Wednesday, August 14, 2019

अवधूत

अवधूत
अवधूत का अर्थ होता है, जीवनमुक्त ज्ञानी। अवधूत गीता में दत्तात्रेयजी ने "अवधूत-गीता"के अंतिम अध्याय में अवधूत शब्द की व्याख्या की है।वे कहते हैं कि अवधूत शब्द निम्न चार अक्षरों से मिलकर बना है:अ+व+धू+त।इनका विस्तृत अर्थ निम्न प्रकार है-
अवधूत में 'अ' का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
आशापाशविनिर्मुक्त आदिमध्यान्त निर्मलः।
आनन्दे वर्तते नित्यमकारं तस्य लक्षणम्।।8/6।।
अ--
  --जो व्यक्ति "आशा" पाश से मुक्त है।
   --जो व्यक्ति "आदि, मध्य और अंत" सब ओर से निर्मल हो।
   --जो नित्य ही "आनंद" में मग्न रहता हो।
अवधूत में 'व' का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
वासना वर्जित येन वक्तव्यं च निरामयम् ।
वर्तमानेषु वर्तेत वकारं तस्य लक्षणम् ।।8/7।।
व--
  --जिसने "वासना" का अंत कर दिया हो।
  --जिसका "वक्तव्य"राग-द्वेष से रहित हो।
  --जो सदैव "वर्तमान"में रहता हो।
अवधूत में 'धू' के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
धूलोधूसरगात्राणि धूतचित्तो निरामयः ।
धारणाध्याननिर्मुक्तो धूकार स्तस्य लक्षणम् ।।8/8।।
धू--
   --"धूलधूसर" ही जिसके अंग हो।
   --जिसका "धूतचित्त"हो।जिसका मन निर्मल हो चुका       हो।
   --जो "धारणा, ध्यान" आदि क्रियाओं से मुक्त हो गया हो।
तत्वचिंता धृतायेन चिंताचेष्टा विवर्जितः।
तमोsहंकार निर्मुक्तस्तकारस्तस्य लक्षणम्।।8/9।।
अवधूत में "त" के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
त--
   --जिसने "तत्व चिंतन"को ही धारण किया हो।
   --जिसने समस्त सांसारिक चिंता व चेष्टा का "त्याग" कर दिया हो।
   --जो "तम रूपी अहंकार" से रहित हो।
दत्तात्रेयजी का एक और कथन है: "अलख निरंजन"।
कल अलख निरंजन के बारे में-
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Tuesday, August 13, 2019

भगवान दत्तात्रेय


भगवान दत्तात्रेय 
       हमने अभी तक श्री मद्भागवत महापुराण में वर्णित भगवान दत्तात्रेय के गुरुओं की चर्चा की है। आइए अब जानते हैं कि दत्तात्रेय कौन थे?  भागवत महापुराण के अनुसार मनु और शतरूपा के पांच संताने हुई, दो पुत्र और तीन पुत्रियां। प्रियव्रत और उत्तानपाद नाम के दो पुत्र हुए तथा आकूति, देवहूति और प्रसूति नामक तीन पुत्रियां हुई । उत्तानपाद के पुत्र श्रीहरि के महान भक्त ध्रुव से हम परिचित हैं ही। मनु शतरूपा की तीन पुत्रियों में से सबसे बड़ी आकूति का विवाह रूचि प्रजापति के साथ, मँझली पुत्री देवहूति का कर्दम ऋषि के साथ और सबसे छोटी पुत्री प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ।दक्ष प्रजापति और प्रसूति की पुत्री सती थी जिनका विवाह शंकर भगवान के साथ हुआ।
      मनु और शतरूपा की मँझली पुत्री देवहूति और कर्दम ऋषि के एक पुत्र और नौ कन्याएं हुई। इनकी संतानों में सबसे छोटे उनके पुत्र कपिल के रूप में स्वयं विष्णु भगवान अवतरित हुए, जिन्होंने अपनी माता देवहूति को ज्ञान दिया।  कपिलजी के अतिरिक्त इनकी नौ कन्याओं थी जिनके नाम थे: कला,  अनुसुइया,  श्रद्धा,  हविर्भू,  गति,  क्रिया,  ख्याति,  अरुन्धती  और शान्ति । दूसरे क्रम की कन्या अनुसुइया का विवाह अत्रि ऋषि के साथ हुआ,जिनके पुत्र दत्तात्रेयजी हुए।
            अत्रि पत्नी अनुसुइया शास्त्रों में सती अनुसुइया के नाम से प्रसिद्ध हैं।उन्होंने साधुवेश में भिक्षा मांगने आये त्रिदेव को दूध पीते बच्चे बना दिये थे।  साधुओं का वेश बनाये ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अनुसूइया से निःवस्त्र होकर गोद में बिठाकर भोजन कराने का आग्रह किया। अनुसूइया ने अपने पतिव्रत धर्म के बल से उन तीनों को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और फिर उन्हें निर्वस्त्र होकर गोद में लेकर दूध पिलाने लगी।जब ब्रह्माणी, लक्ष्मी और रुद्राणी के पतिदेव देर तक वापिस नहीं लौटे तो वे उनकी तलाश में अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंची । तब सती अनुसूइया को उन तीनों की वास्तविकता का पता चला।सती अनुसूइया ने उन शिशुओं को पुनः अपने  वास्तविक स्वरूप में परिवर्तित कर् दिया। अनुसूइया के पतिव्रत धर्म से प्रभावित होकर त्रिदेव ने वर मांगने को कहा। अनुसूइया ने त्रिदेव को ही पुत्र रूप में मांग लिया। उसी वर के अनुसार भगवान विष्णु उनके पुत्र दत्तात्रेय हुए।दत्तात्रेजी का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ला पूर्णिमा को हुआ था।भगवान ब्रह्मा का जन्म चंद्र के रूप में और भगवान शंकर का जन्म महर्षि दुर्वासा के रूप में हुआ। इस प्रकार त्रिदेव ने अनुसूइया के गर्भ से तीन शिशुओं के रूप में जन्म लिया।
       भगवान दत्तात्रेय के रायपुर (छ.ग.) और इंदौर (म. प्र.) में जगप्रसिद्ध मंदिर हैं।दत्तात्रेयजी अवधूत नाम से भी जाने जाते हैं।कहा जाता है कि अवधूत गीता उन्हीं के द्वारा कही गयी है। अवधूत गीता अद्वैत वाद का समर्थन करती है।इसी कारण से कई विद्वान इस ग्रंथ को लिपिबद्ध करना अद्वैतवादी आदिगुरु शंकराचार्य के काल के बाद, लगभग 11वीं शताब्दी में मानते हैं।अवधूत गीता भी अपने आप में एकअद्भुत ग्रन्थ है।
कल अवधूत शब्द पर चर्चा करेंगे।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Monday, August 12, 2019

गुरु-27

गुरु-27
       चलिए, एक बार फिर संक्षेप में दत्तात्रेयजी के इन गुरुओं और इनसे प्राप्त होने वाली शिक्षाओं को दोहरा लेते हैं।
1.पृथ्वी-धैर्य और क्षमा।
2.वायु-निर्लिप्तता।
3.आकाश-एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति।
4.जल-सहज, निर्मल और पवित्र स्वभाव।
5.अग्नि-दोष रहित होना।
6.चंद्रमा-प्रत्येक परिस्थिति में सम रहना।
7.सूर्य-इन्द्रिय भोग और त्याग, दोनों में सामंजस्य।
8.कबूतर-आसक्ति का त्याग।
9.अजगर-व्यर्थ की चेष्टा न करना।
10.समुद्र-धीर,गंभीर रहना।
11.पतंगा-दर्शनेन्द्रीय पर नियंत्रण।
12.भौंरा व मधुमक्खी-गंध के प्रति आसक्ति व संग्रह करना अनुचित है।
13.हाथी-स्पर्श सुख के प्रति आसक्ति से जीवन पर संकट।
14.मधु निकालने वाला- संग्रह किये गए धन और वस्तुओं को कोई अन्य ही भोगता है।
15.हरिन-श्रवण इन्द्रिय पर नियंत्रण।
16.मछली-  जिव्हा रस के प्रति आसक्ति अनुचित ।
17.पिङ्गला वेश्या- ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी कोई आशा न रखना।
18.कुरर पक्षी- जीवन में संग्रह ही दुःख का सबसे बड़ा कारण।भोगों को त्यागने से ही सुख की प्राप्ति होती है।
19.बालक-मान-अपमान और व्यर्थ की चिंता से दूरी।चिंतारहित होना ही सबसे बड़ा सुख है।
20.कुंआरी कन्या-परमात्मा के भजन के लिए किसी के साथ की आवश्यकता नहीं।दूसरे का साथ ही भजन में बाधक।
21.बाण बनाने वाला-वैराग्य और अभ्यास से मन को एकाग्र कर लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास।
22.सर्प-एकांतिक जीवन।घर अथवा मठ आश्रम आदि का निर्माण नहीं करना।
23.मकड़ी-एक परमात्मा ही जगत के निर्माणकर्ता और संहारक।संकल्प विकल्प का त्याग हमें संसार जाल में नहीं उलझने देता।
24.भृङ्गी कीट- संसार का चिंतन करोगे तो सांसारिकता में ही जीवन भर उलझे रहोगे। अतः सदैव केवल परमात्मा का ही चिंतन करते रहें, उसी में मन को लगा दें। चाहे प्रेम, द्वेष अथवा भय के वशीभूत होकर ही क्यों न हो, फिर आप स्वयं ही परमात्मा स्वरूप हो सकते हो।
     और अंत मे स्वयं के शरीर से लेने वाली शिक्षा- यह शरीर साधन मात्र है, चाहो तो इससे विषय भोग प्राप्त करो अथवा परमात्मा की ओर चलो। मनुष्य शरीर परमात्मा की ओर जाने के लिए मिला है न कि विषय रस लेने के लिए। आप शरीर नहीं हैं अतः शरीर से स्वयं को अलग मानते हुए, इसको साधन बनाकर साध्य तक पहुंचने का प्रयास करें।
    सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस श्रृंखला से निकल कर आई है वह है कि कोई भी गुरु आपको तब तक ज्ञान नहीं करा सकता जब तक कि ज्ञान लेने के लिए आप बुद्धि का उपयोग करने को स्वयं तत्पर न हो।अतः आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक आदर्श गुरु मिलने के साथ साथ आपकी लगन और विवेक का सदुपयोग करना भी आवश्यक है।गुरु आपके विवेक को जाग्रत करता है, पतन्तु सदमार्ग पर आपको ही चलना पड़ता है।कहने का सार यह है कि अगर आप विवेकवान हैं तो फिर आप स्वयं ही अपने गुरु हो सकते हैं, आपको कहीं बाहर जाकर गुरु ढूंढने की आवश्यकता नहीं है।
कल-दात्तात्रेय जी का परिचय।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Sunday, August 11, 2019

गुरु-26

गुरु-26
      हम विषयासक्त क्यों हो जाते हैं?इसका एक ही कारण है, हम अपने आपको आत्मा न मानकर शरीर मानने लगते हैं। हमारी इंद्रियां ही इसके लिए उत्तरदायी हैं।जैसे बहुपत्नियाँ रखने वाले व्यक्ति को प्रत्येक पत्नी अपनी ओर खींचती है, वैसे ही भोगों को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक इंद्रिय मनुष्य को अपनी ओर खिंचती है।यह तो व्यक्ति की बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है कि वह किस ओर जाए अथवा सभी को नकार दे।
          इन्द्रीयजनित भोगों को नकारने की क्षमता केवल मनुष्य के पास है। परमात्मा ने मनुष्य से पहले भी अनेकों प्रजातियों के प्राणी बनाये हैं। वे केवल भोग ही भोगते रहते हैं, भोगों को नकारने की क्षमता उनके पास नहीं है।अंततः परमात्मा को बुद्धि देकर मनुष्य को बनाना पड़ा। अगर मनुष्य को नहीं बनाता तो वह अपने स्वरूप को देखने से भी वंचित हो जाता। केवल मनुष्य के पास ही इतनी बुद्धि है कि उससे ब्रह्म का साक्षात्कार तक कर सकता है। इस मनुष्य शरीर की रचना कर वे अत्यधिक आनंदित हुए।
      वैसे यह शरीर मरणधर्मा है,अनित्य है।मृत्यु इसका सदैव पीछा करती रहती है।फिर भी इससे परम पुरुषार्थ अर्थात मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है।"बहुनाजन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते......।" बहुत से जन्मों के अंत में यह मनुष्य शरीर मिला है। इस अवसर को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए।बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि मृत्यु आने से पहले ही वह मोक्ष को उपलब्ध होने के लिए प्रयत्न कर ले क्योंकि मनुष्य जीवन का एक ही उद्देश्य है, विभिन्न शरीरों से मुक्त होकर परमात्मा तक पहुंचा जाए।विषय भोग तो हम पहले ही विभिन्न योनियों में भोगते भोगते आए हैं।
             दत्तात्रेय भगवान कहते हैं कि "राजन् ! ऐसा सोचकर मुझे भी वैराग्य हो गया। मेरे भीतर ज्ञान-विज्ञान की ज्योति सदैव जगमगाती रहती है।अब मुझमें न तो विषयों और शरीर के प्रति आसक्ति है और न ही अहंकार। इसीलिए मैं निर्भय होकर इस धरा पर स्वच्छन्द होकर विचरण कर रहा हूँ।"
        अकेले गुरु ही आपको ज्ञान नहीं दे सकते, इसके लिए आवश्यक है कि अपनी बुद्धि से भी हम कुछ सोचें समझें।इस प्रकार कह कर दत्तात्रेयजी ने शरीर और अपने 24 गुरुओं की गाथा राजा यदु को कह सुनाई।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Saturday, August 10, 2019

गुरु-25

गुरु-25
       मनुष्य का शरीर परमात्मा द्वारा बनाई गई सर्वोत्तम कृति है। हम इस शरीर को पाकर जीवनभर विषय भोगों से प्राप्त होने वाले कथित सुखों को प्राप्त करने की भाग दौड़ में लग जाते हैं। मैंने विषयों से प्राप्त होने वाले सुखों को कथित सुख कहा है क्योंकि उनको केवल सुख कहा ही जाता है वास्तविकता में वह सुख न होकर दुःख प्राप्त होने की प्रारंभिक अवस्था होती है। अनुभव किए जाने वाले सुख के पीछे दुःखों का आगमन छिपा होता है। इस बात को केवल वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसने अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करना सीख लिया है। यह शरीर हमारा गुरु है और यह तभी गुरु बन सकता है, जब हम अपने मस्तिष्क के दरवाजे और खिड़कियां खुली रख विवेक का आदर करें।
      हाँ, यह शतप्रतिशत सत्य है कि मनुष्य का शरीर ही उसके लिये मुक्ति का द्वार खोल सकता है। इसी शरीर से हमें विवेक और वैराग्य उपलब्ध होता है।जीवन में जब विवेक और वैराग्य का पदार्पण हो जाता है, तब व्यक्ति की आसक्ति अपने शरीर के प्रति समाप्त हो जाती है। इसी अवस्था को उपलब्ध होने पर ही व्यक्ति को अनुभव होता है कि केवल विषय भोग में रत रहने से तो इस संसार में सदैव के लिए आना-जाना बना ही रहेगा। मुक्ति के लिए तो विषयासक्ति और शरीर के प्रति आसक्ति, दोनों का त्याग करना होगा और यह त्याग बिना विवेक और वैराग्य के होना असंभव है।
      इस संसार में शरीर का तो जीना मरना लगा ही रहता है। शरीर में आसक्त होकर उसे पकड़े रखने का केवल एक ही परिणाम होता है, जीवन मे दुःख पर दुःख भोगते जाओ।दूसरी ओर इसी शरीर से तत्व विचार कर सकते हैं।परंतु आत्म ज्ञान को प्रवृत्त मनुष्य को सदैव यह ध्यान में रखना होगा कि यह शरीर तो मरणधर्मा है। एक दिन इसका जाना निश्चित है।इसलिए शरीर से सदैव असंग होकर रहें और तत्व ज्ञान के लिए आतुर।हम इस शरीर को कथित सुख देने के लिए ही विभिन्न प्रकार की कामनाएं और कर्म करते हैं। जिसके लिए हम केवल भोग और संग्रह करने में ही लगे रहते हैं।परिणाम-हमारा धन, हमारा परिवार आदि बढ़ते जाते हैं और व्यक्ति जीवन भर उनके पालन-पोषण में ही लगा रहता है। देह की आयु पूरी होने पर शरीर तो चला जाता है और पीछे वृक्ष की तरह दूसरे शरीर के लिए बीज बोकर उसके लिए भी दुःख की व्यवस्था कर जाता है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Friday, August 9, 2019

गुरु-24

गुरु-24
       दत्तात्रेयजी ने भृङ्गी नामक कीट को अपना 24 वां गुरु बताया है। आइए!सबसे पहले जानते हैं कि भृङ्गी कीट कैसा होता है और क्या करता है? वैसे तो इस जगत में कीड़ों की अनेक प्रजातियां हैं।आपको जानकर आश्चर्य होगा कि संसार में प्राणियों में सर्वाधिक आबादी ही कीड़ों (arthropods)की है। उन्हीं कीड़ों की प्रजाति में भृङ्गी भी एक कीट है।भृंगी कीट एक पंखों वाले चींटे के समान जीव होता है । इसकी विशेषता ये है कि ये नर और मादा मिलकर जनन क्रिया द्वारा बच्चे उत्पन्न नहीं करता  क्योंकि भृंगी कीट में नर मादा जीव अलग अलग होते ही नहीं है । ये दीवाल आदि पर बने अपने तीन चार छिद्रों वाले मिट्टी के छोटे से गोल घर में किसी तिनके जैसे मामूली कीङे (जो कि उसके द्वारा दिये गए अंडे से निकला हुआ लार्वा ही होता है) को उठा लाता है और घर के अन्दर डालकर स्वयं बाहर से पंख फ़ङफ़ङाता हुआ तेज भूँ भूँ हूँ हूँ की ध्वनि करता है । इसके स्वर से छोटा कीङा भय से बेहोश हो जाता है और भय से ही उसकी आंतरिक तथा बाह्य संरचना परिवर्तित होकर भृंगी कीट जैसी ही हो जाती है ।वास्तव में उसका लार्वा ही बेहोश होकर प्यूपा बन जाता है ।उस अवधि में उसकी आंतरिक व बाह्य रचना परिवर्तित होकर भृङ्गी कीट का रूप ले लेती है।
      राजा यदु को दत्तात्रेयजी बता रहे हैं कि हे राजन्!मैंने इसी भृङ्गी कीट से यह शिक्षा ली है कि यदि व्यक्ति स्नेह से, द्वेष से अथवा भय से तीनों में से किसी भी भाव से एकाग्र होकर मन को किसी मे भी लगा दे वह उसी के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।इस प्रकार से अगर मनुष्य परमात्मा में एकाग्रचित्त कर ले तो शीघ्र ही वह स्वयं ही परमात्मा के स्वरूप को उपलब्ध हो जाता है।मीरां बाई ने स्नेह से अपने मन को श्री कृष्ण में लगाया और वे उन्हीं में समा गई। रावण सदैव द्वेष पूर्वक प्रभु श्री राम को याद करता रहा, इससे उसका मन सदैव राम में लगा रहा, परिणाम हमारे सामने है। मृत्यु के बाद उनको परमात्मा का धाम ही मिला। कहने का अर्थ है कि सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, एकाग्रचित्त होकर परमात्मा का स्मरण करना और सबसे अच्छा है, प्रेम पूर्वक परमात्मा का स्मरण।
       इस प्रकार दत्तात्रेय जी ने राजा यदु को पृथ्वी से लेकर भृङ्गी कीट तक के 24 गुरुओं से ली हुई शिक्षा से परिचित कराया। अंत में वे कहते हैं कि अपनी इस मनुष्य देह से भी महत्वपूर्ण ज्ञान लिया है।यह  ऐसा ज्ञान है जो कि जीवन की सत्यता से हमारा परिचय कराता है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Thursday, August 8, 2019

गुरु-23

गुरु-23
      दत्तात्रेयजी के अगले गुरु है, सर्प।सांप में उन्होंने क्या विशेषता देखी, आइए!पहले उसकी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।सांप सदैव अकेले ही विचरण करता है, सांप की केवल इसी एक विशेषता से उन्होंने बहुत बड़ी शिक्षा ग्रहण कर ली। वे कहते हैं कि साधु को भी सांप की तरह अकेले ही विचरण करना चाहिए।सन्यासी को मठ मंडली आदि नहीं बनानी चाहिए।प्रमाद न करे,एक स्थान पर स्थिर होकर रहे नहीं, घर बनाकर नहीं रहे क्योंकि घर ही दु:खों की जननी है।साधु को चाहिए कि किसी से कोई सहायता न ले तथा व्यर्थ की बातें न करे।
           सर्प के बाद दत्तात्रेयजी ने मकड़ी को अपना गुरु माना है। मकड़ी अपनी ही लार से जाले का निर्माण करती है, उसी में विहार करती है और फिर कार्य पूरा होने पर उसे खुद ही निगल लेती है।इसी प्रकार परमेश्वर भी अपने से ही संसार का निर्माण करते हैं, जीव रूप से जगत में विहार करते हैं और फिर उसे अपने में ही लीन कर लेते हैं।
      सर्वशक्तिमान भगवान कल्प के आरंभ में बिना किसी की सहायता लिए अपनी ही माया से जगत का निर्माण करते हैं और कल्प के अंत प्रलयकाल में उसे अपने में ही लीन कर लेते हैं।वे सबके आधार हैं, सबके आश्रय हैं परंतु स्वयं अपने ही आधार और आश्रय से रहते हैं, किसी दूसरे के आश्रय से नहीं।वे प्रकृति और पुरुष दोनों ही के नियामक हैं। सत्व,रज और तम गुण की शक्तियों को साम्यावस्था तक वे ही पहुंचाते हैं।वे अपनी शक्ति काल से त्रिगुणी माया रूपी प्रकृति को क्षुब्ध करते हैं और फिर सर्वप्रथम क्रियाशक्ति प्रधान सूत्र महतत्व की रचना करते हैं ।यह सूत्ररूप महतत्व ही त्रिगुण की पहली अभिव्यक्ति है और सृष्टि का मूल कारण भी।उसी में यह सारा विश्व सूत में ताने बाने की तरह ओत-प्रोत है।इसी के कारण जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है।
       मकड़ी के मुख से निकलने वाले सूत्र और उससे बनाये जाने वाले जाल, इसमें निर्बाध विचरण करती मकड़ी और फिर जाले को स्वयं के द्वारा निगल लिए जाने जैसी घटना को देखकर ही दत्तात्रेयजी को महत्वपूर्ण ज्ञान की उपलब्धि हुई । मकड़ी से लिये ज्ञान से इस जगत के निर्माण से लेकर प्रलय तक की प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है।अतः यह कहा जा सकता है कि बुद्धि का उपयोग कर छोटी से छोटी घटना, जो कि सदैव अपने आस पास घटित होती ही रहती है, उनसे अवश्य ही कुछ न कुछ तो सीखा ही जा सकता है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।