Saturday, August 1, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -69

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -69

           आसक्ति से अनासक्त हो जाना इतना सरल नहीं है परन्तु अनासक्ति से अनुरक्ति तक पहुँचना तुलनात्मक दृष्टि से सुगम है । मनुष्य के जीवन में आ रही समस्त समस्याओं की जड़ में आसक्ति ही है । आसक्ति का त्याग कर या तो विरक्ति में जाया जा सकता है अथवा फिर अनासक्त होकर मन की चंचलता को नियंत्रित कर लिया जाता है । मन की चंचलता ही प्रायः आसक्ति को विरक्ति में ले जाती है परंतु ऐसी विरक्ति आसक्ति का ही दूसरा रूप होती है । मन की चंचलता के कारण ऐसी विरक्ति भी आसक्ति के त्याग का प्रदर्शन मात्र बन कर रह जाती है । ऐसी विरक्ति कब आसक्ति में पुनः परिवर्तित हो जाती है, पता ही नहीं चलता । 

              मन की चंचलता ही मनुष्य को विपरीत परिस्थिति में अस्थाई रूप से विरक्त तो कर देती है परन्तु थोड़ी सी अनुकूलता मिलते ही व्यक्ति विरक्ति का चोला उतारकर पुनः संसार में आसक्त हो जाता है । इसलिए कहा जा सकता है कि ऐसी विरक्ति आत्मिक स्तर पर नहीं हुई है बल्कि यह केवल मन की उठापटक मात्र ही है । संसार में रहते हुए (जहां पर आसक्त होने के अनगिनत साधन हैं) विरक्ति में जाना लगभग असम्भव है । यदि संसार के एक स्थान को छोड़कर अन्यत्र जैसे वन आदि में चले भी जाएंगे तो भी सांसारिक आसक्तियां पीछा छोड़ने वाली नहीं है । संसार बाहर से छोड़ने पर विरक्ति नहीं आती बल्कि स्थायी विरक्ति के लिए तो संसार को भीतर से त्यागना पड़ता है । फिर संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते के जल में तैरते हुए भी जल से निर्लिप्त बने रहने की तरह हम भी संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होंगे ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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