आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -68
अनासक्ति के इन आठ सूत्रों से एक ही अभिप्राय है, मन पर नियंत्रण । केवल आठ ही क्यों, अगर हम अधिक गहराई से और सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करें तो कुछ और भी सूत्र निकल कर हमारे सामने आ सकते हैं । इनमें से किसी एक सूत्र को आत्म-सात करते हुए आसक्ति से स्वयं को दूर रखा जा सकता है । सभी सूत्र आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । किसी भी एक सूत्र को पकड़ लेने से समस्त आठों सूत्र सध जाते हैं, ऐसा मेरा मानना है ।
एक गृहस्थ को न तो आसक्त होना चाहिए और न ही विरक्त । उसके लिए मध्यम मार्ग ही उपयुक्त है । अनासक्ति अर्थात पूर्व जन्म के संस्कारों से मिलने वाले इन्द्रियों के सुख को त्याग-पूर्वक भोगना, उन भोगों के प्रति आसक्त नहीं होना और न ही उन भोगों से डर कर दूर भाग कर विरक्त होना । समस्त इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए संसार की सेवा करें और आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हों, वास्तविक अनासक्ति यही है ।
एक गृहस्थ के लिए विरक्त होने के स्थान पर अनासक्त होना सरल है । अनासक्ति से ही अनुरक्ति की राह निकलती है । अपने बनाए संसार के घेरे को तोड़कर बाहर निकलना ही ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ चलना है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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