन्तु अपने चिकित्सा क्षेत्र के ही किसी अन्य साथी से नहीं । सभी व्यक्तियों में कोई न कोई एक विशेषता अवश्य होती है । उस विशेषता के कारण वह अवश्य ही श्रेष्ठ हो सकता है । इसलिए किसी व्यक्ति के एक क्षेत्र में दोष हो सकता है परन्तु वह किसी अन्य किसी न किसी क्षेत्र में पारंगत अवश्य ही होगा । जब हम इस बात को स्वीकार कर लेते हैं तो फिर हमें अभिमान छू नहीं सकता । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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