Friday, May 19, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 15

मन्मना भव मद्भक्तो – 15
      भक्ति के इन्हीं नौ अंगों को गोस्वामी तुलसी दासजी ने रामचरित मानस में माता शबरी को ज्ञान देते हुए परमात्मा श्री राम के श्री मुख से कहलाते हुए वर्णन किया है, जिसको नवधा-भक्ति कहा जाता है | गोस्वामीजी रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में लिखते है -
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा | दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ||
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान |
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ||35||
मन्त्र जाप मम दृढ बिस्वासा | पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||
छठ दम सील बिरति बहु करमा | निरत निरंतर सज्जन धरमा ||
सातवं सम मोहि मय जग देखा | मोतें संत अधिक कर लेखा ||
आठवं जथा लाभ संतोषा | सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ||
नवम सरल सब सन छल हीना | मम भरोस हियँ हरष न दीना ||
नव महुं एकउ जिन्हकें होई | नारि पुरुष सचराचर कोई ||
सोइ अतिसय प्रिय भामिनी मोरें | सकल प्रकार भगति दृढ तोरें ||
           प्रथम भक्ति - संत महात्मा और तत्व ज्ञानी गुरु की सेवा में रहना | दूसरी भक्ति - परमात्मा की ही चर्चा करना | तीसरी भक्ति - अभिमान रहित होकर गुरु की सेवा करना | चौथी भक्ति - सब कपट त्यागकर परमात्मा का गुणगान करना | पांचवीं भक्ति - परमात्मा में दृढ विश्वास रखते हुए उसके मन्त्र का जाप करना | छठी भक्ति - इन्द्रिय निग्रह, अच्छा चरित्र और सज्जन पुरुषों जैसा आचरण करना | सातवीं भक्ति – संसार को सम भाव से देखना और सब में परमात्मा को ही देखना | आठवीं भक्ति - जो मिल जाये उसी में संतोष करना और सपने में भी दूसरों के दोष न देखना | नौवीं भक्ति - सरलता, सबके साथ कपट रहित व्यवहार, ह्रदय में परमात्मा का विश्वास और किसी भी बात से हर्ष या विषाद न होना | इन में से कोई भी एक भक्ति भी जिस किसी में होती है, वह परमात्मा को अतिशय प्रिय होता है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Thursday, May 18, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 14

मन्मना भव मद्भक्तो – 14
            शास्त्रों में भक्ति के नौ अंग बताये गए हैं | भक्ति का प्रारम्भ श्रवण से होता है | जिसका उल्लेख गीता के अध्याय 13 के 25 वें श्लोक में किया गया है | ज्ञान और कर्म मार्ग पर न चल सकने वालों के लिए भक्ति-मार्ग का प्रारम्भ ही श्रवण के माध्यम से होता है | जो शनैः-शनैः आगे बढ़ते हुए आत्म निवेदन की अवस्था तक पहुंचता है | भक्ति के इन नौ अंगों को ‘नवधा-भक्ति’ भी कहा जाता है | श्रवण अंग में परमात्मा की कथा का श्रवण किया जाता है | कथा-श्रवण के भी तीन अंग बतलाये गए हैं | प्रथम अंग है श्रोता | श्रोता ऐसा होना चाहिए जो श्रद्धा पूर्वक मन लगाकर हरि कथा का श्रवण करे | दूसरा अंग है, जिज्ञासा | एक आदर्श श्रोता को जिज्ञासु होना चाहिए | जिज्ञासु श्रोता के मन में सदैव एक प्रकार की जिज्ञासा बनी रहती है, जो उसे मन लगाकर कथा सुनने को प्रेरित करती है | अगर श्रोता जिज्ञासु नहीं हुआ तो कथा-श्रवण व्यर्थ है | श्रवण का अंतिम और तीसरा अंग है निर्मत्सरता | श्रोता के मन में किसी भी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए | किसी भी प्रकार की मन में ईर्ष्या रहने से कथा में मन नहीं लगेगा | भागवत कथा श्रवण करने के लिए दीन और विनम्र बनकर जाना चाहिए तथा  मन में परमात्मा को पाने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए | आइये, शास्त्रों में वर्णित भक्ति के सभी नौ अंगों से भी परिचय करते हैं |
             श्री मद्भागवत महापुराण में भक्त प्रह्लाद द्वारा अपने पिता हिरणकश्यपु को भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। प्रह्लाद के पिता ने जब उससे पूछा कि गुरु पुत्रों से तुमने क्या सीखा है; तब प्रह्लाद उनको नवधा-भक्ति के बारे में जो कुछ सीखा है, वह उन्हें बताते हैं |
श्रवणं कीर्तनं विष्णोःस्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्य मात्मनिवेदनम् || भागवत-7/5/23 ||
श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना ।
कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना ।
पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।
अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।
वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरुजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।
दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना ।
सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना ।
आत्म निवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं ।
क्रमशः
आज से हरिः शरणम् आश्रम से श्री केदारनाथ के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ | अतः अगली कड़ी वापिस लौटा आने के पश्चात ही प्रकाशित हो पायेगी |
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, May 17, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 13

मन्मना भव मद्भक्तो – 13
               वैसे देखा जाये तो प्रेम और भक्ति में कोई अंतर नहीं है | भक्ति का अर्थ है, किसी के साथ भक्त होना अर्थात एक प्रकार का बंधन | बंधन जब संसार के साथ होता है तब वह बंधन ही कहलाता है और जब यही बंधन परमात्मा के साथ होता है, तब भक्ति कहलाता है | संसार से प्रेम एक बंधन है क्योंकि संसार अनित्य है, उसके खोने का भय सदैव बना रहता है | जहाँ बिछड़ने का खतरा होता है, वहां भय उत्पन्न हो ही जाता है | इसलिए संसार से प्रेम करना भय पैदा करता है और जहाँ भय है, वहां भक्ति कैसे हो सकती है ? भक्ति तो व्यक्ति को भयमुक्त करती है | परमात्मा से अनुराग सत् के साथ प्रेम करना है | सत् कभी नष्ट नहीं हो सकता, वह तो शाश्वत है | अतः परमात्मा से अनुराग रखने से उसके खोने का, उससे बिछड़ने का भय नहीं रहता है | इसलिए परमात्मा से प्रेम करना ही भक्ति है | संसार में बंधु-बांधव, पति-पत्नी और रिश्ते-नाते आदि से प्रेम एक प्रकार का बंधन ही पैदा करता है क्योंकि हम इनमें इतना अधिक उलझ जाते हैं कि अपने द्वारा निर्मित इस संसार को ही सब कुछ समझ बैठते हैं | संसार जड़ है और इससे प्रेम करना सिवाय बंधनों में उलझने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | यह बंधन आपको संसार के सुखों और दुखों दोनों ही प्रकार की अनुभूति देता है |
           बंधन आपको संसार के आवागमन में डाले रखता है जबकि भक्ति आपको मुक्ति दिलाती है | शाब्दिक अर्थ लें तो भक्ति और मुक्ति एक दूसरे के विलोम शब्द है | भक्ति का अर्थ है - बंधन जबकि मुक्ति का अर्थ है बंधन-मुक्त | परमात्मा से प्रेम करना सत से प्रेम करना है, जो नित्य है उससे प्रेम करना है | जो नित्य है उससे आपका किसी प्रकार का बंधन हो ही नहीं सकता क्योंकि उसके साथ बंधकर उसके खोने का भय नहीं रहता है | उससे तो केवल शाश्वत प्रेम ही हो सकता है | यह प्रेम परमात्मा के साथ आपको बांधता अवश्य है, परन्तु यह बंधन जड़ पदार्थों अर्थात अनित्य से आपको मुक्ति दिलाता है | यही कारण है कि संसार से प्रेम आपको बांधता है जबकि परमात्मा से प्रेम आपको मुक्त करता है |
               स्वामी विवेकानन्द ने ‘भक्त के लक्षण’ शीर्षक के अंतर्गत भक्ति की अनेक परिभाषाओं का विवेचन करने के पश्चात अपना मत दिया है कि ‘आध्यात्मिक अनुभूति के लिए किये जाने वाले मानसिक प्रयत्नों की परम्परा ही भक्ति है, जिसका प्रारम्भ तो साधारण पूजा-पाठ से होता है और अंत ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ एवं अनन्य प्रेम में |’ वे कहते हैं कि प्रेम ही परमात्मा है, ईश्वर सभी प्राणियों में है, अतः मनुष्य को मनुष्य के साथ-साथ सभी जीवों से भी प्रेम करना चाहिए |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||
पुनश्चः
कल की कड़ी पर बहुत सी प्रतिक्रियाएं मिली हैं | मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं मूर्ति-पूजा के विरोध में कतई नहीं हूँ और न ही मैंने कभी इसे व्यर्थ कहा है | मैं स्वयं मूर्ति-पूजक हूँ | इसके बाद भी मैं कह रहा हूँ कि मूर्ति-पूजा निम्न स्तर की भक्ति है | सकाम भाव से, पुत्रेषणा, वित्तेषणा अथवा लोकेषणा के लिए की जाने वाली मूर्ति-पूजा बाह्य पूजा कहलाती है | इस प्रकार की पूजा से आपकी कामनाएं पूरी हो सकती है, परन्तु परमात्मा की प्राप्ति के लिए तो मूर्ति-पूजा से बहुत आगे निकल जाना होगा |
 उत्तमो ब्रह्मसद्भावो ध्यानभावस्तु मध्यमः |
स्तुतिर्जपोSधमो भावो बाह्यपूजाधमाधमा || महानिर्वाण तंत्र-14/122||
    अर्थात जब जीव ब्रह्म से एकाकार होने का प्रयत्न करता है, तब यह सर्वोत्तम भक्ति है | जब परमात्मा में ध्यान लगाने का अभ्यास किया जाता है, तब यह मध्यम कोटि की भक्ति है | जब नाम का जप किया जाता है तब यह निम्न कोटि की भक्ति है और बाह्य पूजा निम्न से भी निम्न स्तर की भक्ति है |
मूर्ति-पूजा पर मेरा यह लेख शास्त्रों के अध्ययन और महापुरुषों के कथन पर आधारित है | मैं उनसे सहमत हूँ | इसके कारण किसी की भावनाएं आहत हुई है, तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ | कृपा कर इसे अन्यथा न लें |
|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, May 16, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 12

मन्मना भव मद्भक्तो – 12
          मूर्ति-पूजा निम्नतम स्तर की पूजा है, यह स्पष्ट है | परन्तु जब हम इतिहास उठाकर देखते हैं, तो पता चलता है कि सतयुग में किसी भी प्रकार की कोई मूर्ति-पूजा नहीं होती थी | मूर्ति-पूजा का उल्लेख सर्वप्रथम त्रेता युग में प्रारम्भ होने का मिलता है | रामायण में सीता द्वारा गौरी मंदिर में जाकर गौरी की प्रतिमा के पूजन का उल्लेख है | हम यह जानना चाहते हैं कि आखिर मूर्ति-पूजा की आवश्यकता क्यों हुई और इसका प्रारम्भ कब हुआ ? मूर्ति-पूजा के सम्बन्ध में भागवत इसको स्पष्ट करते हुए कहती है –
दृष्ट्वां तेषां मिथो नृणामवज्ञानात्मतां नृप |
त्रेतादिषु हरेरर्चा क्रियायै कविभि: कृता ||भागवत-7/14/39||
अर्थात नारद मुनि कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! त्रेता आदि युगों में जब विद्वानों ने देखा कि मनुष्य एक दूसरे का अपमान आदि करते हैं, तब उन लोगों ने उपासना की सिद्धि के लिए भगवान् की प्रतिमा की प्रतिष्ठा की |
             सतयुग में किसी भी प्रकार की मूर्ति-पूजा नहीं होती थी | त्रेता युग में जब मनुष्य स्वार्थवश एक दूसरे का अपमान करने लगे, तब विद्वानों ने देखा कि परमात्मा स्वरुप मनुष्य का सम्मान करने के स्थान पर, वे एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं, ऐसे में परमात्मा के अस्तित्व पर ही भविष्य में प्रश्न चिन्ह लग सकता है | उन्होंने विचार कर मनुष्य की ही आकृति में परमात्मा की मूर्तियाँ बनाई और उनको पूजने लगे | पत्थर की मूर्ति के द्वारा किसी भी मनुष्य की भावनाओं को ठेस पहुंचना असंभव है | इस कारण से मूर्ति के रूप में परमात्मा की पूजा प्रारम्भ हुयी | भागवत आगे कहती है कि केवल मूर्ति-पूजा ही पर्याप्त नहीं है, परमात्मा को पाने के लिए | किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष भावना को समाप्त करने से ही मूर्ति-पूजा सफल है अन्यथा नहीं | सभी प्राणी परमात्मा के ही अंश है, अतः किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए |
भागवत इस बात को स्पष्ट करते हुए कहती है कि -
ततोSर्चायां हरिं केचित् संश्रद्धाय सपर्यया |
उपासत उपास्तापि नार्थदा पुरुषद्विषाम् || भागवत-7/14/40||
अर्थात तभी से कितने ही लोग बड़ी श्रद्धा और सामग्री से प्रतिमा में ही भगवान की उपासना करते हैं | परन्तु जो मनुष्य से द्वेष करते हैं, उन्हें प्रतिमा की उपासना करने पर भी सिद्धि नहीं मिल सकती |
                अगर किसी भी एक व्यक्ति से भी आपका द्वेष है, तो आपके सब अर्चन-पूजन व्यर्थ है | हरिः शरणम् आश्रम, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि अगर किसी एक व्यक्ति के प्रति भी आपके मन में दुर्भावना है, तो आपकी भक्ति विफल है | परमत्मा से आपकी निकटता हो ही नहीं सकती, आपका कल्याण नहीं हो सकता | भागवत में लिखा है कि ऐसा मनुष्य परमात्मा की पूजा व्यर्थ ही कर रहा है और यह वैसे ही है जैसे कोई व्यक्ति यज्ञ के बाद बची राख में ही सामग्री का हवन कर रहा है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Monday, May 15, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 11

मन्मना भव मद्भक्तो – 11
              स्वामी विवेकानंद ने भक्ति की तुलना एक त्रिभुज के तीन कोणों से की है | जिसका पहला कोण कहता है कि भक्ति या प्रेम कोई प्रतिदान नहीं चाहता | दूसरा कोण कहता है कि भक्ति या प्रेम में किसी प्रकार का कोई भय नहीं है | इस का तीसरा कोण कहता है कि प्रेम ही प्रेम का लक्ष्य है | प्रथम कोण को स्पष्ट करते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि प्रेम में प्रतिदान चाहने वाला प्रेमी न होकर एक भिखारी है, व्यवसायी है और उसका सच्चे धर्म के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है | दूसरे कोण को स्पष्ट करते हुए स्वामीजी एक स्त्री का दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि जब उस अकेली स्त्री के समक्ष कोई भी हिंसक पशु आता है, तो वह भय से भाग खड़ी होती है | परंतु इसी स्त्री के साथ जब उसका बच्चा हो तो वह उस हिंसक पशु का भी भयमुक्त होकर सामना करती है क्योंकि वह बच्चे से अतिशय प्रेम करती है और उसके लिए वह भयमुक्त होकर जीवन की बाजी तक लगा देती है | तीसरे कोण की बात करते हुए वे कहते हैं कि प्रेम ही प्रेम का लक्ष्य है और एक भक्त अंत में इसी भाव पर आ पहुँचता है कि स्वयं प्रेम ही भगवान् है, शेष सब असत है | इस संसार में प्रत्यक्षतः जो भी पदार्थ है, सबमें वही भगवान् है | वही वह शक्ति है, जो सूर्य, चन्द्रमा और तारों को घुमती रहती है | स्त्री-पुरुष में, सभी जीवों में, सभी वस्तुओं में वही शक्ति प्रकाशित हो रही है | एक वही अनंत प्रेम स्वरुप है, संसार की एक मात्र संचालिनी शक्ति वही है और वही चहुँ ओर प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है |
            इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने एक त्रिकोण के दृष्टान्त से स्पष्ट कर दिया है कि एक साधारण मनुष्य भी भक्ति और प्रेम की राह पर चलते हुए ज्ञान को प्राप्त कर सकता है | उपासना पद्धति भले ही भिन्न प्रकार की हो, महत्त्व तो प्रेम और श्रद्धा का है | मूर्ति-पूजा और कथा-सत्संग से आगे बढ़ते हुए भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचते हुए परमात्मा के प्रेम को पाने का ही एक मात्र हमारा लक्ष्य होना चाहिए | तभी भक्ति-मार्ग पर चलने की सार्थकता है | ईश्वर की किसी भी उपासना पद्धति का विरोध नहीं करना चाहिए | सभी पद्धतियाँ एक परमात्मा का स्मरण ही कराती है | साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि केवल मूर्ति-पूजा पर ही आकर न ठहर जाएँ | हमारा उद्देश्य ब्रह्म तक पहुँचने का होना चाहिए |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, May 14, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 10

मन्मना भव मद्भक्तो – 10
         प्रारम्भ से लेकर आज तक ईश्वर की उपासना में न जाने कितने आडम्बर प्रवेश कर चुके हैं, फिर भी सभी में सार-तत्व एक ही है कि मनुष्य ईश्वर की मनुष्य के रूप में ही उपासना कर सकता है | हमारे पुराणों में भी न जाने कितने आडम्बर समाहित है और मैं यह भी आपको नहीं कहता की आप उन सभी आडम्बरों को मानने को विवश हैं | परन्तु इन सब के पीछे जो सार छुपा हुआ है, वह एक ही सार-तत्व है, और वह है परमात्मा की भक्ति | अतः भक्ति से सम्बन्धित पुराणों में संकलित सभी उपदेशों को आत्मसात करने का उद्देश्य रखें और जो कुछ भी आडम्बर लगे, उसे छोड़ दें |
          स्वामी विवेकानंद भी मूर्ति-पूजा की समीक्षा करते हुए कहते हैं कि इस देश में मूर्ति-पूजा आदिकाल से चली आ रही है और यह भक्ति की रीढ़ कही जाती है | भारत में सर्वप्रथम कबीर ने ही मूर्ति-पूजा का विरोध किया था | भारत में कबीर से पहले भी कई बड़े बड़े दार्शनिक और धर्म संस्थापक हुए हैं, जिन्होंने भगवान् के सगुण रूप को अस्वीकार किया है और निर्गुण मत का प्रचार किया है, फिर भी उन्होंने भी मूर्ति-पूजा की कभी भी निंदा नहीं की | हाँ, उन्होंने मूर्ति-पूजा को उच्च कोटि की उपासना बिलकुल भी नहीं माना है | साथ ही साथ किसी भी पुराण ने मूर्ति पूजन को ऊंचे दर्जे की उपासना नहीं ठहराया है |
      श्रीमदभागवत महापुराण में भगवान मूर्तिपूजा के बारे में कहते हैं-
                  अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा |
                  तमवज्ञाय मां मर्त्यःकुरुतेSर्चाविडम्बनम् ||
                  यो मां सर्वेषु भूतेषुसन्तमात्मानमीश्वरम् |
                  हित्वार्चा भजते मौढ्याद्भस्मन्येवजुहोति सः ||3/29/21-22||
अर्थात् मैं आत्मा रूप से सदा सभी जीवों में स्थित हूँ; इसलिए जो लोग मुझ सर्वभूत स्थित परमात्मा का अनादर करके केवल प्रतिमा में ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वांग मात्र है | मैं सबका आत्मा, परमेश्वर सभी भूतों में स्थित हूँ; ऐसी दशा में जो मोहवश मेरी उपेक्षा करके केवल प्रतिमा के पूजन में ही लगा रहता है, वह तो मानो भस्म में ही हवन करता है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Saturday, May 13, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो - 9

मन्मना भव मद्भक्तो – 9
       स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जिस समय मनुष्य की सब वासनाएं मिट जाती हैं, जिस समय सभी विषयों से निवृति हो जाती है और उनका चिंतन तक नहीं रहता, जिस समय वह ईश्वर के लिए पागल हो जाता है, वस्तुतः उसी समय मनुष्य ईश्वर से प्रेम करता है | कृष्ण स्वयं ईश्वर थे, राधा उनसे प्रेम करती थी | जिन ग्रंथों में राधा-कृष्ण के प्रेम का चित्रण किया गया है, उनको पढ़ने से पता चलता है कि वास्तव में ईश्वर से किस प्रकार प्रेम करना चाहिए ? किंतु इस प्रकार के अपूर्व प्रेम के तत्त्व को कितने लोग जानते हैं ? हमारे में से बहुधा लोगों का ह्रदय पाप से परिपूर्ण है | वे नहीं जानते की प्रेम की पवित्रता और नैतिकता क्या है ?
          भक्ति की प्रथम अवस्था में भक्त ईश्वर को प्रभु और स्वयं को एक दास समझता है | वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परमात्मा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है | ईश्वर प्रेम का मूर्त रूप है | अनादि, अनंत ईश्वर प्रत्येक वस्तु में विद्यमान है | हमारा उपास्य केवल यही प्रेम का ईश्वर है | जब तक हम उसे सृष्टा, पालनकर्ता आदि समझते हैं, तभी तक बाह्य पूजा की आवश्यकता रहती है | किंतु जिस समय इन समस्त भावनाओं का त्याग कर ईश्वर को प्रेम का अवतार स्वरुप समझ लेते हैं एवं सब वस्तुओं में उसे और उसमें सब वस्तुओं को देखते है, तत्काल ही हमें परा भक्ति प्राप्त हो जाती है |
          भक्ति के बारे में विभिन्न प्रकार की कथाओं के माध्यम से हमारे पुराणों में बहुत कुछ स्पष्ट किया गया है | पुराण कितने पौराणिक है, विवाद का विषय हो सकता है परंतु इन पुराणों में जिन भक्तों का चरित्र चित्रण किया गया है, उन भक्तों की भक्ति को लेकर किसी भी प्रकार का विरोधाभास कहीं और किसी में भी नहीं है | भक्त प्रह्लाद हो अथवा ध्रुव, सभी भक्तों के चरित्र वर्णित करने का उद्देश्य भक्ति को प्रचारित प्रसारित करना ही रहा होगा | इनके चरित्र को पढ़कर हमें हमारे जीवन में उतारना होगा, तभी इन पुराणों की सार्थकता है | सभी पुराण सगुण रूप की उपासना को श्रेयस्कर बतलाते हैं | ईश्वर के सगुण रूप की उपासना किये बिना साधारण मनुष्य का काम चल ही नहीं सकता | अगर एक साधारण मनुष्य सगुण रूप की उपासना करना बंद कर दे तो उसे ईश्वर के स्थान पर अपने माता-पिता, भाई, आचार्य अथवा गुरु की उपासना करनी पड़ेगी और विशेष रूप से स्त्रियों का तो सगुण रूप की उपासना के बिना काम चल ही नहीं सकता | इसीलिए स्त्रियाँ अपने पति को परमात्मा मानते हुए एक प्रकार से ईश्वर के सगुण रूप की ही उपासना करती है | मेरे कहने का अर्थ यह है कि हम चाहे निर्गुण और निराकार स्वरुप की सत्ता स्वीकार करते हुए कितनी भी चर्चा कर लें, परन्तु जब तक हम इस मृत्यु लोक के साधारण मनुष्य की स्थिति में रहेंगे, तब तक हमें मनुष्य के रूप में ही भगवान् को देखना पड़ेगा | इसीलिए मनुष्य के शरीर को मंदिर कहा गया है | आप इतिहास उठाकर देख सकते हैं कि इस संसार में सदैव मनुष्य ही मनुष्य की उपासना करता आ रहा है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||