आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -70
अनासक्ति भी ऐसी ही अवस्था का नाम है, जिसमें मनुष्य संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहता है । अनासक्त जीवन आपको संसार से मुक्त भले ही करदे परन्तु परमात्मा की तरफ़ जाना है तो वह इससे भी आगे की यात्रा है । हम अनासक्त होकर सांसारिक आसक्ति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं । अब हमें अपने भीतर परमात्मा के प्रति आसक्ति पैदा करनी होगी । परमात्मा के प्रति आसक्ति को ही अनुरक्ति कहा जाता है । आसक्ति से अनुरक्ति की ओर जाने के लिए अनासक्ति तो मध्य का एक पड़ाव मात्र है । इसलिए अनासक्त होकर ही सन्तुष्ट नहीं होना है बल्कि पूर्व की सांसारिक आसक्ति को भविष्य की अनुरक्ति में बदलना होगा । प्रश्न है कि अनासक्ति अनुरक्ति में कैसे परिवर्तित होगी ?
मन की चंचलता पर नियंत्रण होते ही व्यक्ति आसक्त से अनासक्त हो जाता है । मन की चंचलता नियंत्रित होती है, बुद्धि में उपजे ज्ञान से । इस ज्ञान (विवेक) का सदुपयोग कर सांसारिक आसक्ति की दिशा बदल कर उसे परमात्मा की ओर मोड़ा जा सकता है । इसके लिए सांसारिक आसक्ति का अत्यंत अभाव होना आवश्यक है । समस्या यही है कि अनासक्त जब परमात्मा के प्रति आसक्त होने का प्रयास करता है तब न जाने कब वह पुनः संसार में आसक्त हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता । इसका कारण है, मन का बुद्धि पर पुनः प्रभावी हो जाना । इसलिए अनुरक्ति के लिए सांसारिक आसक्ति का पूर्ण रूप से मिट जाना आवश्यक है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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