Friday, October 13, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं. 9

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.-9
सत्संगत्वेनिःसंगत्वं, निःसंगत्वेनिर्मोहत्वं |
निर्मोहत्वेनिश्चलतत्वं निश्चलतत्वे जीवन्मुक्तिः ||9||
 अर्थात संत महात्माओं के साथ उठने बैठने से हम सांसारिक वस्तुओं एवं बंधनों से दूर होने लगते हैं | इससे हमें सुख की प्राप्ति होती है | सब बंधनों से मुक्त होकर ही हम उस परम ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं |
          मनुष्य ही नहीं, संसार का प्रत्येक प्राणी वातावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखता है | इसलिए यह आवश्यक है कि मनुष्य को अगर उचित वातावरण मिले तो वह अपने स्वभाव को परिवर्तित कर सकता है | मनुष्य को जन्म से ही कुछ संस्कार पूर्वजन्म के स्वभाव के आधार पर मिलते हैं, जो कि उसके वर्तमान जीवन के प्रारम्भ काल में उसका स्वभाव बनाते हैं | यह स्वभाव उचित वातावरण मिलने अथवा न मिल पाने के कारण परिवर्तित होता रहता है | कहने का अर्थ यह है कि मनुष्य के स्वभाव निर्माण में उसके चारों और के वातावरण की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है | गोस्वामीजी श्री रामचरितमानस में लिखते हैं –
“गगन चढ़हि रज पवन प्रसंगा | कीचहि मिलहि नीच जल संगा ||”
     अर्थात रास्ते में पड़ी मिट्टी वायु का साथ पाकर तो आकाश में ऊपर तक चढ़ जाती है और जब पानी के संग होती है, तो वह कीचड बन जाती है |
           इस प्रकार का होता है, संगति का प्रभाव | सब कुछ निर्भर करता है, आपको मिलने वाले वातावरण पर, आपकी संगति पर | इस भौतिक संसार में कुसंगतियाँ चारों और बिखरी पड़ी है और सत्संग किसी भाग्यवान को ही उपलब्ध हो पाता है | भला इसमें अन्य किस व्यक्ति का दोष ? सौभाग्य से अगर सत्संग मिल गया तो जीवन में उत्थान की ओर अग्रसर हो जाओगे और अगर कुसंग मिला तो फिर पतन होना निश्चित है | एक शेर का बच्चा जन्म लेते ही अपने परिवार से बिछड़ जाता है और दुर्भाग्य से उसका संग एक भेड़ों के झुण्ड के साथ हो जाता है | शेर का बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होते हुए भेड़ों के साथ मिल रहे वातावरण में भेड़ की तरह ही व्यवहार करने लगता है | जब वह युवा हो जाता है, तो उसे देखकर वन के अन्य प्राणी अपने प्राण बचने को उससे दूर दौड़ पड़ते हैं परन्तु शेर के उस बच्चे पर स्वयं के शेर होने का कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता है | एक बार एक वयस्क शेर उसे देख लेता है | वह उसे भेड़ों के झुण्ड से अलग कर दहाड़ने को कहता है परन्तु वह केवल एक भेड़ की तरह मिमियाता ही रहता है | कई प्रयासों के बाद वह एक अच्छी तीव्र दहाड़ लगा पाता है | तब जाकर उसकी समझ में आता है कि वह एक शेर है, भेड़ नहीं | एक भेड़ होना स्वयं का ही भ्रम था, जो उसमें संगति के प्रभाव का परिणाम था | हमारी स्थिति भी भेड़ों के झुण्ड में रह रहे उस शेर के बच्चे से भिन्न नहीं है | हम भी इस भौतिक संसार में रहते हुए अपना वास्तविक स्वरूप भूल चुके हैं |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

||हरिः शरणम् ||

Thursday, October 12, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.8(समापन)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.8(कल से आगे)-
          इस श्लोक में तीसरा और अंतिम प्रश्न है कि इस क्षण भंगुर और विचित्र संसार में हमारा अस्तित्व क्या है ? सचमुच में जिसको हम स्वयं का होना मान रहे हैं, उस भौतिक शरीर तक का कोई अस्तित्व नहीं है | जब तत्व, असत के साथ होकर अपने को असत होना मान लेता है, उसी को हम अपना अस्तित्व होना मान लेते हैं | वास्तव में अस्तित्व है शरीर में स्थित सत का, तत्व का और हम अपना अस्तित्व मान रहे हैं, इस शरीर के होने को | गीता कहती है, ”नासतो विद्यते भावो न भावो विद्यते सत” अर्थात असत की तो सत्ता नहीं है और सत का अभाव नहीं है | शंकराचार्य महाराज इसी बात को स्पष्ट करने के लिए इस प्रश्न के माध्यम से स्पष्ट कर रहे हैं कि यह संसार क्षण भंगुर है, अतः हमारे शरीर का भी क्षण भंगुर होना निश्चित है | फिर भी हम इस शरीर को ही अपना होना मान रहे हैं, तो यह इस संसार की विचित्रता ही हुई न | इसलिए इस संसार को क्षण भंगुर और विचित्र कहा गया है | हमारा अस्तित्व हमारे इस भौतिक शरीर के भीतर उपस्थित उस परमात्म-तत्व के कारण है, न कि इस देह के कारण | जब हमें यह अनुभव हो जायेगा तब हमें स्पष्ट हो जायेगा कि हमारे इस शरीर का जिसे हम अपना होना मान रहे है, इस क्षण भंगुर और विचित्र संसार में कोई अस्तित्व नहीं है | जो स्वयं विनाश शील है, भला उसका और उसके आश्रय रहने वाले का भी कहीं कोई अस्तित्व हो सकता है |
             यह स्पष्ट है कि अस्तित्व एक परमात्मा का ही है अन्य किसी का नहीं | जो इस ब्रह्माण्ड के पूर्व भी था और इसके समाप्त होने के बाद भी रहेगा | वह शाश्वत है, अनादि है | सब कुछ हमारे मोह के कारण है, जो हमें इस असत संसार को भी सत होने का भ्रम दे रहा है | जब आप इस बात पर ध्यान देंगे कि यहाँ न कोई सच्चा साथी है, न कोई पुत्र है और न ही क्षण भंगुर संसार में हमारा कोई अस्तित्व है, तब स्पष्ट हो जायेगा कि हम स्वयं भी परमात्मा के कारण है और वही हमारा वास्तविक स्वरूप है | प्रकृति हमारा स्वभाव है, जो कि परिवर्तनशील है, परमात्मा हमारा स्वरूप है जो कि अविनाशी और अपरिवर्तनशील है | इसलिए शंकराचार्य जी ने कहा है कि-  
का ते कांता कस्तेपुत्र, संसारोSयं अतीव विचित्रः |
कस्य त्वं कः कुत अयातः तत्वंचिन्तययदिदंभ्रातः ||8||
अर्थात कौन है हमारा सच्चा साथी ? हमारा पुत्र कौन है ? इस क्षण भंगुर एवं विचित्र संसार में हमारा अस्तित्व क्या है ? यह ध्यान देने की बात है |
|| भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते ||
कल श्लोक सं. 9
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, October 11, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.-8

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.8-
का ते कांता कस्तेपुत्र, संसारोSयं अतीव विचित्रः |
कस्य त्वं कः कुत अयातः तत्वंचिन्तययदिदंभ्रातः ||8||
अर्थात कौन है हमारा सच्चा साथी ? हमारा पुत्र कौन है ? इस क्षण भंगुर एवं विचित्र संसार में हमारा अस्तित्व क्या है ? यह ध्यान देने की बात है |
      आदि गुरु शंकराचार्य इस श्लोक में तीन प्रश्न कर रहे हैं | प्रथम प्रश्न है, कौन हमारा सच्चा साथी है ? दूसरा प्रश्न है, हमारा कौन पुत्र है ? तीसरा प्रश्न है, हमारा अस्तित्व क्या है ? तीनों ही प्रश्न गूढ़ हैं और एक दूसरे से सम्बंधित भी | कौन है हमारा सच्चा साथी ? क्या इस जीवन में हमें अपने परिवार से बाहर अर्थात पिता और माता के अतिरिक्त जो भी नाते-रिश्ते में व्यक्ति उपलब्ध हुए हैं, वे हमारे सच्चे साथी हैं ? आदि शंकराचार्य महाराज कह रहे हैं कि व्यक्ति जीवन में अपना सच्चा साथी अपनी पत्नी को मानता है | लेकिन क्या वह एक सच्चा साथी सिद्ध हो सकती है | हाँ, सांसारिकता और व्यवहार की दृष्टि से देखा जाये तो यह बात सत्य है कि पत्नी से बढ कर दूसरा अन्य कोई सच्चा साथी नहीं हो सकता | परन्तु जैसा कि शंकराचार्य जी ने भज गोविन्दम् के छठे श्लोक में कहा है कि देह के मरते ही पत्नी भी उसी देह को घृणा की दृष्टि से देखने लगती है, भला ऐसे में हम कैसे कह सकते है कि पत्नी एक सच्चा साथी है ?
             दूसरा प्रश्न है कि हमारा पुत्र कौन है, कौन है हमारा पुत्र ? इस जीवन में जो पुत्र मिला है, क्या आप जानते हैं कि पूर्वजन्म में उसके साथ आपका क्या सम्बन्ध था ? नहीं जानते न | परमात्मा आपको यह बात जनाना भी नहीं चाहते | अगर परमात्मा हमें यह जना दे कि हमारा पुत्र पूर्व जन्म में हमारा दुश्मन था, तो ऐसे में क्या आप उसके साथ एक पिता की तरह व्यवहार कर सकते हैं ? नहीं कर सकते न | क्यों ? क्या अब वह आपका पुत्र नहीं रहा ? परमात्मा ने सब कुछ इतना व्यवस्थित और पूर्व नियोजित ढंग से कर रखा है कि जीवन भर आपको इसका पता भी नहीं चल पाता | सारा खेल केवल कर्म पर आधारित है | कर्मों के अनुसार पत्नी, पुत्र, सगे सम्बन्धी आदि बनते और मिलते बिछड़ते रहते है | हमारे मोह के कारण हमें अपनी पत्नी सच्चा साथी प्रतीत होती है, हमें हमारा पुत्र हमारे बुढ़ापे का सहारा नज़र आता है | वास्तविकता यह है कि हम अपने कर्मों के ऋण अनुबंध के कारण इस जन्म में एक साथ मिलें हैं | कौन कैसे अपना ऋण चुक कर अथवा चुकाकर कब विदा हो जायेगा कहा नहीं जा सकता |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, October 10, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.-7(समापन)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.7(समापन)-
          आपने देखा न कि सेठजी अपने घर में हो रहे झाड़ू के नुकसान की कितनी चिंता कर रहे हैं | एक अल्प नुकसान की जब इतनी अधिक चिंता कर रहे हैं, फिर तो चिंताओं का कभी अंत भी नहीं आना है | बुजुर्ग, जिसने जीवन भर विभिन्न प्रकार के भोग भोगें हैं, उनके परिणाम स्वरूप जो विभिन्न प्रकार की आसक्ति और ममता उनके भीतर स्थाई रूप से स्थान बना चुकी है, वे उसे कभी भी मुक्त नहीं होने देगी | ममता उसे अपने परिवारजनों के लालन पालन की चिंता में डाले रखती है | धन के प्रति आसक्ति धन कम हो जाने की चिंता से उसे सदैव ग्रसित रखती है | एक चिंता हो तो वर्णन किया जा सकता है, यहाँ तो इस उम्र में सभी क्षेत्रों की चिंताएं है | संसार की चिंता उसे सदैव रहती है परन्तु वह वर्तमान जीवन में इस बात की चिंता कभी भी नहीं करता कि उसका भावी जीवन कैसे अच्छा और सुन्दर हो सकता है ? व्यक्ति का शरीर जब धीरे-धीरे जर्जर होने लगता है, कम से कम तब तो उसे न तो परिवार की तथा न ही किसी अन्य बात की चिंता करनी चाहिए | चिंता होनी चाहिए एक मात्र परमात्मा के चिंतन की | परमात्मा का चिंतन ही उसे संसार की इन चिंताओं के बंधन से मुक्त कर सकता है |
               हरिः शरणम् आश्रम, बेलड़ा, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि आपका कर्तव्य अपने बाल बच्चों की परवरिश तक ही सीमित होना चाहिए | उसके बाद की पीढ़ी पर केवल आप अपना आशीर्वाद बनाये रखें | इनकी चिंता करना आपका दायित्व नहीं है | हम आज इसके ठीक विपरीत करते हैं | अपने पुत्र-पुत्री व्यवस्थित हो गए हैं, वे सब अपने कार्य में व्यस्त हैं और हम है कि उनके बच्चों तक की चिंता किये जा रहे हैं | चिंता मुक्त होना आपको है, कोई दूसरा आकर इस चिंता से आपको मुक्त नहीं कर सकता | इस चिंता से मुक्त होने का एक ही मार्ग है, अपने कर्तव्य कर्म के दायित्व से मुक्त होते ही परमात्मा के चिंतन में लग जाएँ | व्यर्थ की चिंताओं में जो फंस जाता है, वह जीवन भर परमात्मा के भजन करने के नाम पर केवल स्वयं को ही धोखा देता रहेगा, अपने ह्रदय से भजन नहीं कर सकता | आवश्यकता है, परमात्मा को ह्रदय से भजने की, दिखावा नहीं करना है | चिन्ता-युक्त बुजुर्ग भजन का दिखावा भर कर सकता है, वास्तविक भजन तो चिंता-मुक्त होकर ही किया जा सकता है |
 इसलिए शंकराचार्य महाराज का यह कथन सत्य है कि -
बालस्तावत्क्रीड़ासक्तः, तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः |
वृद्धस्तावत्चिन्तामग्नः, पारेब्रह्मणिकोSपि न लग्नः ||7||
अर्थात सारे बालक क्रीड़ा में व्यस्त हैं और नौजवान अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करने में समय बिता रहे हैं | बुजुर्ग केवल चिंता करने में व्यस्त हैं | किसी के पास भी उस परमात्मा को स्मरण करने का वक्त नहीं है |
|| भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढमते ||
कल श्लोक सं.8
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Monday, October 9, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.7(कल से आगे-3)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.7(कल से आगे-3)-
       गीता के 8 वें अध्याय का छठा श्लोक कहता है कि –
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ||
अर्थात हे कुन्तीपुत्र अर्जुन, मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उसी भाव को ही प्राप्त होता है, जिस भाव का उसने जीवन भर स्मरण किया है |
      लो कर लो बात | भगवान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि अंत समय में अगर यह भाव है कि बछड़ा झाड़ू खाकर घर में नुकसान कर रहा है, तो फिर मुक्ति कहाँ से होगी ? और हम है कि मान रहे हैं कि अंत समय में अजामिल ने नारायण, नारायण कहकर अपने पुत्र को बुलाया और भगवान  नारायण प्रकट हो गए, वैसे ही हम कर लेंगे | हम अजामिल नहीं है | अजामिल बड़ा ज्ञानी और परमात्मा का भक्त था परन्तु दुर्भाग्य से गलत रास्ते पर चला गया | संतों ने सलाह दी कि अपने पुत्र का नाम नारायण रख ले, उसको नाम लेकर पुकारोगे तो पुनः परमात्मा का स्मरण हो चलेगा | हमने जीवन भर धन, काम आदि के अतिरिक्त किसी बात का विचार ही नहीं किया और सोच रहे हैं कि अपने पुत्र का नाम नारायण रख लेने से अंत समय में उसका नाम पुकारेंगे तो उद्धार हो जायेगा | भ्रम में नहीं रहें, उद्धार कदापि नहीं होगा क्योंकि अंत समय में वाही स्मरण में आएगा जिसका जीवन भर स्मरण किया है |
                 जीवन भर हमने झाड़ू की चिंता की है, उसे ही बचाने में लगे रहे, स्वयं को बचाना भूल गए, तो अब अंत समय में परमात्मा का चिंतन कैसे होगा ? इसीलिए बुजुर्ग अन्त-काल तक भी चिंता ग्रस्त ही रहते हैं, चिंता मुक्त तो परमात्मा का चिंतन करने वाला कोई एक ही हो सकेगा, जिसने जीवन भर परमात्मा का स्मरण किया होगा |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, October 8, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.7(कल से आगे-2)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.7 (कल से आगे-2)-
       गीता के इस 8/5 श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने कह तो दिया कि जीवन के अन्तकाल में जो व्यक्ति मुझको याद करते हुए शरीर त्यागता है, वह मुझको ही प्राप्त होता है, परन्तु क्या जीवन भर कामनाओं को पूर्ण करने में लगा कोई व्यक्ति, जिसने परमात्मा का नाम न लिया हो, अंतिम समय में प्रभु का स्मरण कर सकता है ? मैं कहता हूँ, नहीं, बिलकुल नहीं | आपने जीवन भर जिसका स्मरण किया है, वही आपको अंतिम समय ही स्मरण में रहेगा | आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक दृष्टान्त देते हैं | एक धनी व्यक्ति ने जीवन भर खूब धन कमाया और संचित भी किया | वह इतना अधिक कंजूस था कि जरा सा भी कार्य जिसमें उसे धन का अपव्यय होते लगता था, तुरंत क्रोधित हो उठता था | एक दिन वह मरणासन्न स्थिति में मृत्यु शैया पर पड़ा था | उसका परिवार उसे चारों ओर घेर कर खड़ा था | तभी एक पुत्र ने देखा कि पिताजी कुछ कहना चाह रहे है, परन्तु बोल नहीं पा रहे हैं | सभी पुत्रों ने मिलकर सलाह की | उनका अनुमान था कि पिताजी अपनी धन-सम्पति के बारे में अभी तक उनके पास रही कोई गोपनीय बात बताने जा रहे हैं | सभी पुत्रों ने निर्णय कर तत्काल ही चिकित्सक को बुलाया और उससे कहा कि पिताजी को कोई ऐसी दवा दीजिये जिससे वे कुछ समय के लिए बोल कर अपनी बात कह सके | चिकित्सक ने एक इंजेक्शन दिया | कुछ समय बाद सेठजी लड़खड़ाती आवाज में बोले कि तुम सब यहाँ खड़े-खड़े मुझ मरने वाले को क्या देख रहे हो ? उधर देखो, वहां बछड़ा झाड़ू खाकर नुकसान कर रहा है |
              यही हाल हम सभी का | हम भी अपने मरण काल में अपनी ही ऐसी ही किसी बात का जिक्र करेंगे | उस समय तो केवल उसी के मुख में परमात्मा का नाम होगा, जो अपनी युवावस्था से ही उस गोविन्द का नाम भजता आ रहा है | तभी शंकराचार्य जी कह रहे हैं कि युवावस्था बीत जाने पर जो जीवन भर आपने किया है, केवल उसी बात की ही चिंता करोगे, परमात्मा का चिंतन नहीं | परमात्मा का चिंतन तो अंत समय में वही कर सकता है, जिसने अपने जीवन में परमात्मा को ही अपना एक मात्र ध्येय बनाया है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Saturday, October 7, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.7(कल से आगे)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.7(कल से आगे)
              बालक अपने मानसिक विकास के लिए खिलौनों से खेलता है | संसार की गतिविधियों में जाने से पहले वह उनके बारे में कुछ पूर्वाभ्यास करना चाहता है | उसे वह सब खेल के माध्यम से ही मिलता है | खिलौनों से खेलते हुए वह एक विद्यार्थी के रूप में अपने मानसिक विकास को गति देता है | जब उसका मानसिक विकास इस स्तर पर पहुँच जाता है कि वह संसार में कैसे जीना है, समझ सके, तब वह अपने यौवन काल की दहलीज पर पहुँच चूका होता है | उस समय उसका मन क्रीड़ा से हटकर विषय-भोग की तरफ आकर्षित होता है | यही वह समय है, जब उसको आध्यात्मिक चिंतन की तरफ लगाया जाना चाहिए | परन्तु हमारे यहाँ तो आध्यात्मिकता और भगवद् चिंतन के लिए सर्वश्रेष्ठ समय वृद्धावस्था को कहा गया है | मैं कहता हूँ कि ऐसा कहना अथवा मानना सरासर गलत है | यह सब उस आसक्ति और लोभ पूर्ण जीवन का प्रभाव है, जो कभी इनसे  मुक्त होने की कामना तक नहीं करता है |
          एक बार जब बाल्यावस्था से युवावस्था में मनुष्य का शरीर प्रवेश करता है, तब प्रकृति के गुणों के कारण उसके शरीर में विशेष हार्मोन्स बनने लगते हैं जो उसके शरीर के साथ-साथ स्वभाव में भी परिवर्तन ला देते हैं | इस समय अगर उसका सही रूप से मार्गदर्शन किया जाये, तो वह अपन जीवन समग्रता के साथ जी सकता है | उचित मार्गदर्शन के अभाव में वह विषय- भोगों में ही उलझ कर रह जायेगा | युवावस्था के कारण शरीर में हार्मोन्स अपना प्रभव दिखलाते हुए उसे इन्द्रियों का दास बन डालेंगे | फिर जीवन की अंतिम अवस्था में चिंता करने के अतिरिक्त वह कर भी क्या सकता है |
गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि -
अन्तकाले ज मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम |
यःप्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ||गीता-8/5||
अर्थात जो पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह मेरे ही साक्षात् स्वरुप को प्राप्त होता है , इसमें कुछ भी संशय नहीं है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||