Monday, October 1, 2018

पुरुषार्थ-5

पुरुषार्थ – 5
                  आइये जानें कि हमारे सनातन शास्त्र इस जड़ शरीर को सक्रिय करने के बारे में क्या कहते है ? हमारे इस भौतिक जड़ शरीर (Gross body) को सक्रियता प्रदान करता है, हमारा ही सूक्ष्म शरीर (Subtle body) | सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत आते हैं- ज्ञानेन्द्रियों के पांच विषय – शब्द (Sounds), स्पर्श (Sensations like touch,temperature etc.), रूप (Vision), रस (Taste) और गंध (Smell)| इनके साथ मन (Mind), बुद्धि (Intelligence) और अहंकार (Ego) ये तीन तत्व और सम्मिलित हैं, इस सूक्ष्म शरीर में | इस प्रकार कुल आठ तत्वों से इस सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है | इन आठ तत्वों के समूह को “पुर्यष्टक” कहा जाता है और इस शरीर को “आतिवाहिक शरीर“ (Subtle body)| यही शरीर (8 तत्वों से युक्त) जब भौतिक शरीर को त्याग कर बाहर निकल जाता हैं तब हम उस भौतिक शरीर को ‘मृत’ (Dead) कह देते हैं | यह “आतिवाहिक” शरीर ही पुनर्जन्म (Rebirth) और आवागमन का कारण है, अन्य कोई कारण नहीं है | यह सूक्ष्म शरीर स्थूल प्रकृति का नहीं है क्योंकि इसका कोई भी तत्व हमें अपनी आँखों से दिखाई नहीं देता है परन्तु सूक्ष्म होते हुए भी इसको भी स्थूल शरीर की भांति असत ही माना गया है, क्योंकि ये सभी तत्व भी परिवर्तनशील (Changeable) अर्थात अस्थाई (Unstable) हैं | इस प्रकार 15 तत्व स्थूल शरीर के और 8 तत्व सूक्ष्म शरीर के, कुल मिलाकर 23 तत्व इस असत शरीर का निर्माण करते हैं | स्थूल और सूक्ष्म शरीर के मिलने के उपरांत भी यह शरीर असत ही है क्योंकि इसके निर्माण में प्रयुक्त सभी तत्व परिवर्तनशील है | इनमे स्थायित्व का अभाव है अतः ये नित्य नहीं है | नित्य नहीं है, इसलिए सत भी नहीं है | जब इन 23 तत्वों के साथ चेतन के रूप में आकर 24वां तत्व सम्मिलित होता है, तभी यह भौतिक शरीर कर्म करने हेतु तैयार हो सकता है, उससे पहले नहीं | 15 तत्वों के स्थूल शरीर और 8 तत्वों के सूक्ष्म शरीर (आतिवाहिक) के मिलने से बना यह शरीर हिलडुल सकता है, उसमें प्राणों का प्रादुर्भाव अवश्य हो जाता है अर्थात इस शरीर में जीवन है, ऐसा कहा जा सकता है, परन्तु चेतनता (Consciousness) का अभी भी सर्वथा अभाव होता है | इससे यह सिद्ध होता है कि स्थूल शरीर जड़ ही है और सूक्ष्म शरीर जीव है | अकेले सूक्ष्म शरीर से भी इस जड़ शरीर में जीवन तो आ सकता है परन्तु सक्रियता नहीं आ सकती | उपरोक्त 23 तत्वों को मिलाने के उपरांत भी यह भौतिक शरीर जड़ का जड़ ही बना रहता है, हालाँकि इन 23 तत्वों से बने इस शरीर को ‘जीवित’ होना कहा जा सकता है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम् ||

पुरुषार्थ-4

पुरुषार्थ – 4     
 पुरुषार्थ के योग्य मानव शरीर-
          इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया है कि संसार में आने के बाद व्यक्ति जो भी कार्य अपने अभीष्ट (Desirable) को प्राप्त करने के लिए सम्पादित करता है उसे हम उसका पुरुषार्थ कहते हैं | कार्य अथवा कर्म मनुष्य कर्मेन्द्रियों के द्वारा करता है | कर्मेन्द्रियाँ (Organs for act) पांच होती है – वाक् (Vocal cords and tongue), हस्त (Hands), पाद (Legs), उपस्थ (प्रजननांग) (Organs of reproduction) और पायु (Organs of excretion)| कर्मेन्द्रियों की तरह ही पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (Organs for sense) होती है - श्रवनेंद्रिय या श्रोतेंद्रिय अर्थात कान(Organ for hearing, ear), त्वगेंद्रिय अर्थात त्वचा(organ to feel sensations, skin), तेजेंद्रिय या दर्शनेंद्रिय अथवा नयन(Organ of sight, eyes), रसेंद्रिय या स्वादेंद्रिय अथवा जिव्हा(Organ for taste, tongue)तथा घ्रानेंद्रिय अर्थात नाक (Organ for smell, nose)| इन समस्त इन्द्रियों का इस भौतिक शरीर के निर्माण में उपयोगी पांच भौतिक तत्वों – आकाश (Ether), वायु (Air), अग्नि (Fire), जल (Water) और पृथ्वी (Earth) से ही हुआ है | इस प्रकार कुल 15 तत्वों से मिलकर यह स्थूल शरीर बनता है | इन तत्वों को स्थूल इस लिए कहा जाता है क्योंकि इन सभी तत्वों हम अपनी आँखों से देख सकते हैं | इन सभी तत्वों को असत भी कहा जाता है क्योंकि ये सभी परिवर्तनशील है | जो परिवर्तनशील है, जिनमे स्थायित्व भाव नहीं है, भला वह सत कैसे हो सकता है | अतः ये सभी तत्व स्थूल और जड़ प्रकृति वाले कहे गए हैं और असत हैं | ये सभी तत्व मिलकर एक भौतिक शरीर (Physical body) का निर्माण करते हैं |
                   कोई भी भौतिक शरीर तब तक कार्यरूप ग्रहण नहीं कर सकता जब तक कि उसको संचालित करने की शक्ति प्राप्त न हो | अतः यह सिद्ध होता है कि स्थूल शरीर (Gross body) किसी भी प्रकार का कार्य जिसे मनुष्य अपना पुरुषार्थ कहता है, तब तक सम्पादित नहीं कर पायेगा जब तक कि उसे उस कार्य को करने के लिए दिशा निर्देश (Directions) नहीं मिले | जब तक मात्र उपरोक्त वर्णित केवल 15 तत्व एक साथ होते हैं, तब तक वे जड़ (Static) ही बने रहेंगे | उस जड़ शरीर में अगर क्रियाशीलता (Activity) लानी है तो फिर उसे सक्रिय करना होगा | इस जड़ शरीर में सक्रियता आती है, उसके चैतन्य भाव (Consciousness) को प्राप्त करने से | चैतन्य भाव कहाँ से आएगा ? प्रश्न यही उठता है | यह देह है, कोई रोबोट तो है नहीं कि उसे विद्युत् प्रदान करके संचालित किया जा सके | इस जड़ शरीर को आज तक कोई भी वैज्ञानिक अपने स्तर पर प्रयास करते हुए सक्रिय नहीं कर पाया है | जिस दिन विज्ञान ऐसा करने में सफल हो जायेगा उस दिन मानव जीवन अपने चरम (Peak) पर होगा | फिर उसके विकास की यह पराकाष्ठा (Height) होगी  | विज्ञान इस शरीर के सक्रिय होने के बारे में अभी भी मौन है परन्तु हमारे सनातन शास्त्र नहीं | जिस स्थिति में हमारा विज्ञान आज तक पहुंचा है वह हमारे ही शास्त्रों के कारण संभव हुआ है | आज तक जो भी नई नई खोज वैज्ञानिकों ने की है, सब की सब हमारे शास्त्रों में पहले से वर्णित है | आधुनिक विज्ञान के अंधभक्त प्रायः ऐसे प्रश्न करते रहते हैं, जिनका उत्तर समझदार व्यक्तियों द्वारा हजारों वर्षों पहले ही दे दिया गया होता है | वे सभी उत्तर हमारे शास्त्रों में समाहित हैं | आवश्यकता है, समय निकाल कर कुछ उन शास्त्रों का भी अध्ययन कर लिया जाए | हमारे शास्त्रों में तो यह जड़ शरीर सक्रिय कैसे होता है, इसकी जानकारी भी उपलब्ध है, परन्तु विज्ञान अभी इस सम्बन्ध में मौन है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Friday, September 28, 2018

पुरुषार्थ - 3


पुरुषार्थ -3
पुरुषार्थ की उपलब्धियां / पुरुषार्थ के प्रकार –
             जिस अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ किया जाता है उस पुरुषार्थ के परिणाम को भी पुरुषार्थ ही कहा जाता है | पुरुषार्थ के लिए व्यक्ति को कर्म करने आवश्यक होते हैं | कर्म के कारण प्राप्त फल को अर्थात इन पुरुषार्थों की उपलब्धियों को इस पुरुषार्थ के पदार्थ भी कहा गया है | कर्म फल के रूप में उपलब्ध पुरुषार्थ अर्थात पदार्थ चार प्रकार के होते हैं | यथा - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष | गोस्वामी तुलसीदासजी ने इनको स्पष्ट करते हुए रामचरितमानस में लिखा भी है-
       “चारि पदारथ करतल ताकें | प्रिय पितु मातु प्राण सम जाकें ||”
   अर्थात संसार में ये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक जो चार प्रकार के पदार्थ हैं, वे उन व्यक्तियों की हथेली पर अर्थात उसे आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं,जो व्यक्ति अपनी माता-पिता के प्राणों को अपने ही प्राणों के समान प्रिय जानकर उनकी सेवा करता हो |
        इसी प्रकार श्रीरामचरितमानस में एक अन्य स्थान पर गोस्वामीजी लिखते हैं-
             “सकल पदार्थ है जग माहीं | कर्महीन नर पावत नाहीं ||”
    अर्थात इस संसार में सकल पदार्थ यानि उपयोगी पदार्थ उपलब्ध हैं परन्तु जो मनुष्य कर्म नहीं करता है, जिस मनुष्य में पुरुषार्थ करने की भावना का आभाव है, उसे वे पदार्थ कभी भी उपलब्ध नहीं हो सकते | यहाँ पर गोस्वामीजी इन्ही चार पदार्थों की बात कह रहे हैं | इन चार पदार्थों का विस्तार से विवेचन हम आगे करेंगे | उस विवेचन से पहले हमें यह जानना आवश्यक होगा कि यह भौतिक शरीर पुरुषार्थ करने के लिए कैसें तैयार होता है ? इस शरीर की कार्यप्रणाली को जाने बिना पुरुषार्थ के बारे में, इसके चारों पदार्थों के बारे में जानना कठिन होगा |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||

Thursday, September 27, 2018

पुरुषार्थ - 2


पुरुषार्थ – 2
             मनुष्य के जीवन की यह विशेषता है कि वह अपनी इच्छा से भी कर्म कर सकता है | उसके यह कर्म ही उसे इस जन्म में पुरुषार्थ उपलब्ध करवा सकते हैं | पूर्व मानव जन्म के कर्म अर्थात पूर्व जन्म के पुरुषार्थ ही इस जन्म में मनुष्य का भाग्य बनकर आते हैं जो उसे भोग के रूप में उपलब्ध होते हैं | अतः इस मानव देह में रहते हुए व्यक्ति अगर पुरुषार्थ करे तो उसे उसका फल अवश्य ही उपलब्ध होगा | जैसा कि हम जानते हैं कि केवल मानव देह में रहते हुए जो भी कर्म किये जाते हैं,वे ही कर्म फलीभूत होते हैं, अन्य योनियों में रहते हुए किये जाने वाले कर्म कभी भी फल उत्पन्न नहीं कर सकते |  इस प्रकार विवेचन करने के पश्चात् पुरुषार्थ की परिभाषा स्पष्ट हो जाती है –
          “अपने अभीष्ट  (Desirable) की प्राप्ति के लिए, अपने कल्याण (Well being) के लिए जो मानसिक (Mental), वाचिक (Verbal) और कायिक (Somatic) चेष्टायें (Efforts) की जाती है, उन्हीं चेष्टाओं को पुरुषार्थ कहते हैं |”
            पुरुषार्थ की यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि मनुष्य स्वयं ही अपने वर्तमान और भविष्य का निर्माता और उत्तरदायी है | परमात्मा ने पुरुषार्थ के माध्यम से हमें एक ऐसी व्यवस्था दी है, जो मनुष्य को अन्य जीवों से न केवल अलग ही करती है बल्कि उसे स्वयं इस व्यवस्था का अर्थात पुरुषार्थ का सदुपयोग करते हुए परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग भी निर्धारित करती है | अब यह मनुष्य के विवेक पर निर्भर करता है कि वह पुरुषार्थ कैसे, किस प्रकार और किस अभीष्ट की प्राप्ति के लिए करता है ?   
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, September 26, 2018

पुरुषार्थ-1

पुरुषार्थ —1
            पुरुषार्थ-एक छोटा सा मात्र चार अक्षरों से मिलकर बना शब्द परन्तु है बड़ा गूढ़ | पुरुषार्थ, एक संस्कृत शब्द है,जो दो शब्दों के योग से बना है - पुरुष+अर्थ = पुरुषार्थ | अतः इस शब्द का तात्पर्य हुआ – पुरुष होने का मंतव्य , पुरुष होने उद्देश्य | अंग्रेजी में इसको  कह सकते हैं- Purpose of human being or objects of human pursuit. पुरुष का अर्थ है पुर यानि शरीर में रहने वाला | इस  भौतिक शरीर को जो अधिग्रहित करता है वह है चेतन्य अर्थात आत्मा | मनुष्य मात्र शरीर ही नहीं है ,वह शरीर से अलग भी कुछ है ,उसी को हम जीवात्मा कहते है | यह भौतिक शरीर जीवात्मा के कारण ही चेतनता को उपलब्ध होता है | अतः इस छोटे से शब्द पुरुषार्थ का अर्थ हुआ चेतन्य होने का उद्देश्य | जीवात्मा जब सब प्राणियों के शरीर में उपस्थित रहता है,तब क्या उनके जीवन का भी कुछ उद्देश्य होता है ? हाँ, उद्देश्य अवश्य ही होता है | परन्तु मनुष्य को छोड़ अन्य प्राणियों के द्वारा केवल भोग प्राप्त करने का ही एक मात्र उद्देश्य रहता है | अन्य प्राणियों द्वारा केवल पूर्व मानव जन्म के कर्मों के भोग प्राप्त करने के योग्य कर्म ही संपन्न किये जा सकते हैं | उन्हें पूर्व मनुष्य जन्म का पुरुषार्थ ही अपने वर्तमान जीवन में प्रारब्ध अथवा भाग्य के रूप में उपलब्ध होता है | पूर्व मानव जन्म का पुरुषार्थ उन्हें मात्र भोग ही (अर्थ और काम के माध्यम से) उपलब्ध करवा सकता है ,परन्तु धर्म और मोक्ष नहीं | वर्तमान मनुष्य जीवन में भी किसी न किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के कर्म करने की आवश्यकता होती है, उसी को पुरुषार्थ कहा जाता है | यही कारण है कि मनुष्य योनी को कर्म-योनि और मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी योनियों को भोग योनियाँ कहा जाता है |
क्रमशः 
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल 
|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, September 25, 2018

कल से - पुरुषार्थ

एक लम्बी अवधि तक लेखन रुका हुआ था।पहले पारिवारिक परिस्थितियां लेखन के अनुकूल नहीं थी, फिर नई पुस्तक "कलश" के प्रकाशन और विमोचन का कार्य आ गया और अभी कुछ दिन सुजानगढ़ में आचार्यजी के सत्संग-प्रवचन कार्यक्रम में व्यस्त रहा।अब कुछ समय मिला है सोचने का कि किस विषय पर लिखूँ? वैसे एक दो विषयों पर एक लंबी अवधि से चिंतन मनन चल रहा था। भाई श्री अशोकजी शर्मा (B.O.B.) सुजानगढ़ ने कई दिनों, शायद कई महीनों पहले "पुरुषार्थ" विषय को स्पष्ट करने का आग्रह किया था।बड़ा ही महत्वपूर्ण विषय है यह।हम पुरुषार्थ तो करते हैं परंतु यह नहीं जानते कि किस पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिए किस प्रकार पुरुषार्थ किया जाना चाहिए? यह सबसे बड़ी और विकट समस्या है, हम सबके समक्ष।पुरुषार्थ का फल भी पुरुषार्थ है और वह भी दो प्रकार के हैं जो एक जीवन में नहीं बल्कि दो जीवन में मिलने सम्भव होते है।केवल एक जीवन में ही प्राप्त करने हों तो धर्म और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ करना होगा और अगर भावी जन्मों में प्राप्त करने हों तो अर्थ और काम के लिए पुरुषार्थ करने होंगे।अर्थ और काम के लिए किए जानेवाले कर्म, प्रारब्ध यानि भाग्य का निर्माण करते है, जिनको भावी जीवन में ही मिलना होता है।वर्तमान मनुष्य जीवन में ही पुरुषार्थ का फल पाना हो तो केवल धर्म और मोक्ष के लिए कर्म करें।बड़ा ही जटिल विषय है "पुरुषार्थ"।भाई अशोकजी के आग्रह पर इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ।कोई त्रुटि हो तो ध्यान आकर्षित करें क्योंकि कोई भी व्यक्ति शत प्रतिशत किसी कार्य में निपुण नहीं होता। कल से नित्य प्रतिदिन आपसे भेंट करेंगे,"पुरुषार्थ" के साथ।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरि:शरणम्।।

Thursday, June 14, 2018

पिछले कई दिनों से ब्लॉग पर post नहीं दे पाया, इसके लिए आप सभी से क्षमा चाहता हूँ | यहाँ पर कुछ भी post नहीं कर पाया इसका अर्थ यह नहीं है कि कुछ लिखा नहीं था | कुछ छोटे छोटे अंश प्रतिदिन लिखना मेरा एक नियम सा बन गया है | 'पुनर्जन्म और विज्ञान' तथा 'निर्द्वंद्व' के बाद इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर प्रकाशित होने वाली तीसरी पुस्तक के संपादन कार्य में व्यस्त चल रहा हूँ | आशा है शीघ्र ही पुस्तक आपकी सेवा में प्रस्तुत कर सकूँगा | अभी कबीर पर थोडा बहुत लिख रहा हूँ, जिसे आप प्रतिदिन www.facebook.com/Dr.Prakash kachhwal पर पढ़ सकते हैं | कबीर पर श्रंखला समाप्त होते ही पूरे के पूरे लेख को ब्लॉग पर post करूँगा | तब तक इंतजार करें | आशा है आप मुझे क्षमा करेंगे | हरिः शरणम् |