Saturday, January 31, 2015

कर्म-योग |-20

                  महापुरुषों ने अपने योग-कर्म के प्रकार को बदला और फल प्राप्त करने की कामना का विसर्जन कर दिया |कामना के विसर्जन से उनके योग-कर्मों का प्रकार स्वतः ही बदल गया |इन योग-कर्मों से ही उनके जीवन को एक नई ऊँचाई मिली और वे इतिहास में अमर हो गए | कामना पूर्ति के लिए कर्म करके वे कभी भी महान नहीं बन सकते थे |अगर वे भी कामना पूर्ति के लिए विषयों में आसक्त रहकर कर्म करते तो इतिहास में एक साधारण मनुष्य की तरह कभी के गुम हो जाते |उनका अनुभव हमें मात्र यही ज्ञान देता है कि हमें भी अपने जीवन में मिल रही असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें एक अवसर समझना चाहिए,अपने आत्मचिंतन के लिए और योग-कर्मों के प्रकार को परिवर्तित करने के लिए | सफलता भाग्य से अवश्य मिलती है, परन्तु याद रखें, भाग्य भी आपके द्वारा किये जा रहे योग-कर्मों से ही बनता है |

                 अपना भाग्य व्यक्ति स्वयं ही बनाता है और यह भाग्य बिना कर्म किये बनना संभव नहीं है |बिना किसी कर्म के किये, हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने से न तो इस जीवन में कुछ प्राप्त होना है और न ही नए जन्म में |आपके साथ आपके कर्म ही जाते हैं अन्य कुछ भी नहीं |अतः यह सोच कर कि कर्म करने से किसी को या तो  लाभ होगा या किसी को हानि, कर्म करना छोड़ देना अनुचित है |इसी लिए गीता में भगवान ने अर्जुन को दूसरे अध्याय में अपने संबोधन के प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है |
क्रमशः 
                 ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Wednesday, January 28, 2015

कर्म-योग |-19

                         परन्तु होता ठीक इसके विपरीत है |मनुष्य अपनी इन आसानी से प्राप्त उपलब्धियों पर इतराते हुए अहंकारित हो जाता है |फिर अपने अहंकार की पूर्ति और इस अहंकार को सुरक्षित रखतने के लिए वह दुगुने जोश से योग-कर्म करने लगता है |परन्तु जब पूर्वजन्म के कर्मों के फल, भोग-कर्म करते करते इस जन्म में समाप्तप्राय होने  लगते हैं, तब योग-कर्मों को करते हुए भी व्यक्ति अपनी उपलब्धियां बरकरार नहीं रख सकता | इस स्थिति में मनुष्य का पतन प्रारम्भ हो जाता है |यही वह अवस्था है जब व्यक्ति अपनी नाकामियों के लिए भाग्य और ईश्वर को दोष देने लगता है , जबकि इसमें किसी का कोई दोष नहीं होता है |वह अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फल भोग चूका है तथा उसके बाद किये जा रहे योग-कर्मों का फल उसे अब नए जन्म में ही मिलना संभव है, वर्तमान जीवन में नहीं| इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भोग-कर्म जीवन के प्रारंभ में ही किये जा सकते हैं |भोग-कर्म करते हुए व्यक्ति योग-कर्म करना प्रारम्भ कर देता है |इसके उपरांत भोग-कर्म और योग-कर्म समानान्तर चलते रहते हैं| परन्तु इस जीवन में जो भी फल मनुष्यों को कर्म करने पर मिलते हैं,वे सभी फल भोग-कर्मों के परिणाम है,न कि योग-कर्मों के|

               फिर भी व्यक्ति को कभी भी योग-कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए |आज नहीं तो कल,इन किये गए कर्मों का फल मिलना अवश्यम्भावी है |इन कर्मों के फल प्राप्त करने के लिए मनुष्य को इंतजार करना ही होगा |तत्काल फल कभी भी नहीं मिल सकता |हाँ,यह परिस्थिति व्यक्ति को आत्म-निरीक्षण करने का अवसर अवश्य ही प्रदान करती है |व्यक्ति अपनी असफलता के लिए अपने योग-कर्मों को परिवर्तित करने का भी सोच सकता है |कौन से योग-कर्म करने उसके लिए उचित होंगे और कौन से अनुचित? यह समझ में आते ही व्यक्ति कर्म को करने से विमुख नहीं होगा और अपने किये कर्मों के फलों को प्राप्त करने के लिए धैर्य भी नहीं खोएगा | संसार में जितने भी योगी और महापुरुष हुए है, वे जन्म से ही इस रूप में पैदा नहीं हुए थे |इसी प्रकार वे भी भोग-कर्म करते हुए सफलता को प्राप्त हुए और फिर जब योग-कर्म करते हुए वांछित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए तो उन्होंने आत्म-चिंतन किया और पाया कि इतना सब कुछ करके भी सब कुछ पाना इस जीवन में संभव नहीं है |उन्होंने निर्णय किया कि फिर ऐसे योग-कर्म किये जाये जिनका फल कभी भी समाप्त नहीं हो और फल भी ऐसे हों जिनको प्राप्त करने के बाद मन में और फल प्राप्त करने की कामना ही न उठे | इस चिंतन ने अनको एक नयी दृष्टि प्रदान की |यह दृष्टि ही उनको योगी और महापुरुष बना सकी |
क्रमशः 
                     ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Sunday, January 25, 2015

कर्म-योग |-18

योग-कर्म –
                 युवावस्था आते आते मनुष्य योग-कर्मों को करने का अभ्यस्त हो जाता है ,हालाँकि भोग-कर्म उसका साथ कभी भी नहीं छोड़ते हैं | वह बात और है कि व्यक्ति प्रत्येक कर्म को अपने द्वारा किया हुआ कर्म ही मानता है |यही भाव कर्तापन कहलाता है |जबकि गीता में स्पष्ट लिखा है कि मूढ़ व्यक्ति ही “मैं कर्ता हूँ ” ऐसा मानता है |अतः किसी भी कर्म को करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि आप कर्ता हो| भोग-कर्म से योग-कर्म और योग-कर्म से फिर भोग-कर्म, यह चक्र अनवरत चलता रहता है, ऐसे में कोई कर्ता कैसे हो सकता है ?योग-कर्म और भोग-कर्म एक दूसरे के पूरक हैं |अभी तक के  विवेचन से यह स्पष्ट है कि भोग-कर्म करते हुए ही व्यक्ति योग-कर्म करने लगता है और योग-कर्म से ही अगले जन्म में किये जाने वाले भोग-कर्म तय होते हैं |अतः यह एकदम स्पष्ट है कि सब जगह योग-कर्म की भूमिका ही मुख्य होती है |भोग-कर्म निश्चित करने में भी और साथ ही व्यक्ति को कर्म योगी बनाने में | इसलिए योग-कर्म के बारे में जानना बहुत ही आवश्यक है |

                  योग-कर्म वे कर्म होते हैं जो व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा पूर्ति करने के लिए करता है |इन कर्मों को करने में व्यक्ति स्वयं का पूर्ण नियंत्रण रहता है और इन कर्मों से प्राप्त फल के लिए एकमात्र वही जिम्मेदार होता है |इसमें न तो भाग्य का योगदान होता है और न ही किसी अन्य का |जब इन कर्मों के अनुरूप व्यक्ति को फल प्राप्त नहीं होता है,तो वह इसके लिए अपने भाग्य या परमात्मा को दोष देता है|यह धारणा एकदम असत्य है| जिस प्रकार ऊर्जा को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता उसी प्रकार कर्मों को भी कभी नष्ट नहीं किया जा सकता | किये गए कर्मों का फल कभी न कभी प्राप्त होगा ही |प्रायः इस जन्म में किये गए कर्मों का फल अगले जन्म में प्राप्त होता है और इन कर्मों के फल को प्राप्त करने के लिए अगले जन्म में भोग-कर्म करने आवश्यक हैं |दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कामना से किये गए कर्मों का फल नए जन्म में व्यक्ति को भोग-कर्म करने पर आसानी से और अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं |विडंबना यह है कि आसानी से और अनायास प्राप्त हुए फल को मनुष्य अपनी योग्यता समझ लेता है |जबकि यह फल उसे पूर्वजन्म में कामना वश किये गए योग-कर्मों का फल ही होता है |इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति को अपनी उपलब्धियों पर कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए |यह सब पूर्वजन्म के संस्कारों की ही देन है, ऐसा ही मानना चाहिए |
क्रमशः 
                        ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Thursday, January 22, 2015

कर्म-योग |-17

              मन और बुद्धि के बाद योग-कर्मों को प्रारम्भ करने का महत्वपूर्ण कारण है-अहंकार | युवावस्था आते आते व्यक्ति का अहंकार भी विस्तार पाने लगता है |इस अहंकार के कारण व्यक्ति अपने द्वारा किये जा रहे योग-कर्मों से अपनी एक छवि बना लेता है |यह काल्पनिक छवि ही उसमें अहंकार पैदा करती है |जब उसकी इस छवि को किसी भी प्रकार की ठेस लगती है तो उसमें क्रोध पैदा होता है |क्रोध पैदा होने का सबसे एक महत्वपूर्ण कारण व्यक्ति के अहंकार को ठेस लगना भी है |अपनी ठेस लगी छवि को सुधारने के लिए व्यक्ति फिर योग-कर्मों को करने लग जाता है |अगर व्यक्ति में तामसिक गुणों की प्रधानता है तो वह ठेस पहुँचाने वाले व्यक्ति या व्यवस्था से प्रतिशोध लेने के लिए किसी भी प्रकार का कर्म करने को उद्यत हो जाता है |
           योग-कर्मों को प्रारम्भ करने में मन, बुद्धि और अहंकार को कारण के रूप में प्रस्तुत किया गया है| परन्तु इनमें से कर्म करने के लिए कोई एक अकेला कारण होना संभव नहीं है |मन, बुद्धि और अहंकार एक दूसरे के पूरक है |परन्तु मुख्य भूमिका मन की ही होती है | अमृत-बिंदु उपनिषद् में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि-
                       मन एव मनुष्याणां कारणंबन्धमोक्षयो: |
                       बन्धायविषयासक्तंमुक्तंनिर्विषयंस्मृतम् ||
अर्थात् मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मोक्ष का एकमात्र कारण है |विषयों से अनासक्ति मन को मुक्त कर देती है और विषयों के प्रति आसक्ति उसके लिए बंधन बन जाती है |

           अतः यह स्पष्ट है कि मन, बुद्धि और अहंकार तीनों तत्वों में मुख्य भूमिका मन की ही होती है |मन की विषयों के प्रति आसक्ति अर्थात सुख प्राप्त करने की कामना ही व्यक्ति को योग-कर्म प्रारम्भ करने को विवश कर देती है |यह मन की विषयों के प्रति आसक्ति ही कर्मों का प्रारम्भ है |अब यही सोचने की बात है कि इस मन की आसक्ति से पार कैसे पाया जाये कि योग-कर्म करते भी रहें और आसक्ति से दूर भी रहें |यह ठीक उसी प्रकार के कर्म होंगे जैसे जल में पैदा होकर भी कमल उससे निर्लिप्त रहता है |इस संसार में पैदा होने वाला प्रत्येक मनुष्य प्रकृति प्रदत्त गुणों से कर्म करने को विवश अवश्य है परन्तु उसे संसारमें व्याप्त कोई भी कारण विकर्म अथवा सकाम कर्म या निष्काम कर्म करने को विवश नहीं कर सकता |कर्मों को करने के लिए व्यक्ति प्रकृति प्रदत्त गुणों के परवश अवश्य है परन्तु उसे योग-कर्मों में से अपने द्वारा किये जाने वाले कर्मों के चयन करने की स्वतंत्रता अवश्य है |  
क्रमशः 
                          || हरिः शरणम् ||    

Monday, January 19, 2015

कर्म-योग |-16

भोग-कर्म से योग-कर्म की ओर जाने के कारण-
                बाल्यावस्था में भोग-कर्म को करते करते बालक सकाम कर्म के रूप में योग-कर्म करना प्रारम्भ कर देता है |भोग-कर्म करते हुए उसे जिन कर्मों से उसे आनंद या सुख का अनुभव होता है, वह उन कर्मों के प्रति आसक्त हो जाता है |इस आसक्ति में मुख्य भूमिका होती है ,हमारे मन की| मन, इन्द्रियों का राजा है|  वह इन्द्रियों से वैसे ही सुख को प्रदान करने का आदेश देता है, जैसे कर्मों को करने से उसे पूर्व में सुख की प्राप्ति हुई थी| इस आदेश की पालना के लिए कर्मेन्द्रियाँ कर्म करती है | जितना कथित सुख इन कर्मों से मन को प्राप्त होता है उतनी ही उन कर्मों के प्रति व्यक्ति की आसक्ति बढती जाती है |इस प्रकार भोग-कर्मों से प्राप्त सुख से प्रारम्भ हुए, योग-कर्मों से सतत कर्म करते रहने का एक कभी भी समाप्त न होने वाला एक चक्र बन जाता है |इस चक्र को तोड़ पाना साधारण व्यक्ति के वश में नहीं होता और वह कर्मों के इस चक्रव्यूह में फंस कर सारी उम्र छटपटाता रहता है | बाल्यावस्था में किये गए कर्म भोग-कर्म होते हैं और ऐसे कर्म कभी भी संचित नहीं होते |परन्तु इन भोग-कर्मों से प्राप्त सुख के प्रति आसक्त होकर जब व्यक्ति योग-कर्म करने लग जाता है, तब यही कर्म संचित होने लगते हैं |येसंचित कर्म ही व्यक्ति को पुनर्जन्म में ले जाते है और वह केवल भौतिक शरीरों में ही परिभ्रमण करता रहता है |इस प्रकार सुख के प्रति आसक्ति, व्यक्ति को ऐसे किसी भी सुख को प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले कर्मों के प्रति भी आसक्त बना देती है |

                   बाल्यावस्थाके उपरांत जब बालक में बुद्धि का विकास होने लगता है तब वह विभिन्न प्रकार के योग-कर्मों में से उपयुक्त कर्मों का चयन कर अपने द्वारा किये जाने वाले कर्म निश्चित कर लेता है |इन कर्मों के चयन में बुद्धि का महत्त्व होता है| मनुष्य अपनी बुद्धि के द्वारा विभिन्नप्रकार के सुख-साधन प्राप्त करने की कामना पैदा कर लेता है |बुद्धि,इन कामनाओं को पूर्ण करने का उपाय खोजती है |इन उपायों में भविष्य में किये जाने वाले कर्मों का खाका होता है और फिर व्यक्ति का मन उसी के अनुसार योग-कर्म करने को विवश हो जाता है|
क्रमशः 
                   ||  हरिः शरणम् ||

Friday, January 16, 2015

कर्म-योग |-15

                  गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है और अकर्ता से कर्ता श्रेष्ठ है |यहाँ कुछ को यह महसूस हो सकता है कि गीता में यह एक बहुत बड़ा विरोधाभास है | अगर गंभीरता के साथ देखा जाये तो विरोधाभास कहीं पर भी नहीं है |भगवान एक दम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है |इसका अर्थ यह है कि बिना कर्म किये मनुष्य अगले जन्म में मानव शरीर प्राप्त करके भी पशुवत जीवन जीने को अभिशप्त हो सकता है |अतः कर्म चाहे सकाम कर्म हो ,निष्काम कर्म हो या विकर्म, कर्म न करने से कर्म करना ही श्रेष्ठ है | यह अलग बात है कि इन तीनों कर्मों में कौन से कर्म श्रेष्ठ हैं? भगवान का यह कहना कि कर्ता, अकर्ता से श्रेष्ठ है, बिलकुल सत्य है क्योंकि कर्म करने वाला कर्ता कहलाता है |कर्ता कहलाना और अपने आपको कर्ता मानना दोनों भिन्न बाते है |भगवान श्री कृष्ण, अपने आप को कर्ता मानने को ही अनुचित बताते हैं, न कि कर्म करने को |
                 नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः |
                 शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः || गीता 3/8 ||
अर्थात् तू शास्त्र विहित कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा |

        इससे यह स्पष्ट है कि व्यक्ति को शास्त्र सम्मत कर्म ही करने चाहिए |अकर्म से श्रेष्ठ कर्म हैं क्योंकि बिना कर्म किये शरीर का निर्वाह होना भी संभव नहीं है |अतः सभी परिस्थितियों में कर्म करना ही, कर्म न करने से श्रेष्ठ है | जो व्यक्ति परमात्मा की प्राप्ति के लिए घर बार छोड़ देते हैं और कर्म नहीं करना पसंद करते हैं; वे केवल ढोंगी मात्र है | 
क्रमशः
                  || हरिः शरणम् ||

Tuesday, January 13, 2015

कर्म-योग |-14

योग-कर्म के लिए आवश्यक तत्व-
              जीवन में प्रारम्भ के दो वर्ष ही अति महत्वपूर्ण होते हैं | इस अवधि में मानसिक विकास बड़ी ही तेजी के साथ होता है |इस मानसिक विकास के साथ साथ प्रकृति के शेष बचे तीन जड़ तत्व मन, बुद्धि और अहंकार का भी विकास होता है |उपरोक्त तीनों तत्व ही व्यक्ति को भोग-कर्म से योग-कर्म की तरफ अग्रसर करते हैं |जिन शिशुओं में इन तीन तत्वों का विकास अगर किसी कारणवश सुचारु रूप से नहीं हो पाता तो फिर ऐसी स्थिति में उसका भोग-कर्म से योग- कर्म की तरफ जाना असंभव है | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में उपरोक्त तीनों तत्वों का या तो सर्वथा अभाव होता है या फिर उनका विकास सुचारु रूप से नहीं हो पाता |इसी कारण से वे केवल भोग-योनियाँ ही मानी जाती है |उनमें योग-कर्म करने की क्षमता का विकास ही नहीं हो पाता |यही कारण है कि मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों द्वारा किये जा रहे कर्मों का उन्हें किसी भी प्रकार का फल नहीं मिलता ,वे कर्म संचित नहीं हो सकते |अतः इनको योग-कर्म नहीं कहा जा सकता |अन्य प्राणियों द्वारा किये जा रहे कर्म, मात्र पूर्व मानव जन्म में किये गए कर्मों के फल के भोग के लिए ही होते हैं|

                    ठीक इसी प्रकार जिन शिशुओं में मन, बुद्धि और अहंकार का विकास नहीं होता,वे शिशु मात्र भोग-कर्म के  लिए ही इस संसार में आते हैं |उनके द्वारा योग-कर्म करना असंभव ही रहता है | अब प्रश्न यह पैदा होता है कि जब मानव योनि भोग के साथ साथ योग या कर्म योनि है तो फिर कुछ शिशुओं में ऐसा कैसे हो सकता है ?इस शंका का समाधान यह है कि मानव योनि कुछ परिस्थितियों में मात्र भोग-योनि ही बन कर रह सकती है |जब पूर्व मानव जन्म में ऐसे कर्म हुए हो जो उसे मानव योनि तो उपलब्ध करवा सकते हैं परन्तु योग-कर्म करने से वंचित भी रख सकते हैं |यह प्रायः ऐसी परिस्थितियों में होता है जब व्यक्ति कर्म से विमुख होकर किसी भी प्रकार के कर्म करता ही नहीं है, यहाँ तक कि कोई अनुचित मानसिक कर्म तक भी नहीं करता |यह एक प्रकार का कर्मों से पलायन करना  हुआ और ऐसे में उसको नया जन्म किसी अन्य प्राणी के रूप में मिल ही नहीं सकता और वह पुनः मनुष्य के रूप में ही जन्म लेता  है। इसी लिए कर्म करने से पलायन करने को अनुचित माना गया है |
क्रमशः 
                    || हरिः शरणम् ||