Wednesday, June 7, 2017

मामेकं शरणं व्रज – 6

मामेकं शरणं व्रज – 6
            संसार के किसी भी धर्म की शिक्षा को लें, प्रत्येक धर्म की अंतिम शिक्षा ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है | बौद्ध धर्म में कहते हैं - ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि’ अर्थात बुद्ध की शरण में चले जाओ; ‘धर्मं शरणं गच्छामि’ अर्थात धर्म की शरण में चले जाओ और ‘संघं शरणं गच्छामि’ अर्थात संघ की शरण में चले जाओ | तत्व की दृष्टि से बुद्ध की शरणागति है, साधन की दृष्टि से धर्म की शरणागति है और आचार की दृष्टि से संघ की शरणागति है | शरणागति जैन-सम्प्रदाय में भी है | जैन-सम्प्रदाय में कहा जाता है - ‘आत्त-शरणो-भव’ अर्थात आत्मा की शरण में रहो | जैन-सम्प्रदाय कहता है कि इस संसार और शरीर में राग-द्वेष है, जन्म-मरण है जबकि आत्मा में न राग है; न द्वेष है, न जन्म है और न ही मरण | जैन धर्म में श्री महावीर, ऋषभदेव तथा भगवान् पार्श्वनाथ की शरण होना कहीं पर भी नहीं कहा गया है | जो भी आत्म-शरण हो गया, आत्म-निष्ठ हो गया, समझो, वह मोक्ष का अधिकारी हो गया |
                इस प्रकार हमने देखा कि शरणागति शब्द का वर्णन जैन धर्म में भी है, बौद्ध धर्म में भी है और वेदांत में तो है ही | बौद्ध-धर्म में बुद्ध की शरण है जबकि जैन-धर्म में आत्मा की शरण है | बुद्ध की शरण हो जाना बुद्ध की करुणा की पराकाष्ठा है, जबकि आत्मा की शरण अर्थात अपने आप की शरण हो जाना पौरुष की पराकाष्ठा है | इसीलिए बौद्ध-धर्म करुणा प्रधान है और जैन-धर्म अहिंसा प्रधान | सांख्य-योग में शरणागति के बारे में कहा जाता है कि प्रारम्भ में ईश्वर-शरण और अंततः आत्म-स्थति ही शरण है | वेदांत में अंतःकरण की शुद्धि के द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करना मानते हैं | भक्ति-दर्शन तो और भी विलक्षण है | भगवान का एक नाम शरण है और दूसरा शरण-भाव है | वे मानते हैं कि एक शरण-रूप तो स्वयं भगवान् है और दूसरा जो शरणागति का भाव है, वह साधन है | एक उपेय है तो दूसरा उपाय, एक साध्य है तो दूसरा साधन | इसका अर्थ यही हुआ की उपेय और उपाय, साध्य और साधन एक प्रभु ही है | एक मिलने वाले और दूसरा मिलाने वाले |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, June 6, 2017

मामेकं शरणं व्रज – 5

मामेकं शरणं व्रज – 5
            भगवान शरणागत के लिए कितने ही रूप धर सकते हैं और भला, क्यों न धरे ? उन्हें शरणागत से प्रिय कोई अन्य है ही नहीं | आश्रित की समस्त जिम्मेवारी आश्रयदाता की ही तो रहती है | जिसे अपनी देह तक की भी सुधि नहीं हो, समक्ष साक्षात् काल अर्थात मृत्यु को देखकर भी जो प्रभु का सतत स्मरण कर रहा हो, विपरीत परिस्थिति में भी उसे समक्ष खड़े परमात्मा मुस्कुराते हुए दिखाई पड. रहे हो और मन में एक ही भाव हो कि ‘जैसी प्रभु आपकी इच्छा’, ऐसे में भला प्रभु चुपचाप सब कुछ होते हुए कैसे देख सकते हैं ? भले ही शरणागत के साथ-साथ अपात्र को ही दर्शन क्यों न देना पड़े, प्रभु तुरंत ही वहां अपने भक्त को बचाने पहुँच जाते हैं | अपात्र को भला यह सब कहाँ दिखाई पड़ता है ?  सदा कांच को ही देखते रहने वाला भला हीरे को कैसे पहचान सकता है ? पुत्र के लिए जब पिता ही काल बन जाये तो अपने भक्त को बचाने के लिए खम्भा फाड़ कर भी प्रकट हो जाते हैं - श्री नरसिंह भगवान् | और भक्त प्रह्लाद भी कैसा भक्त ? परमात्मा सब कुछ देने को तैयार खड़े हैं परन्तु भक्त है कि केवल उन्हें ही देख रहा है | प्रह्लाद कहते हैं - ‘कुछ भी नहीं चाहिए, तुम्हारे अतिरिक्त | देनी है तो आपके चरणों की रज दे दो |’ भगवान् है कि वह भी नहीं देना चाहते | इसमें भी संकोच कि कैसे दे दूं ? चरण-रज देना कहीं शरणागत के प्रति अपराध तो नहीं हो जायेगा ?
            जब शरणागत ही है तो ऐसे में कौन तो दे और कौन ले ? भगवान् कहते हैं, आ लग जा मेरे वक्ष से, मेरी गोद में आकर बैठ जा, तूं भी तृप्त हो जा और मैं भी तृप्त हो जाऊं | हम दोनों हो तृप्त हो जाएँ | भक्त और भगवान्, भगवान् और भक्त | एक होते हुए भी दो – ‘भक्ति’ | दो होते हुए भी एक – ‘शरणागति’ | दोनों ही स्थितियों में कोई अंतर नहीं, किसी भी प्रकार की भिन्नता नहीं | भेद केवल दृष्टि का है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Monday, June 5, 2017

मामेकं शरणं व्रज – 4

मामेकं शरणं व्रज – 4
                 श्री मद्भागवत महापुराण ऐसे अनेक दृष्टान्तों से भरा पड़ा है | गजेन्द्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था | जब जल क्रीडा करते हुए ग्राह ने उसे पकड़ लिया तब उसने अपने स्तर से बहुत प्रयास किये, अपने आपको उस मगर की पकड़ से छुड़ाने के लिए | पहले उसने अपने बल का उपयोग किया, फिर अपने परिवार के सदस्यों का सहयोग लिया परन्तु प्रत्येक बार उस पकड़ से छूटने का उसका प्रयास असफल रहा | आखिर थक हारकर उसने परमात्मा की शरण ली और इस प्रकार गजेन्द्र का उद्धार हुआ | भागवत में परमात्मा के शरणागत होते हुए गजेन्द्र कहते हैं –
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम् |
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोSस्म्यहम् || भागवत-8/3/29||
अर्थात आपकी माया अहंबुद्धि से आत्मा का स्वरुप ढक गया है, इसी से जीव अपने स्वरुप को नहीं जान पाता | आपकी महिमा अपार है | उन सर्वशक्तिमान एवं माधुर्य निधि भगवान् की मैं शरण में हूँ |
          भक्ति की चरम अवस्था ही शरणागति है | जब तक व्यक्ति भक्ति-मार्ग पर चलता है, तब तक वह भक्त है और जिसकी ओर चलता है, वह भगवान् है | ‘मैं’ भक्त है और ‘वह’ भगवान् है | परन्तु जब परमात्मा से भक्त एकाकार हो जाता है तब न तो ‘मैं’ बचता है और न ही ‘वह’ | रामकृष्ण परमहंस से एक बार किसी ने पूछा कि ‘मैं’ कब मुक्त होऊँगा ?’ ठाकुर ने बड़ा ही सुन्दर और सटीक उत्तर दिया कि ‘जब ‘मैं’ समाप्त हो जायेगा तब मुक्ति होगी’ | इस ‘मैं’ की समाप्ति सुगमता के साथ न तो कर्म-योग में हो पाती है और न ही ज्ञान-योग में | केवल भक्ति योग की अंतिम सीमा पर पहुँचने पर ही ‘मैं’ समाप्त हो सकता है | इस ‘मैं’ के समाप्त हो जाने का नाम ही शरणागति है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, June 4, 2017

मामेकं शरणं व्रज – 3

मामेकं शरणं व्रज – 3
        परमात्मा की शरण में जाना और परमात्मा की भक्ति करना दो अलग अलग बातें है | भक्ति में भी शरण और श्रद्धा रहती है परन्तु भक्ति में श्रद्धा तो स्थाई भाव है परन्तु शरण अस्थायी | भक्ति में परमात्मा के शरण होते हुए भी व्यक्ति बीच-बीच में स्वयं भी अपने स्तर पर  प्रयास करता रहता है | ऐसी शरण अस्थायी होती है और व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता | भक्ति में व्यक्ति स्वयं शून्य नहीं होता अथवा यों कहा जा सकता है कि स्वयं शून्य होना नहीं चाहता | स्वयं शून्य होने से भक्त का आनंद तिरोहित हो सकता है और वह परमात्मा की भक्ति से मिल रहे आनंद को त्यागना नहीं चाहता | इसीलिए भक्ति में एक भक्त का परमात्मा के शरण होना जरा मुश्किल है | शरणागति में व्यक्ति स्वयं को शून्य कर लेता है और परमात्मा को पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है | अंततः भक्ति की पूर्णता और पराकाष्ठा ही शरणागति है |
                शरणागति और भक्ति में क्या अंतर है, इसको स्पष्ट करने के लिए एक दृष्टान्त देना चाहता हूँ | पाण्डव जब जुआ खेलते हुए सब कुछ हार गए थे, यहाँ तक कि अपनी पत्नी द्रोपदी को भी | उस समय दुर्योधन ने दुशासन को द्रोपदी का चीर हरण करने का आदेश दिया था | द्रोपदी भगवान् श्री कृष्ण की भक्त थी और श्री कृष्ण उसे सखी कहकर पुकारते थे | चीरहरण होने के प्रारम्भ में द्रोपदी अपने वस्त्रों को दोनों हाथों से पकडे रखकर नग्नता से बचने का असफल प्रयास कर रही थी | परन्तु जब उसने देखा कि मेरा यह प्रयास मुझे नग्न होने से बचा नहीं सकेगा, तब उसने अपने हाथों से वस्त्रों को छोड़ दिया और कर-बद्ध होकर श्री कृष्ण के शरणागत होकर उन्हें पुकारने लगी | भगवान् श्री कृष्ण तुरंत वहां पहुँच गए और वस्त्र बनकर उससे लिपट गए | भगवान् का न आदि है, न अंत | इसी प्रकार द्रोपदी के वस्त्रों का भी कोई ओर-छोर नहीं रहा | इस प्रकार भगवान की शरण लेते ही द्रोपदी की इज्जत बच गयी | कहने का अर्थ यह है कि परमात्मा की शरण लेने से परमात्मा को आपके लिए दौड़कर आना ही पड़ता है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् 

Saturday, June 3, 2017

मामेकं शरणं व्रज – 2

मामेकं शरणं व्रज – 2
                 ज्यों ज्यों भक्ति मार्ग पर भक्त प्रगति करता है, धीरे-धीरे सगुण-साकार का स्थान निर्गुण-निराकार लेने लगता है | एक आदर्श भक्त इस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पाता, अतः वह परमात्मा से एकाकार नहीं होना चाहता | वह और उसका भगवान, दो ही बने रहना चाहते है | वह परमात्मा के सगुण-साकार स्वरूप की उपासना में ही सदैव आनंदित रहना चाहता है | सम्पूर्ण शरणागति के लिए इस द्वैत अवस्था से आगे बढ़कर अद्वैत की ओर जाना होगा | इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि भक्ति की सर्वोच्च अवस्था का नाम ही शरणागति है | भक्त परमात्मा की शरण तो रहता है परन्तु पूर्णता के साथ नहीं | एक बार शरणागत हो जाने से भक्त किसकी पूजा अर्चना करे क्योंकि शरणागति की अवस्था में भक्त बचता ही नहीं है, भक्त स्वयं ही भगवान हो जाता है | भक्ति में क्रिया रहती है जबकि शरणागति किसी भी प्रकार की क्रिया से रहित है | भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को भक्त होने का कहने के बाद ही शरणागत होने को कहते हैं क्योंकि अर्जुन किसी भी प्रकार की कोई क्रिया करने में लिप्त होना ही नहीं चाहता | भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् || गीता-18/62 ||
अर्थात हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की शरण में जा | उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा |
             जब तक भक्ति है, तब तक भगवान भी है और भक्त भी | शरणागति में भक्त नहीं रहता बल्कि वह स्वयं ही भगवान के साथ एकाकार हो भगवान ही हो जाता है | ऐसे में शरणागत किसकी भक्ति करे ? आनंद तो परमात्मा की भक्ति में है, शरणागति में नहीं | भक्त कहता है, भगवान मेरे हैं और मैं भगवान का हूँ | शरणागत कहता है, मैं अलग से कुछ हूँ ही नहीं, मैं भगवान के आश्रय में हूँ और सब कुछ भगवान ही है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Friday, June 2, 2017

मामेकं शरणं व्रज - 1

मामेकं शरणं व्रज - 1  
         भक्ति की परिणिति शरणागति है | शरणागति और भक्ति, दो शब्द अवश्य हैं परन्तु दोनों का मंतव्य एक ही है | दोनों में ही लक्ष्य ‘परमात्मा से एकाकार’ होने का होता है | प्रायः मेरे मित्र मुझसे पूछते रहते हैं कि फिर भक्ति और शरणागति में ऐसा कौन सा अंतर है, जो आप इन दोनों को अलग-अलग उद्घृत करते हैं | सतही रूप से देखा जाये तो दोनों में किसी भी प्रकार का भेद दृष्टिगत नहीं है परन्तु गहराई से विचार करें तो दोनों में बड़ा ही सरल और मार्मिक भेद भी है |
       भक्ति-मार्ग में भक्त को भगवान् की ओर चलना पड़ता है, जबकि शरणागति में भगवान् को भक्त तक आना पड़ता है | भक्ति के प्रारम्भ में ज्ञान का होना आवश्यक नहीं है, जबकि भक्ति की परिणिति ज्ञान में होती है | शरणागति का आधार ही ज्ञान है और इसकी परिणिति सम्पूर्ण ज्ञान में होती है | भक्ति में मुख्य आधार पूर्वजन्म के संस्कार और कर्म होते हैं जबकि शरणागति का मुख्य आधार परमात्मा में श्रद्धा और तात्विक ज्ञान का होना है | भक्ति में भक्त ब्रह्म को पा सकने के बाद भी उसके साथ एकाकार होना नहीं चाहता क्योंकि एक भक्त को भक्ति में ही बड़ा सुख और आनन्द मिलता है | भक्ति के लिए दो का होना आवश्यक है, एक भक्त और दूसरा भगवान | इस कारण से भक्ति में भक्त का अस्तित्व कभी भी समाप्त नहीं होता | भक्ति में भक्त और भगवान दोनों एक साथ बने रहते हैं जबकि शरणागति में एक परमात्मा के अतिरिक्त कोई अन्य रहता ही नहीं है | सबसे बड़ा और मुख्य अंतर यह है कि भक्ति प्रायः परमात्मा के सगुण और साकार रूप की, की जाती है जबकि शरणागति में परमात्मा के सगुण साकार स्वरूप पर निर्गुण निराकार की प्रमुखता होती है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Thursday, June 1, 2017

मन्मना भव मद्भक्तो – 28

मन्मना भव मद्भक्तो – 28
सार-संक्षेप –
         भक्ति परमात्मा से जुड़ने की सतत चलने वाली एक प्रक्रिया है | यह प्रक्रिया जिस किसी भी व्यक्ति द्वारा की जाती है, उस व्यक्ति को भक्त कहा जाता है | कर्म और ज्ञान भी भक्ति के ही साधन है परन्तु इन दोनों ही साधनों में श्रम अधिक करना पड़ता है | भक्ति के साधन के अंतर्गत नवधा-भक्ति भी एक महत्वपूर्ण और सरल साधन है, जिसको एक साधारण व्यक्ति भी कर सकता है | श्रवण और कीर्तन से प्रारम्भ हुआ यह साधन आत्म-निवेदन तक यात्रा कर परमात्मा को प्राप्त कराता है | इस सरल साधन के किसी भी एक अंग पर आकर रूक जाना भक्ति मार्ग में हो रही प्रगति को रोक देना है, जो परमात्मा से दूरी रख देता है | भक्ति के किसी एक अंग पर आकर ठहर जाने से परमात्मा के साथ एकीकरण होना असंभव हो जाता है, जो व्यर्थ ही कुंठा को जन्म देता है | अतः भक्ति-मार्ग पर एक-एक एक कर सभी अंगों को साधन बनाते हुए परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है |
             जो व्यक्ति भक्ति के इस सरल मार्ग का अवलंबन करता है, उसको सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है | यह भक्ति की सर्वोच्च अवस्था होती है, जिसे पराभक्ति अथवा परम सिद्धि भी कहा जाता है | इस अवस्था पर पहुंच जाने के पश्चात न तो कुछ करने को शेष रहता है, न ही कुछ जानने को और न ही कुछ मानने को | भक्त इस अवस्था को उपलब्ध होकर स्वयं ही भगवान बन जाता है | इस भक्ति, जिसे अनन्य भक्ति अथवा अव्यभिचारिणी भक्ति कहा जाता है, को उद्घृत करते हुए केवल एक बार भगवान श्री कृष्ण ने गीता में भक्ति-योग शब्द का उपयोग किया है | वे कहते हैं –
मां च योSव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते |
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते || गीता-14/26||
अर्थात जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति-योग के द्वारा मुझको निरंतर भजता है, वह भी प्रकृति में स्थित तीनों गुणों को लांघकर ब्रह्म को प्राप्त करने के योग्य बन जाता है |
                   केवल एक परमात्मा को ही सर्वेसर्वा मानते हुए, स्वार्थ रहित होकर तथा अभिमान को त्यागकर श्रद्धा और भावपूर्ण प्रेम से निरंतर उसका चिंतन करना ही अव्यभिचारी भक्ति-योग है | इसी योग को प्राप्त कर पुरुष अपने जीवन में ही परमात्मा के साथ एक होकर ब्रह्म भूत हो जाता है |
              भक्ति एक ऐसा विषय है, जिस पर कितना ही चिंतन किया जाये, चाहे जितना लिखा जाये, सब अपर्याप्त है | मेरा प्रयास था कि “भक्ति” विषय को सरल और स्पष्ट रूप से आपके समक्ष रखूं, कितना सफल रहा, केवल पाठक ही बता सकते हैं | शरणागति भक्ति की चरम अवस्था का नाम है | वैसे भक्ति और शरणागति दोनों में किसी प्रकार का भेद नहीं है, फिर भी मित्रों के आग्रह के कारण इसे अलग विषय के रूप में लेकर स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ । चलिए, फिर कल से शरणागति विषय पर थोडा सा अलग से चिंतन कर ही लेते हैं |
कल से – ‘मामेकं शरणं व्रज....’
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

 || हरिः शरणम् ||