Tuesday, November 7, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.18(समापन)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.18(कल से आगे)-
              अब चर्चा करेंगे इस श्लोक में निहित अर्थ और भावार्थ की | शंकराचार्यजी महाराज का यह शिष्य कह रहा है कि जो व्यक्ति देव मंदिर में निवास करता है, जो पेड़ के नीचे रहता है, पृथ्वी पर उसे ही शैया मानकर सोता है, अकेला रहता है, कुछ भी इकट्ठा नहीं करता और संसार के किसी भी सुख को नहीं चाहता वह वैरागी है और केवल वही आनंद को उपलब्ध है | देव मंदिर में निवास करने का अर्थ है स्वयं के द्वारा निर्मित किये संसार के आश्रय को त्यागकर एक परमात्मा का ही आश्रय स्वीकार कर लेना | पेड़ के नीचे निवास करना अर्थात घर की आसक्ति का त्याग कर देना | पृथ्वी को ही शैया बना लेना अर्थात जो कुछ मिले जैसे भी मिले उसी परिस्थिति में रह लेना | अपरिग्रह अर्थात धन, वस्तुओं आदि का संग्रह न करना | संसार के सभी सुखों का त्याग कर देना |
         इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताएं सीमित कर लेता है, वही व्यक्ति वैराग्य को उपलब्ध होता है | राग से बाहर निकल जाना, उससे परे हो जाने का नाम ही वैराग्य है | राग क्या है ? जो कुछ भी हमारे पास है, उसमें संतुष्ट न रहकर और अधिक की चाह करना | हमारे पास चाहे जितना धन हो जाये, चाहे हम कथित सुख देने वाली अनगिनत वस्तुएं इकट्ठी कर लें, इन सब का अभाव कभी समाप्त नहीं होगा | इसे ही राग कहते हैं | हमें अपन राग छोड़कर वैराग्य धारण करना होगा | इसके लिए आवश्यक है कि हम उसी में संतुष्ट रहना सीखें, जो कुछ भी हमें मिला है | यही सुखी जीवन का रहस्य है | आनंद प्राप्ति के लिए हमें हमारी आवश्यकताएं सीमित रखनी होगी |
            जो इंसान संसार के भौतिक सुख-सुविधाओं से ऊपर उठ चूका है, जिसके जीवन का लक्ष्य शारीरिक सुख एवं धन और समाज में प्रतिष्ठा की प्राप्ति करना मात्र ही नहीं है, वह प्राणी अपना सम्पूर्ण जीवन सुख एवं शांति से व्यतीत करता है | इसीलिए शंकराचार्य महाराज अपने शिष्य की इस बात का अनुमोदन करते हैं |
सुर-मन्दिर-तरु-मूल-निवासः, शय्या भूतलमजिनंवासः |
सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः ||18||
अर्थात देव-मंदिर में निवास, पेड़ के नीचे रहना, जमीन पर अथवा भूमि जैसी शैया पर शयन करना, अकेले रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से भला किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी ?
कल श्लोक सं.19
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||    

Monday, November 6, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.-18

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.18 -
सुर-मन्दिर-तरु-मूल-निवासः, शय्या भूतलमजिनंवासः |
सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः ||18||
अर्थात देव-मंदिर में निवास, पेड़ के नीचे रहना, जमीन पर अथवा भूमि जैसी शैया पर शयन करना, अकेले रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से भला किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी ?    
            जो चर्चा शंकराचार्य महाराज के शिष्य ने 16 वें श्लोक में प्रारम्भ की थी, दूसरे शिष्य ने १७वेन श्लोक में उसे और स्पष्ट किया और अब अगला शिष्य इस श्लोक में इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए दुखों के पार जाने की राह दिखला रहा है | हमारे कर्म-कांड और क्रियाएं इतनी अधिक हैं कि हम सभी इनको करने में ही लगे रहते हैं | जब एक क्रिया को करते–करते हम थक जाते हैं और स्वयं में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं देखते, तब हम उसे त्यागकर एक अन्य नई क्रिया करने की ओर आकर्षित हो जाते हैं | संसार दुखों का सागर है, इस बात में कोई मत भिन्नता नहीं है | परन्तु इस सागर को पार करने के लिए सुदृढ़ नौका की आवश्यकता होती है, न कि छोटे मोटे तिनकों की | पिछले श्लोक में व्यक्ति जो क्रियाएं करता है, उनमें त्याग की बात केवल एक दान के विषय में ही कही जा सकती है | हमें सर्वप्रथम यह जानने का प्रयास करना होगा कि इस संसार को दुःख का सागर क्यों कहा गया है ? संसार में दुःख भी है और सुख भी | सुख उसी को कहते हैं, जहाँ दुःख न हो | सुख की वैसे कोई उपस्थिति इस संसार में है ही नहीं | केवल दुःख की घटती मात्रा को हम सुख कह देते हैं और जब यह दुःख की घटी मात्रा पुनः बढ़ती है तब उसे दुःख का आना कह देते हैं | सुख-दुःख जैसी कोई अवस्था इस जीवन में है ही नहीं | सब मन की अवस्थाओं का नाम परिवर्तन मात्र है | आत्मा इन अवस्थाओं से सदैव अछूती रहती है |
                मन के अनुरूप ही यह शरीर कार्य करता है | शरीर और सांसारिक मन से आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं है | जब आत्मा मन के साथ हो जाती है तब उसी मन के कारण ही हमें अर्थात आत्मा को नए-नए शरीरों में जाना पड़ता है | उसका कारण है, हमारे (आत्मा) द्वारा शरीर को ही स्वयं होना मान लेना | जब मन किसी सुख की चाह करता है तब शरीर उसी अनुसार कर्म कर वह सुख उपलब्ध कराता है | जब कर्म उस सुख के अनुरूप नहीं हो पाते हैं, तब मन को दुःख होता है | ऐसे ही सुख को प्राप्त करने के लिए हम हमारी आवश्यकताएं विलासिता की सीमा तक बढ़ा लेते हैं | जिस दिन हम अपनी इन इच्छाओं और आवश्यकताओं पर लगाम लगा लेंगे, फिर हमें न तो दुःख मिलेगा और न ही सुख | तब हम आनंद की अवस्था में पहुँच जायेंगे | सदैव आनंद ही आनंद | 
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, November 5, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं. 17(समापन)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.17(समापन)-
            हमारा उद्देश्य  आत्म-ज्ञान प्राप्त करना ही होना चाहिए | आत्म-बोध होना ही परमात्मा को पा लेना है और यही परम ज्ञान है | इस अवस्था को उपलब्ध होते ही व्यक्ति सहज रहने लगता है | उसे संसार की कोई भी बात चाहे वह उचित हो अथवा अनुचित, सुख पहुँचाने वाली हो अथवा दुःख दायी, मान बढाने वाली हो अथवा अपमानित करने वाली, किसी भी परिस्थिति से वह विचलित नहीं हो सकेगा | यह परम ज्ञान प्राप्त हो जाने की अवस्था है | “समत्वं योग उच्यते”, (गीता-2/48)गीता में इस अवस्था को भगवान श्री कृष्ण ने समत्व-योग कहा है |
              गंगासागर जैसे कठिन तीर्थों की यात्रायें शरीर को थका देने वाली होती हैं | ऐसी यात्रायें आपके शरीर को प्रभावित कर सकती है, मन को नहीं | कठोर व्रत भी शरीर को ही कष्ट देते हैं, उनसे मन को प्रभावित नहीं किया जा सकता | दान अवश्य ही कुछ स्तर तक आपको मानसिक संतुष्टि दे सकता है परन्तु दान के जो प्रकार गीता में बतलाये गए है उनमें केवल सात्विक दान ही फलदायी होते है | शंकराचार्यजी के अनुसार उपरोक्त तीनों कार्य आप चाहे एक सौ वर्षों तक करें, आप मुक्त नहीं हो सकते | हमें मुक्त होना है, सांसारिक बंधनों से, मोह-माया से, मन में उठ रही सांसारिक कामनाओं और अनगिनत इच्छाओं से | इनसे मुक्त होने के लिए ये तीनों उपाय व्यर्थ हैं | हमें चाहिए कि हम परमात्मा की खोज में लगें, स्वयं के भीतर उसको पाने की लगन पैदा करें, तभी परम ज्ञान को पाया जा सकता है | परम ज्ञान क्या है ? परम ज्ञान है, स्वयं को जान लेना | हम सब परमात्मा स्वरूप ही हैं, इसको जानकर ज्ञानी हो जाना | यही आत्म-बोध है | राजकुमार सिद्धार्थ ने उपरोक्त वर्णित सभी उपाय किये थे | उनको कर-कर के वे थक चुके थे | तीर्थ यात्रायें, कठोर व्रत आदि ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था | परन्तु जब वे परम ज्ञान को उपलब्ध हुए तभी वे सहज अवस्था को उपलब्ध होकर भगवान बुद्ध कहलाये | कबीर भी कहते हैं –
आतम-ज्ञान बिना सब सूना, क्या मथुरा क्या काशी |
कहत कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिना मिटे न चौरासी ||
अर्थात चाहे आप कितनी ही यात्रायें मथुरा, काशी आदि तीर्थ स्थानों की कर लें, आत्म-ज्ञान हुए बिना आप आवागमन से मुक्त नहीं हो सकते | गुरु से ज्ञान प्राप्त कर ही आप इन चौरासी लाख योनियों में जाने से अपने आपको रोक सकते हैं अन्य उपायों से नहीं | यह सब होगा, गुरु के पास जाकर आत्म-ज्ञान प्राप्त करने से | यही बात शंकराचार्य महाराज का यह शिष्य भी कह रहा है -
कुरुते गंगासागरगमनं, वृतपरिपालनमथवादानम् |
ज्ञानविहीन:सर्वमतेन मुक्तिः, न भवति जन्मशतेन ||17||
अर्थात संसार का प्रत्येक धर्म कहता है कि बिना ज्ञान प्राप्त किये मुक्त नहीं हुआ जा सकता | केवल गंगासागर जाकर स्नान करने से, व्रतादि कर लेने से अथवा दान देने से भी सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं हो सकती | हमें मुक्ति की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है | लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्त नहीं होगा |
कल श्लोक सं.-18
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् || 

Saturday, November 4, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.-17(कल से आगे)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.17(कल से आगे)-
      इस श्लोक के माध्यम से शंकराचार्य महाराज के शिष्य का कहना है कि चाहे जितनी कठिन तीर्थ-यात्रा कर ली जाये, कठिन से कठिन व्रत कर लिए जाये अथवा दान दिया जाये, सौ वर्षों तक ऐसा करने पर भी ये आपको मोक्ष नहीं दिला सकेंगे | इसका कारण क्या है ?
           सबसे बड़ा कारण है कि हमें इस बात का ज्ञान ही नहीं होता कि तीर्थ-यात्रा, व्रत और दान किस स्थिति में आध्यात्मिकता में सहयोगी हैं | केवल देखा-देखी इन सबका अनुसरण करना लाभदायक नहीं हो सकता | मैं यह तो नहीं कह सकता कि इन तीनों का कोई महत्त्व नहीं है परन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि बिना जाने-बुझे तीर्थ-यात्रा करना, व्रत रखना अथवा दान करना उपयुक्त फल प्रदान नहीं करते | इन तीनों के करने के पीछे क्या राज है, यह जानकर इनको करना फिर भी कुछ उपयोगी है | तीर्थ-यात्रा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए केवल एक वातावरण निर्मित करती है | इस वातावरण के कारण व्यक्ति की परमात्मा के प्रति अनुरक्ति बढ़ती है | यह ज्ञान की और जाने का प्रथम चरण है | इसके अतिरिक्त अन्य किसी रूप में यह यात्रा ज्ञान प्राप्ति में सहयोग नहीं करती है | जब परमात्मा के प्रति अनुरक्ति बढ़ती है तब उसका पूजा करने का मन करता है | व्यक्ति ऐसे कार्य करना पसंद करता है जो परमात्मा को प्रिय हों | यह ज्ञान प्राप्ति की और जाने का द्वितीय चरण है | इसके अंतर्गत व्रत, दान करना, प्रभु की मूर्ति की पूजा करना आदि जैसी स्थूल क्रियाएं सम्मिलित हैं | प्रायः सभी व्यक्ति इस द्वितीय चरण तक आकर स्थिर हो जाते हैं | इस चरण तक की उपलब्धि ज्ञान के संदर्भ में नगण्य है | परमात्मा की प्राप्ति अर्थात परम ज्ञान से यह कोसों दूर है |
उत्तमा सहजावस्था, मध्यमा ध्यान-धारणा |
अधमा देव पूजाश्च, तीर्थयात्रा धमाधमा ||
     इस श्लोक के अनुसार व्यक्ति की ज्ञान की अवस्था उसकी सहजावस्था होती है | सबसे उच्च अवस्था यही है | माध्यम अवस्था है परमात्मा के ध्यान-धारणा की अवस्था | निम्न अवस्था है, केवल पूजा-पथ, व्रत, दान आदि स्थूल क्रियाओं में ही रमे रहना और निम्नतर अवस्था है, केवल तीर्थाटन ही करते रहने की |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Friday, November 3, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.-17-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.17-
कुरुते गंगासागरगमनं, वृतपरिपालनमथवादानम् |
ज्ञानविहीन:सर्वमतेन मुक्तिः, न भवति जन्मशतेन ||17||
अर्थात संसार का प्रत्येक धर्म कहता है कि बिना ज्ञान प्राप्त किये मुक्त नहीं हुआ जा सकता | केवल गंगासागर जाकर स्नान करने से, व्रतादि कर लेने से अथवा दान देने से भी सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं हो सकती | हमें मुक्ति की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है | लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्त नहीं होगा |
               भज गोविन्दम् के 16 वें श्लोक को कहने वाले शिष्य की उसी बात को और स्पष्ट करते हुए अन्य एक शिष्य कह रहा है कि संसार में जितने भी धर्म प्रचलित है, वे सभी धर्म यह कहते हैं कि बिना ज्ञान प्राप्त किये सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता | हमारे धर्म में जितने भी शास्त्र हैं, वे सब ज्ञान को प्रथम स्थान देते हैं | ज्ञान को ही पूर्ण रूप से स्पष्ट करने के लिए वेदों से उपनिषद् लिखे गए | श्री मद्भगवद्गीता भी एक उपनिषद है | उपनिषदों को कथा-कहानी के माध्यम से स्पष्ट करने के लिए 18 पुराणों की रचना की गयी | समय-समय पर विभिन्न महापुरुषों ने इन ग्रंथों को और अधिक स्पष्ट करने के लिए उनकी व्याख्याएं की है | स्थानीय भाषाओं में इन ग्रंथों के अनुवाद भी हुए हैं | फिर भी हम आसान और सुगम रास्ते की तलाश में ज्ञान को पाने का प्रयास छोड़ तीर्थ यात्राओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं | शंकराचार्यजी के समय गंगासागर की तीर्थ यात्रा को कठिनतम यात्रा माना जाता था |
           तीर्थ यात्रा के साथ-साथ परमात्मा की पूजा के लिए विभिन्न अवसरों पर व्रत आदि भी किये जाते थे | तप की तरह व्रत भी शरीर को कष्ट देकर सहनशील बनाने का एक उपक्रम है | पूजा की विधियों के अंतर्गत ही दान और व्रत आते हैं | जिसके पास बहुत अधिक धन सम्पति होती थी वह उसका कुछ भाग दान करता है उससे उसको एक प्रकार की आत्म संतुष्टि भी मिलती है | दान जब लोक प्रशंसा के उद्देश्य से किया जाता है तो वह दान निम्नतम श्रेणी का दान कहलाता है | दान के बारे में कहा जाता है कि दान सुपात्र अर्थात किसी योग्य व्यक्ति को किया जाना चाहिए और दान की जाने वाली राशि भी उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने वाली होनी चाहिए | अल्प दान ऊँट के मुंह में जीरे के समान होगा जो भूख को तीव्र कर देता है | इस प्रकार अल्प दान और लोक-प्रशंसा के लिए किये जाने वाले दान से सदैव बचना चाहिए | दान के प्रतिफल के रूप में किसी बात की आशा नहीं रखनी चाहिए |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Thursday, November 2, 2017

भज गोविन्दम्य - श्लोक सं. - 16 (समापन) -

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.16 (समापन)-
        इस श्लोक के माध्यम से शंकराचार्य के शिष्य उन्हीं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर कह रहे हैं कि जितने भी तप के साधन है, केवल उनको करने मात्र से ही हम मोक्ष के अधिकारी नहीं हो जायेंगे | मनुष्य का बंधन क्या है ? यह ज्ञान हो जाने पर वह उस बंधन को तोड़कर ही वह मुक्त हो सकता है | हमारा बंधन है, यह स्व निर्मित संसार जो कि हमारी इच्छाओं की बुनियाद पर खड़ा है | जब तक हम अपने मन पर, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखेंगे तब तक तप के ऐसे उपाय निरर्थक हैं | अगर साधना ही है तो अपने मन को साधो, इस भौतिक शरीर को नहीं | भौतिक शरीर तो एक साधन मात्र है और अगर उस साधन को भी विकार ग्रस्त कर दिया तो फिर इस मन को साधना कैसे हो पायेगा ? मुक्ति शरीर को नहीं चाहिए, मुक्ति चाहिए इस मन को | मन को इच्छाओं से मुक्त कीजिये, मोक्ष आपको स्वतः ही उपलब्ध हो जायेगा |
                यह कहना कि शरीर को तपाने से मोक्ष हो जायेगा यह उतना ही असत्य है जितना एक कबूतर द्वारा आँख बंद कर बिल्ली का वहां से चले जाना मान लेना | कबूतर आँख बंद कर लेता है तो वह उस बिल्ली का शिकार बन जाता है और इच्छाओं को नियंत्रित न कर केवल शरीर को कष्ट देने से शरीर में विकार पैदा हो जाते हैं | कबूतर को चाहिए था कि वह आंखें बंद करने के स्थान पर उस बिल्ली की दृष्टि से ओझल हो जाता | व्यक्ति को चाहिए कि तप से शरीर को सहनशील बनाने के स्थान पर मन को नियंत्रित कर उसे सहनशील बनाये और उसमें उठ रही विभिन्न प्रकार की कामनाओं और इच्छाओं पर अंकुश लगाये | मन में जन्म लेने वाली विभिन्न प्रकार की कामनाएं ही व्यक्ति को बाँध लेती है और यह मन का बंधन किसी भी प्रकार के तप से नहीं टूट सकता इस बंधन से केवल इच्छाओं और मन पर नियंत्रण स्थापित करके ही मुक्त हुआ जा सकता है | इसीलिए शंकराचार्य महाराज का यह शिष्य कह रहा है कि-
अग्ने वह्निः पृष्ठेभानु:,रात्रौचिबुक-समर्पित-जानु:|
करतलभिक्षातरुतलवासः तदपि न मुंचितआशापाश: ||16||
अर्थात सूर्यास्त के बाद, रात्रि में अग्नि जलाकर और घुटनों में सिर छिपाकर सर्दी से बचने का प्रयास करने वाला, हाथ में रखकर भिक्षा का अन्न खानेवाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को तोड़ नहीं पाता है |
“||भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते ||”
कल श्लोक सं. 17
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, November 1, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.- 16 -

भज गोविन्दम् – श्लोक सं. 16 -
अग्ने वह्निः पृष्ठेभानु:,रात्रौचिबुक-समर्पित-जानु:|
करतलभिक्षातरुतलवासः तदपि न मुंचितआशापाश: ||16||
अर्थात सूर्यास्त के बाद, रात्रि में अग्नि जलाकर और घुटनों में सिर छिपाकर सर्दी से बचने का प्रयास करने वाला, हाथ में रखकर भिक्षा का अन्न खानेवाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को तोड़ नहीं पाता है |
           समय निरंतर चलता रहता है | इसे न कोई रोक पाया है और न ही कोई रोक पायेगा | सिर्फ अपने शरीर को कष्ट देने से और किसी जंगल में अकेले में कठिन तपस्या करने से हमें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी |
          जब संसार से मनुष्य का मोह भंग होने लगता है तब वह विभिन्न उपाय करता है, उस परम को पाने के लिए | इसके अंतर्गत एक उपाय ‘तप’ करना भी कहा गया है | इसके लिए कई लोग सूर्यास्त के बाद अग्नि को प्रज्वलित कर लेते हैं और उसके पास बैठकर अग्नि की तपिश को सहना सीखते हैं | इसी प्रकार कुछ अन्य लोग भयंकर शीत लहर में नंगे बदन बैठकर सर्दी से बचने के लिए दोनों पैरों को मोड़कर बैठ जाते हैं और दोनों घुटनों के मध्य अपना सिर छिपाकर शरीर को सिकोड़ लेते हैं | इस प्रकार वे सर्दी को सहन करते हैं | कई व्यक्ति भिक्षा में प्राप्त अन्न को अपनी हथेलियों पर रखकर खाने का तप करते हैं और कुछ अन्य लोग घने जंगल में जाकर तप-साधना में लग जाते हैं | कहा जाता है कि ये सभी साधना के अंग हैं | शंकराचार्य महाराज कहते हैं कि इन सब साधनों से भी आपको मोक्ष प्राप्त नहीं होगा | शरीर एक साधन अवश्य है परन्तु मुक्ति के लिए इस साधन को भी चुस्त-दुरुस्त रखना आवश्यक है | जितने भी साधन एक तप के रूप में किये जाते हैं, वे केवल शरीर को पीड़ा ही दे सकते हैं, व्यक्ति को मोक्ष नहीं |
            हमारा शरीर जो कि परमात्मा की ही एक देन है और उसी से जीवन-मुक्त हुआ जा सकता है | इसको पीड़ा पहुँचने से हो सकता है कुछ अनुभवों में इसकी सहन सीमा बढ़ जाये परन्तु केवल सहन सीमा को बढा लेना ही परमात्मा को पा लेना नहीं है | अगर हम भूखे रहकर व्रत करें और दिन भर भोजन का ही चिंतन करते रहें तो ऐसे व्रत से कोई लाभ नहीं होने वाला | आप भंयकर सर्दी में नंगे बदन बैठकर ईश्वर की प्रार्थना कर रहे हो, और शरीर ठण्ड से थर-थर कांप रहा हो तो आपका मन ईश्वर में न लगकर ठण्ड से बचने के उपाय खोजने में लगा रहेगा | भिक्षा के अन्न से जीवन निर्वाह करना आध्यात्मिकता के पथ पर अहंकार को समाप्त करने का एक उपाय मात्र है परन्तु भिक्षा के अन्न को हाथों में लेकर खाना और बर्तनों का सर्वथा त्याग कर देना मात्र एक आडम्बर के सिवाय कुछ भी नहीं है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ’ प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||