Tuesday, September 13, 2016

ज्ञान-विज्ञान-37

        परमात्मा की वाणी दूसरे अध्याय में व्यक्त और अव्यक्त के अंतर को समाप्त करती है और स्पष्ट करती है कि व्यक्त और अव्यक्त एक ही है और अनुकूल समय पर अव्यक्त से व्यक्त और पुनः अव्यक्त के रूप में यह परिवर्तन होता रहता है | जबकि इस सातवें अध्याय में स्पष्ट कर दिया है कि व्यक्त जो है, वह मैं ही हूँ और मुझे जन्मने और मरने वाला मेरे परम भाव को नहीं जानता | मैं अव्यय हूँ, पुरुषोत्तम हूँ | अव्यक्त परमात्मा का परम भाव क्या है और व्यक्त परमात्मा का व्यक्त-भाव क्या है ? जिस दिन इन दोनों भावों के मध्य का अंतर हमें समझ में आ जायेगा, प्रत्येक प्राणी में हमें परमात्मा नज़र आने लगेगा | फिर हमारा भी न तो जन्म होगा न मरण, हम भी शरीर की मृत्यु को अपनी मृत्यु नहीं समझेंगे और न ही शरीर के जन्म को अपना जन्म | हम भी अविनाशी है, पुरुषोत्तम है |

         परमात्मा की माया के वशीभूत हो जाना ही व्यक्ति-भाव है और इस माया से बाहर निकल जाना ही परम-भाव है | प्रकृति के गुणों में उलझ कर रह जाना व्यक्ति-भाव है और गुणातीत हो जाना ही परम-भाव है | व्यक्ति-भाव में मनुष्य स्वार्थी हो जाता है जबकि परम-भाव में उसमें समता आ जाती है | आसक्ति व्यक्ति-भाव का मुख्य कारण है जिसके कारण राग और द्वेष पैदा होते हैं जब कि परम-भाव में राग-द्वेष का कोई स्थान नहीं है | सुख-दुःख, लोभ-मोह आदि द्वंद्व व्यक्ति-भाव के लक्षण है जबकि परम-भाव में व्यक्ति सदैव निर्द्वंद्व अवस्था में रहता है | जिस दिन हम भी निर्द्वंद्व हो जायेंगे, हमें परमात्मा को ढूँढने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ेगा और न ही परमात्मा को अपना स्वरूप देखने के लिए हमें बार-बार आगाह करना पड़ेगा |
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् ||

Monday, September 12, 2016

ज्ञान-विज्ञान-36

           विज्ञान कहता है कि संसार का प्रथम जीव एक कोशिकीय था और एक से दो और दो से चार कोशिकाएं आपस में एक साथ इकट्ठी होते हुए बहु कोशिकीय जीवों की संरचना करती गई | इस जैविक विकास का परिणाम मनुष्य के रूप में आज हमारे सामने है | विज्ञान स्थूल का ज्ञान है और उसने अपनी स्थूल दृष्टि से सही कहा है | मैं विज्ञान की ही एक और महत्वपूर्ण बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ और कहना चाहता हूँ कि श्री मद्भागवत महापुराण में यह सब पहले से ही वर्णित है | एक कोशिका से ही मनुष्य के शरीर का निर्माण होता है | माँ से एक कोशिका और पिता की एक कोशिका मिलकर ही मनुष्य के शरीर को बनाने के लिए फिर से एक कोशिका का ही निर्माण करती हैं और फिर उसी एक कोशिका से शिशु के बहुकोशिकीय शरीर का निर्माण होता है | विज्ञान जोर देता है एक कोशिकीय जीव अमीबा से बहुकोशिकीय जीव मनुष्य के विकास होने का, जबकि हमारे ग्रन्थ इससे भी बहुत आगे जाकर कहते हैं कि मनुष्य का बहुकोशिकीय शरीर भी एक कोशिका से ही विकसित होता है परन्तु वह एक कोशिका अमीबा की एक कोशिका से भिन्न है |
            ‘एकोSहम् बहुस्यामि’, यही बात परमात्मा कहते हैं; मैं एक से अनेक होना चाहता हूँ अर्थात एक कोशिका से अनेक कोशिकाओं में विभाजित होकर व्यक्त हो जाऊँ जिससे अपने स्वरूप को साक्षात् अनुभव कर सकूँ, देख सकूँ | यही बात वे गीता के इस 7/24 श्लोक में स्पष्ट कर रहे हैं | बुद्धि की प्रकृति स्थूल है और स्थूल में सदैव परिवर्तन होता रहता है | जिस व्यक्ति की बुद्धि कार्य नहीं करती उसे बुद्धिहीन कहा जाता है | परमात्मा कहते हैं कि बुद्धिहीन मनुष्य ही मुझको जन्मने और मरने वाला समझता है | वह नहीं समझता की मृत्यु तो केवल मनुष्य के शरीर की होती है तथा व्यक्ति तो केवल परमात्मा की एक अभिव्यक्ति भर है | परमात्मा अविनाशी है और वे अपने स्वरूप को देखने के लिए, उसे समझने के लिए और आनंद प्राप्त करने के लिए ही अव्यक्त से व्यक्ति के रूप में व्यक्त हुए हैं | इसीलिए परमात्मा को सच्चिदानन्दघन कहा जाता है और गंभीरता से अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए विचार करें तो मनुष्य का स्वरूप भी सच्चिदानंद ही है | इससे स्पष्ट है कि अव्यक्त ही व्यक्त होता है अर्थात स्वयं परमात्मा ही व्यक्ति के रूप में व्यक्त हुए हैं | इस बात को गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं परन्तु अर्जुन की बुद्धि बारम्बार भ्रमित हो रही थी, इसलिए 7/24 में वही बात भगवान को दूसरे शब्दों में और स्पष्ट रूप से कहनी पड़ी | गीता के दूसरे अध्याय में उन्होंने अर्जुन को कहा था-
         अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
         अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || गीता-2/28 ||

                अर्थात हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त थे और मरने के बाद भी अव्यक्त हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही व्यक्त हैं; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है ?
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् ||

Sunday, September 11, 2016

ज्ञान-विज्ञान-35

              जब आप खेल के मैदान में खेल को खेल रहे होते हैं तब सब कुछ प्रति पल घटित और परिवर्तित होता हुआ दिखाई देता है परन्तु जब आप खेल समाप्त करने के बाद अपने घर लौट आते है और खेल का मैदान वैसे का वैसा वहीँ पर रह जाता है, ऐसे में आप में भी किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ और न ही खेल के मैदान में कोई परिवर्तन आया और आप दोनों ही पूर्व की भांति जस के तस बने रहते हैं | कल फिर आप उसी खेल-मैदान पर जायेंगे, वही तो आप होंगे और वही मैदान होगा परन्तु खेल नया होगा | इस प्रकार स्पष्ट है कि परिवर्तन आया तो है परन्तु केवल उस खेले गये खेल में आया है | परमात्मा तो अविनाशी है ही, साथ ही साथ न तो जीवात्मा विनाश शील है और न ही भौतिक पञ्च-तत्व | इस प्रकार परिवर्तनशील और विनाशी तो केवल परमात्मा का ही खेल हुआ, जिस कारण से यह भौतिक शरीर उत्पन्न हुआ है | ऐसे कई भौतिक शरीरों के माध्यम से यह परमात्मा नित्य ही नाना प्रकार के खेल खेले जा रहा है, जिसे हम ‘प्रभु की लीला’ कहते है |  
      प्रभु की इस लीला में मनुष्य कैसे भ्रमित हो जाता है, आइये गीता के इस महत्वपूर्ण श्लोक की ओर चलते हैं-
              अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः |
              परं भावमजानन्तो  ममाव्ययमनुत्तमम् || गीता-7/24 ||
अर्थात बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भांति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं |

       परमात्मा के खेल को समझना आसान कार्य नहीं है | अपने ही स्वरूप को देखने के लिए उसने स्वयं को मनुष्य बनाया और स्वरूप का ज्ञान कराने वाले उस मनुष्य को ही भ्रमित कर दिया | ऐसा परमात्मा ने क्यों किया ? परमात्मा को अपना खेल निरंतर खेलते रहना है | अगर मनुष्य इस खेल से भ्रमित नहीं होता और परमात्मा उसके माध्यम से अपना स्वरूप देख लेते तब तो यह खेल कभी का ही समाप्त हो गया होता और फिर 84 लाख योनियाँ भी अस्तित्व में नहीं आती | तब यह संसार-चक्र भी शीघ्र ही समाप्त हो गया होता | परमात्मा अव्यक्त से व्यक्त होकर मनुष्य बने इसीलिए ही मनुष्य को व्यक्ति कहा जाता है | व्यक्ति में उपस्थित मन, कामनाओं का उद्गम स्थल है | उन कामनाओं को पूरा करने के लिए व्यक्ति को कर्म करना पड़ता है और कर्म सदैव कर्म-फल पैदा करते हैं | इन कर्म-फलों को प्रदान करने के लिए ही परमात्मा को मनुष्य के अतिरिक्त 84 लाख अन्य प्रकार के प्राणी भी पैदा करने पड़े | इतना सब करने के बाद वह प्रत्येक प्राणी के भीतर छुपकर बैठ गया है और साक्षी भाव से निरंतर अपने बनाये इस खेल का आनंद ले रहा है |
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् || 

Saturday, September 10, 2016

ज्ञान-विज्ञान-34

        हम सभी यह समझते हैं कि हमारा शरीर एक न एक दिन समाप्त होना है और पुनर्जन्म पाकर हमें इस भौतिक संसार में वापिस लौटना है | इसलिए शरीर और इसके तत्वों को क्षर अथवा परिवर्तनशील कहा गया है | जरा मेरी बात पर ध्यान दें और सोचें व विचार करें कि क्या पञ्च तत्व भी क्षर हैं ? पञ्च तत्वों से बना यह शरीर अवश्य ही क्षर है, अर्थात नित्य नहीं है | परन्तु पांचो तत्व तो शरीर के क्षय हो जाने के बाद पुनः वैसे के वैसे अपनी प्रकृति में घुल मिल जाते हैं और अनुकूल परिस्थितियों के उपलब्ध होते ही पुनः एक नए शरीर की रचना कर डालते हैं | फिर ये पञ्च-तत्व भी क्षर कैसे हुए ? हाँ, स्थूल दृष्टि से यह बात एक दम सत्य प्रतीत होती है और अगर गंभीरता से देखा जाये तो परमात्मा जो कि स्वयं अक्षर है, तो फिर जड़ और चेतन दोनों ही अक्षर हुए क्योंकि दोनों ही उनसे और उनके कारण ही अस्तित्व में आये हैं | यही बात तो गीता में वे अर्जुन को समझा रहे हैं कि ‘शरीर की मृत्यु को अपनी मृत्यु मत समझ, शरीर के बनने और नष्ट होने की एक निश्चित प्रक्रिया है | परन्तु हे अर्जुन ! तू और मैं दोनों ही कभी नष्ट नहीं होते केवल हमारे शरीर ही नष्ट होते हैं | तुम्हारे और मेरे में यही अंतर है कि इस बात का मुझे तो सदैव ज्ञान रहता है परन्तु तुम्हें नहीं |’
                बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन |
                तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप || गीता-4/5 ||
अर्थात भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हे परंतप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं | उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ |

          यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के भ्रम को समाप्त करने के स्थान पर और अधिक बढा देते हैं | ऐसी क्या बात हो गयी कि अविनाशी और अजन्मा रूप होते हुए भी परमात्मा को शरीर प्राप्त करने को विवश होना पड़ता है | मेरे एक मित्र ने इस श्लोक को पढ़कर मुझसे भी यही प्रश्न किया था कि ‘आप तो कहते हैं कि गीता सभी प्रकार के भ्रम दूर कर देती है परन्तु अर्जुन को ऐसा कहकर क्या भगवान ने भ्रम को और नहीं गहरा दिया है ?’ स्थूल दृष्टि से एक भ्रम अवश्य है यह, परन्तु गंभीरता से देखा जाये तो भ्रम नहीं भी है | जिस प्रकार हमें अपना स्थूल रूप देखने के लिए उसे सजाने संवारने के लिए एक दर्पण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार परमात्मा को भी अपने स्वरूप को देखने और स्वयं के द्वारा कुछ करने के लिए ही एक स्थूल शरीर की आवश्यकता पड़ती है | उसे एक व्यक्ति के रूप में अपने आपको व्यक्त करना पड़ता है | सूक्ष्म और अव्यय को भी किसी प्रकार के कर्म करने के लिए स्थूल की ही आवश्यकता होती है अर्थात बिना शरीर को प्राप्त किये किसी भी प्रकार का भी कर्म करना असंभव है | यही कारण है कि आवश्यक होने पर परमात्मा का भी एक व्यक्ति के रूप में इस संसार में अवतरण होता है | अतः यह सत्य है कि परमात्मा से स्थूल अलग नहीं है | हाँ, यह बात अवश्य ही सत्य है कि स्थूल तत्वों से बनी समस्त रचनाएँ परिवर्तनशील होती ही हैं |
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् || 

Friday, September 9, 2016

ज्ञान-विज्ञान-33

            गीता का यह सातवाँ अध्याय ज्ञान-विज्ञान योग नाम से कहा गया है, इसमें कुल तीस श्लोक है | वैसे तो सभी श्लोक एक से बढ़कर एक है और उनकी व्याख्या करना सहज नहीं है | इस ज्ञान-विज्ञान श्रृंखला में वही श्लोक उद्घृत किये गए है और किये जा रहे हैं जिससे विषय-वस्तु को समझा जा सके | 2 से 7 श्लोक तक की इस विज्ञान से ज्ञान के मार्ग को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका है | फिर 8 से 14 वें श्लोक तक परमात्मा अपनी कुछ विभूतियों और भावों का ज्ञान कराते हैं | यहाँ पर वे विज्ञान का विस्तृत रूप से विवेचन करते हैं और अर्जुन को भलीभांति समझा देते हैं कि विज्ञान भी मेरे ही अंतर्गत है |15 वें से 18 वें श्लोक के अंतर्गत वे स्वयं को भजने वाले भक्तों का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि ज्ञानी भक्त मुझे सबसे प्रिय है | विज्ञानी से ज्ञानी हो जाने के बाद वे महात्मा होने का मार्ग बताते हैं | 19 वां श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि महात्मा किसे कहते हैं और विज्ञान से ज्ञान की ओर आकर केवल वहीँ पर रूक जाना ही सब कुछ पा लेना नहीं है | परमात्मा को ही सब कुछ मान लेने में ही इस ज्ञान की पूर्णता है अन्यथा समस्त प्राप्त ज्ञान अविद्या के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | परमात्मा को सर्वस्व मान लेना तभी संभव हो पाता है, जब हम यह समझ जाते है कि ज्ञान असीम है और असीम को पाना है तो भौतिक स्वरूप को त्यागना होगा अर्थात  स्थूल के आधार पर असीम को पाना असंभव है |

            20 वें श्लोक से 23 वें श्लोक तक भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि जब मनुष्य अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए विभिन्न देवी-देवताओं का पूजन करता है, तब मैं उसकी श्रद्धा उसी देवता में स्थिर कर देता हूँ | उन देवताओं को पूजने से प्राप्त हुआ फल भी नाशवान ही होता है | ऐसे देवी-देवताओं को पूजने वाले उन्हीं को प्राप्त होते हैं और संसार-चक्र से मुक्त नहीं हो सकते; जबकि मेरा भक्त चाहे जैसे भी मुझको भजे, वह अंत में मुझे ही प्राप्त होता है | इस प्रकार श्लोक संख्या 8 से 23 तक मैंने अति संक्षिप्त रूप से चर्चा की है | मैं जानता हूँ कि इतना कुछ अपर्याप्त है, परन्तु इस श्रृंखला को थोड़ी गति देने के लिये यह आवश्यक भी है | अब हम 24 वें श्लोक की तरफ चलते हैं, जो कि मुझे गीता के सर्वाधिक प्रिय श्लोकों में से एक श्लोक है |
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् || 

Thursday, September 8, 2016

ज्ञान-विज्ञान-32

        ज्ञान-विज्ञान को जान लेने पर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता परन्तु फिर भी एक प्रकार की अतृप्ति शेष रह ही जाती है और वह जीवन भर तब तक बनी रहती है, जब तक कि व्यक्ति परमात्मा के परायण नहीं हो जाता | इस परायणता को उपलब्ध होते ही वह महात्मा की श्रेणी में आ जाता है | गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को महात्मा के बारे में कहते हैं –
                   बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
                   वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः || गीता-7/19 ||
         अर्थात बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है-इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है |

       यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कई जन्म लग जाते हैं, एक भोगी को, अपने आप को एक योगी के रूप में परिवर्तित करने में | ऐसे योगी को ‘तत्त्व ज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष’ कहा जा सकता है | जिस मनुष्य जन्म में ऐसा योगी परमात्मा के परायण हो जाता है, वह उसका आखिरी जन्म होता है, उसके बाद पुनर्जन्म की कोई सम्भावना नहीं बनती है | बहुत जन्मों के अंत में अर्थात कई मनुष्य की योनि प्राप्त कर लेने के बाद किसी एक मनुष्य जन्म में ऐसा अवसर आता है जब वह योगी महात्मा की अवस्था को उपलब्ध होता है | भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ऐसा महात्मा सुदुर्लभ है | दुर्लभ और सुलभ, ये दो शब्द तो हमने बहुत बार सुने हैं परन्तु सुदुर्लभ शब्द केवल एक बार यहीं गीता में आया है | दुर्लभ जब उपलब्ध हो जाये तब ऐसे दुर्लभ के उपलब्ध हो जाने से परमात्मा को बड़ी प्रसन्नता होती है इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने यहाँ सुदुर्लभ शब्द का उपयोग किया है |
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् || 

Wednesday, September 7, 2016

ज्ञान-विज्ञान-31

        इस भोग से मुक्ति के सम्बन्ध में एक दृष्टान्त देना चाहूँगा | एक सिद्ध महात्मा थे, जिन्होंने अपने जीवन में बाल्यकाल से ही घर त्याग दिया था | वह जीवन में कभी भोगी रहे ही नहीं थे, ज्ञान को उपलब्ध होकर योगी हो गए थे | कहीं एक स्थान  पर कभी अधिक समय तक ठहरते भी नहीं थे | इस प्रकार एक सन्त का जीवन जीते हुए भ्रमण करते हुए एक गाँव में कुछ समय के लिए रुके | जिस स्थान पर वे ठहरे हुए थे वहां से मंदिर तक जाने के लिए जिस मार्ग से उन्हें गुजरना होता, उस मार्ग पर एक वेश्या का घर पड़ता था | जब भी वे मंदिर जाने के लिए अपने निवास स्थान से निकलते, वेश्या अपने घर की अटारी से उन्हें पूछती कि स्वामी जी आप कच्चे सन्त है अथवा पक्के ? सन्त उस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं देते | प्रतिदिन का यह एक नियम सा बन गया था कि इधर महात्मा जी घर से निकलते और उधर वेश्या उनसे यही प्रश्न पूछती और सन्त उसे हमेशा की तरह कोई उत्तर नहीं देते |

        सर्दी की एक रात महात्मा जी चल बसे | गाँव वालों ने उनकी बैकुंठी बनाई और अंतिम संस्कार समाधि के लिए ले जाने लगे | वही रास्ता और वही वेश्या का घर | अटारी से बैकुंठी देखकर वेश्या के मुंह से निकल ही गया – ‘हाय ! स्वामी जी तो मेरे प्रश्न का उत्तर दिए बिना ही चले गए |’ कहते हैं कि स्वामी जी के शरीर में उसी समय हलचल हुई और वे बोल उठे कि ‘मैं एक पक्का सन्त हूँ | पहले इस प्रश्न का उत्तर इस लिए नहीं दे सका था क्योंकि मुझे स्वयं पर काम-भोग पर नियंत्रण कर लेने का विश्वास नहीं था | अब यह देह नहीं रही इसलिए आज मुझे विश्वास हो गया है कि मेरी काम-भोग पर अब कभी भी आसक्ति नहीं हो सकती, इसलिए अब मैं एक पक्का सन्त हूँ |’ एक कहानी मात्र हो सकती है यह बात, परन्तु इसमें यह एक सत्यता भी छुपी हुई है कि काम और भोग की लालसा जीवन भर पीछा नहीं छोड़ती | कोई विरला ही इससे जीते जी मुक्त हो सकता है |
क्रमशः 
|| हरिः शरणम् ||