Saturday, November 16, 2013

श्रीमद्भागवतगीता का आज के समय में औचित्य |

                              महाभारतकाल में विषम परिस्थितियों में भी ज्ञान की गंगाएं बही थी|यह ज्ञान आज हमें तीन सनातन धर्म ग्रंथों के रूप में उपलब्ध है |ये तीन ग्रन्थ है-
                                   १.भीष्म नीति |
                                   २. विदुर नीति |
                                   ३. श्रीमद्भागवतगीता |
           "भीष्म-नीति"ग्रन्थ में वह ज्ञान संकलित है ,जो ज्ञान भीष्म पितामह द्वारा युद्धिष्ठिर को दिया गया था | युद्धिष्ठिर एक सतोगुणी व्यक्ति थे |आप जानते ही हैं कि सत् गुणों से युक्त व्यक्ति ज्ञान से भी युक्त होता है |उसे वैसे भी ज्ञान प्राप्त करने की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती |आज के युग में ऐसे लोगों का नितांत ही अभाव है,अतः इस ग्रन्थ का आज ज्यादा औचित्य नहीं है ,और न ही यह ग्रन्थ ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त कर सका |
           "विदुर-नीति" ग्रन्थ में वह ज्ञान संकलित है ,जो महात्मा विदुर द्वारा महाराज धृतराष्ट्र को दिया गया था| धृतराष्ट्र एक तामसिक गुणों से युक्त व्यक्ति था |तामसिक गुणों से युक्त व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने की स्थिति में होता ही नहीं है,और अगर उसे ज्ञान दिया जाये तो वह उसके एकदम विपरीत उसको समझता है |इसी कारण से आज संसार में तामसिक व्यक्तियों के होते हुए भी इस ग्रन्थ का औचित्य नहीं रहा |
          "श्रीमद्भागवतगीता" ग्रन्थ में वह ज्ञान संकलित है जो भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिया गया था |श्रीमद्भागवतगीता ही एक मात्र ऐसा ग्रन्थ है जिसमे भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद है,विवाद नहीं|संवाद में एक व्यक्ति बोलता है तो उस समय दूसरा उसे सुनता है,जबकि विवाद में दोनों ही किसी की भी सुनते नहीं है ,दोनों केवल बोलते ही हैं |यहाँ अर्जुन राजसिक गुणों से युक्त व्यक्ति है और आज के युग में रजोगुणी व्यक्तियों का ही बाहुल्य है |इसी कारण से इस इस ग्रन्थ की प्रसिद्धि और महता है|अतः आज के समय में यह ग्रन्थ युवाओं के लिए एक अच्छा मार्गदर्शक है |
                                       || हरिः शरणम् ||

Friday, November 15, 2013

आध्यात्मिकता |

                            भौतिक शरीर के बारे में कभी भी कोई दावा नहीं कर सकता कि कल यह रहेगा या नहीं?परन्तु आत्मिक शरीर कल भी था ,आज भी है और कल भी रहेगा |अतः आध्यात्मिक बनें न कि भौतिकता वादी |
                            जन्म-मरण , बुढ़ापा और बीमारी ,यह सब भौतिक शरीर को प्रभावित करते हैं,आत्मिक शरीर को नहीं |आत्मिक शरीर को मज़बूत बनाये रखें,तभी भौतिक शरीर से जीवन के आनंद (सच्चिदानंद) को प्राप्त कर सकेंगे |
                            अध्यात्म यह नहीं है कि ईश्वर की पूजा एवं आराधना के नाम पर तरह तरह के पाखंड किये जाएँ |यह तो अपने आप को सरासर धोखा देना हुआ |अध्यात्म तो मात्र "स्व" को (अपने आप को ) जानने का नाम है |
                           केवल घर-बार छोड़कर दर दर भटकने से परमात्मा थोड़े ही उपलब्ध होता है |परमात्मा के दर्शन तो स्वयं के भीतर झांकने एवं स्वयं को पहचानने से होते हैं|घर से दूर होना तो केवल मात्र आपको भीतर झांकने के लिए वातावरण उपलब्ध करवाता है |अगर संसार से दूर जाकर भी आप संसार के बारे में सोचते है,तो इसका अर्थ यही है कि आप अभी भी संसार में बने हुए हैं |
                                  || हरिः शरणम् ||

Thursday, November 14, 2013

समय,स्थान और कारण|

                               इस संसार में सबसे प्रत्येक वस्तु या व्यक्ति के पीछे तीन factors लागू होते हैं  --
                                             समय(Time),स्थान (Space),और कारण(Cause)
     समय (Time)--Time is an interval between two experiences.आध्यात्मिकता की तरफ बढ़ने वाले व्यक्ति के पास समय का कभी भी अभाव नहीं होता है|क्योंकि उसकी हर वस्तु और स्थिति नियंत्रित और व्यवस्थित होती है |जो व्यक्ति आध्यात्मिकता से दूर होता है ,वह हर वक्त , समय न होने या समय की कमी होने का रोना ही रोता रहता है |एक समय ऐसा आता है जब मृत्यु भी दस्तक दे देती है परन्तु कुछ करने के लिए समयाभाव का रोना तब भी रहता है |
      स्थान  (Space)--आध्यात्मिक व्यक्ति के पास स्थान का कभी भी अभाव नहीं रहता है |उसका ह्रदय विशाल होता है जो प्रत्येक जीव को स्वतंत्रता देने की तरफ इशारा करता है |जबकि आध्यात्मिकता से दूर व्यक्ति के पास स्थानाभाव सदैव रहता है |वह अपने संपर्क में आये हुए व्यक्तियों की स्वतंत्रता में कदापि भी विश्वास नहीं करता है |
    कारण(Cause) --आध्यात्मिकता की तरफ प्रगति करने वाले व्यक्ति को प्रत्येक के पीछे का कारण स्पष्ट होता है |उसे यह भी पता होता है की मानव योनि में उसके जन्म का कारण क्या है?जबकि साधारण व्यक्ति को  अपने जन्म का कारण स्पष्ट नहीं होता है |वह मानव जन्म को मात्र खाना ,पीना,सोना ,अर्थार्जन और धन संग्रह के लिए ही समझता है |इस प्रकार वह मानव जन्म को यूँ ही गवां देता है |
                                              || हरिः शरणम् ||

Wednesday, November 13, 2013

सुख और दुःख |

                     
                                                  'दुःख' का सबसे बड़ा कारण 'सुख' की इच्छा रखना है| अगर हम किसी व्यक्ति से सुख की कामना न करे तो हमें दुःख होने का प्रश्न ही नहीं है| यह इस संसार का नियम है कि जिस किसी से भी हम सुख पाने की आकांक्षा रखते हैं,सबसे ज्यादा दुःख हमें उसी से ही मिलता है| इसलिए 'दुःख' किसी से न मिले ,ऐसी अगर इच्छा हो तो फिर किसी से सुख प्राप्त होने की कामना न करे |
                                              " महाभारत "में कुंती ने प्रभु से सुख प्राप्त करने की कामना की बजाय दुःख देने की प्रार्थना की थी| जिससे वह हमेशा ईश्वर को अपने पास महसूस करती रहे और सुख प्राप्त न हो पाने की स्थिति में दुखी भी न हो |
                                        || हरिः शरणम् ||

Tuesday, November 12, 2013

स्वामी रामतीर्थ की नज़रों में-पुनर्जन्म और मुक्ति |

            स्वामी रामतीर्थ के अनुसार--
                 
                  1. Life is manifestation of your "Thoughts",nothing else.
                               जीवन और कुछ नहीं आपके विचारों की अभिव्यक्ति मात्र है |
                  2.Man - Desires = GOD
                                        अगर आप अपने जीवन में  आकांक्षाओं और कामनाओं से मुक्ति पा लेते हो तो फिर आप स्वयं ही परमात्मा हो जाते हो |
                  3.Birth is not by chance but by choice.
                             आपका जन्म आपकी कामनाओं और इच्छाओं का परिणाम है,न कि संयोग मात्र |   
                                  जो जीवन में आप करना चाहते हैं और कर नहीं पाते हो,जो बनना चाहते हो और बन नहीं पाते हो|अगले जन्म में उसको पूरा करने के लिए आपको वैसा ही वातावरण मिलता है|बस,जरूरत है आपको वर्तमान जीवन में सही कर्म करने की |इसीलिए यह कहा गया है कि आपका अगला जन्म आपकी पसंद के अनुसार होगा,न कि संयोगवश |

                 4."मुक्त" होने के लिए आपको "युक्त" होना जरूरी है |बिना "युक्त" हुए "मुक्ति" की कल्पना नहीं की जा सकती |गीता में भगवान श्री कृष्ण ने इसी युक्त होने को "योग"कहा है |
                                
                                                         || हरिः शरणम् ||

Monday, November 11, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१८


क्रमश:१८
            इस प्रकार हमने गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा सुझाये गए मुक्ति के तीन मार्गों को विज्ञानं के अनुसार समझने का प्रयास किया |ध्यान-योग(Meditation) में केवल विचारों(Thoughts) पर अंकुश लगाते हुए मन को नियंत्रण में लेना होता है जबकि कर्म योग में निष्काम भाव (Act without attachments)से कर्म अथवा ईश्वर के लिए कर्म करना(Act of and for God) या फिर कर्मफल  का त्याग(Detachment from the result of act) करना होता है जिससे दीर्घ कालीन स्मृति (Long term memory)बन ही नहीं पाए |यहाँ कर्म-योग में मन पर नियंत्रण आधा-अधूरा होता है जिसके कारण व्यक्ति कभी भी अपनी स्थिति से गिर सकता है (Degradation)और कभी भी अपनी स्थिति में सुधार(Up gradation) भी कर सकता है |ज्ञान -योग में व्यक्ति अपने स्वयं के और परमात्मा के बारे में समस्त ज्ञान(Thorough knowledge) को उपलब्ध होता है और वह शरीर,मन और इन्द्रियों के सभी क्रिया-कलापों की वैज्ञानिक जानकारी(Scientific knowledge) रखता है |छोटी से छोटी बात को भी वह आसानी से समझ लेता है,जिसके कारण वह मन को बहुत भी अच्छे तरीके से और स्थाई रूप से नियंत्रित रखने में सक्षम हो जाता है |
            ध्यान -योग में व्यक्ति को विचारों को नियंत्रण में रखने के लिए सांसारिक गतिविधियों से कटना पड़ता है जबकि कर्म-योग और ज्ञान-योग में संसार में रहते हुए भी मुक्ति संभव है |कर्म-योग में व्यक्ति संसार में रहते हुए उसके विकारों जैसे काम,क्रोध,लोभ,मोह,तृष्णा आदि में कभी कभार लिप्त हो सकता है जबकि ज्ञान-योग में ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति के सामने ऐसी कोई भी परिस्थिति कभी भी नहीं आ सकती |
             ध्यान-योग और कर्म-योग में व्यक्ति पूजा-पाठ या अन्य ऐसी विधियाँ(Rituals) अपनाता है जो कि उसने कहीं पढ़ी,सुनी या देखी हो |जबकि ज्ञानी व्यक्ति को ऐसी किसी भी गतिविधियों में न तो कोई रुचि होती है और न ही वह इनमे भाग लेता है |परन्तु अगर कोई अन्य भी ऐसी विधि अपनाता और करता है तो वह उसकी आलोचना भी नहीं करता है |
              ध्यान-योग में एकाग्रता(Concentration) की बहुत ही बड़ी भूमिका होती है जबकि कर्म-योग में एकाग्रता की आवश्यकता जरूर होती है परन्तु ध्यान - योग जितनी नहीं |ज्ञान-योग में एकाग्रता की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं होती |व्यक्ति में उपस्थित ज्ञान ही उसे ध्यान की अवस्था की स्थिति में सदैव स्थिर रखता है |
                 कर्म-योग को साधना सबसे सरल और सुगम(Easy and applicable) है |जबकि ध्यान-योग सबसे कठिन |ध्यान में जाने के लिए पहले ज्ञान -योग साधना आवश्यक है |बिना ज्ञान को उपलब्ध हुए ध्यान में जाना असंभव है |इसी लिए गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है- 
                         श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्येते |
                        ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् || गीता १२/१२ ||
               अर्थात्, मर्म को न जानकर किया गये अभ्यास(Rituals) से ज्ञान (Knowledge)श्रेष्ठ है,ज्ञान से विशेष ध्यान (Meditation)है और ध्यान से भी श्रेष्ठ सब कर्मों के फलों का त्याग((Detachment from the results of acts) है ;क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शांति(Peace forever) उपलब्ध होती है |
                   उपरोक्त श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने ज्ञान से ध्यान को विशेष बताया है ,श्रेष्ठ नहीं |ज्ञान तो कई व्यक्तियों को प्राप्त हो सकता है परन्तु उस ज्ञान का सही उपयोग तभी हो सकता है जब उस ज्ञान का पूर्णरूप से ध्यान रखा जाये |कई बार व्यक्क्ति को सम्पूर्ण ज्ञान होने के बाद भी सही समय पर वह ज्ञान ,ध्यान में नहीं आता |अतः केवल ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि ज्ञान का प्रत्येक समय ध्यान होना आवश्यक है |इसीलिए गीता में भगवान ने ध्यान को ज्ञान से विशेष बताया है |
                      ध्यान और कर्म-योग में से ध्यान - योग में अहंकार का नितांत अभाव होता है जबकि कर्म-योग में कभी कभी अज्ञानवश ऐसा हो सकता है |परन्तु ज्ञान-योग में व्यक्ति प्रायः अहंकारयुक्त हो जाता है |ऐसी स्थिति में ज्ञान प्राप्त करना अज्ञान की स्थिति से भी अधिक खतरनाक हो जाता है |इसीलिए ज्ञान का हर समय ध्यान में रहना आवश्यक है, जिससे व्यक्ति निरंतर अपनी स्थिति में सुधार करता रहे|
                                       || हरिः शरणम् ||

Sunday, November 10, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार|-१७

क्रमश:१७
                   गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                 यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन |
                                 ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा || गीता ४/३७ ||
अर्थात्,हे अर्जुन!जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है,वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है |
                        गीता में भगवान ने ज्ञान को भी अग्नि कहा है |विज्ञानं की दृष्टि में भी ज्ञान एक उर्जा ही है |ज्ञान मस्तिष्क के Neocortex में चुम्बकीय उर्जा(Magnetic energy) के रूप में संचित (Store)रहता है |इसीलिए ज्ञान कभी भी समाप्त नहीं होता और न ही कोई इसको कोई चुरा कर ले जा सकता |ज्ञान ही संसार में मात्र ऐसा है जिसे व्यक्ति कितना ही बांटे,बढता ही है,कम नहीं होता है |ज्ञान रुपी अग्नि से कर्म कैसे नष्ट हो जाते हैं?विज्ञानं के अनुसार जब आपके Neocortex में ज्ञान की चुम्बकीय उर्जा अपना स्थान घेरना शुरू करती है ,तब वहां संचित अन्य सूचनाओं के महत्व(Importance) का आकलन (Analysis)व्यक्ति करने लग जाता है |जो भी सूचनाएं उसे अनुचित लगती है उसके बारे में वह विस्तृत रूप से आकलन करता है |जो भी गलत कर्म उसके द्वारा किये गए है,उनको वह या तो सही करने की कोशश करता है या उन गलत कर्मों के परिमार्जन(Correction) के लिए वह प्रायश्चित करने की राह पकड़ता है |उसे कोई भी संकोच नहीं होता कि वह गलत किये गए कार्य को स्वीकार क्यों कर रहा है?किसी के साथ अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार के लिए वह क्षमा मांगने को भी निःसंकोच तैयार रहता है |इसी प्रकार किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसके प्रति किये गए अनुचित व्यवहार के लिए उसे तुरंत क्षमा भी कर देता है |
                      इस प्रकार हम देखते हैं कि एक ज्ञानयुक्त व्यक्ति के व्यवहार में आश्चर्यचकित कर देने वाला परिवर्तन  आ जाता है |यहाँ तक कि उसे अपने ज्ञानी होने का अहसास भी नहीं रहता,अहंकार होने की बात तो सम्भावना से परे की बात है |
                      जब मस्तिष्क के Neocortex में ज्ञान की उर्जा अपना विस्तार पा लेती है,तब अन्य स्मृतियों के अंकित होने और संचित रहने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है |ऐसे में मृत्यु के समय किसी भी प्रकार के संकेत आत्मा के साथ जाने  को उपलब्ध नहीं रहते हैं |यह ज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि है |इसी  लिए ज्ञान को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में समस्त कर्मों को भस्ममय करने की क्षमता वाला बताया है |कर्म-योग से ज्ञान-योग को श्रेष्ठ ज्ञान की इसी क्षमता के कारण बताया है | ज्ञान को उपलब्ध होने का प्रयास बड़ा ही दुष्कर है ,ज्ञान को उपलब्ध होना तो दूर की  कौड़ी  ही समझी जानी चाहिए |इसी बात को ध्यान में रखते हुए साधारण व्यक्ति के लिए भगवान श्री कृष्ण ने ज्ञान के स्थान पर कर्म-योग के साधन को सुगम और सरल बताया है |
                                  ज्ञान के कारण Neocortex किसी भी कार्य के लिए ऐसे संकेत Hypothalamus को भेजता भी नहीं है ,जिन्हें वह आगे प्रेषित (Transmit)कर इन्द्रियों(Organs of senses) द्वारा  कोई गलत कर्म करवा सके |इसी प्रकार Synapses,Nerves और Neurons जो भी सुचनाये(Sensory signals) Hippocampus को भेजे जाते है ,ज्ञान के कारण उसकी प्रतिक्रिया (Reaction)में मस्तिष्क द्वारा ऐसे कोई भी  कार्यिक संकेत (Motor signals)वापिस nerves तथा Synapses को भेजे नहीं जाते जिसके कारण कर्मेन्द्रिया (Organs for act)कोई अनुचित कर्म करे|यही कारण है किज्ञानी द्वारा कभी भी ऐसे कर्म किये ही नहीं जाते जो अकर्म में न बदले |साथ ही ज्ञानी व्यक्ति का मन भी इतना निर्मल हो जाता है कि आत्मा को वह इन्द्रियों के विषयों का संग (Attachment with properties of senses)) करने ही नहीं देता | जैसा कि  हम जानते हैं कि मन ही बंधन(Tie, Attachment) के लिए उत्तरदायी है और मन ही व्यक्ति को मुक्ति(Untie, Detachment) के द्वार तक ले जाता है |तभी कबीर ने कहा है -
   पुनर्जन्म के लिए-
                            मन मरा न ममता मरी,मर मर गया शरीर |
                             आशा तृष्णा ना मरी, कह गया दास कबीर ||
और मन का मुक्ति से सम्बन्ध कैसा है ,इस बारे में कहा है-
                            मन ऐसा निर्मल भया , जैसे गंगा नीर |
                            पाछे पाछे हरि फिरे , कहत कबीर कबीर ||
       यही ज्ञानी व्यक्ति की पहचान है |ज्ञानी व्यक्ति मन पर इतना नियंत्रण कर लेता है कि इन्द्रियों के बहकावे में आ ही नहीं सकता |पुनर्जन्म से मुक्ति का विज्ञानं मात्र यही है यानि मन ( Limbic system of the brain -Hypothalamus and Hippocampus specially)) पर नियंत्रण |और यह सब ज्ञान को उपलब्ध होने पर ही संभव है |
क्रमश:
                         || हरिः शरणम् ||