आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -78
आसक्ति के पीछे संसार और शरीर से मिलने वाला भोग-सुख है, जबकि परमात्मा से अनुराग होना उनसे प्रेम करना है । आसक्ति राग पैदा करती है जबकि संसार के प्रति वीतरागता से परमात्मा में अनुराग हो जाता है । राग आसक्ति है और अनुराग अनुरक्ति है ।
परमात्मा में अनुकरणीय अनुरक्ति देखना हो तो सबसे बेहतरीन उदाहरण गोपियों का है । गोपियां घर का काम भी करती थी तो भी ध्यान श्रीकृष्ण में लगा रहता था । भागवतजी में एक अध्याय गोपिका- गीत का है, जिसमें गोपियां श्रीकृष्ण को कहती हैं कि हम तुम्हारी बिना मोल की दासियां हैं । बिना मोल की दासियां कहने का अर्थ है कि वे कृष्ण से निश्छल और नि:स्वार्थ प्रेम करती थी । इतना प्रेम कि उनको अपने पति, घर के काम-काज, यहाँ तक कि कपड़े-लतों तक की भी सुध नहीं रहती थी । उनका परमात्मा के प्रति कोई शारीरिक और सांसारिक प्रेम नहीं था, उनका प्रेम तो अलौकिक था, दिव्य था । वे रात-दिन प्रेम-रस में भीगी रहती थी । वे स्वयं तक को भूल जाती थी, बस केवल एक कृष्ण …..। तभी कबीर ने प्रेम को इस प्रकार परिभाषित किया है -
प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय ।
जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय ।।
प्रेम की परिपूर्णता सेवा और त्याग में ही है । इन दो (सेवा और त्याग) गुणों के कारण ही गोपियां परमात्मा के प्रति अनुरक्त रही । सेवा और त्याग स्त्रियों में विशेष रूप से होते हैं क्योंकि उनका चित्त स्त्रैण होता है । उनमें श्रद्धा और विश्वास जन्मजात होता है, वे शीघ्र ही किसी पर विश्वास कर लेती हैं जिसके कारण कई दुष्ट व्यक्ति उनका नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं ।
आज की बालिकाओं में स्त्रैण चित्त का निरन्तर अभाव होता जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली के जन्तर-मंतर पर परिलक्षित हुआ उनका व्यवहार है । इतना बुरा प्रदर्शन तो किसी गए गुजरे पुरुष का भी नहीं देखा गया है । ऐसे में शायद ही भविष्य में कोई परमात्मा में अनुरक्त मीरां देखने को मिले ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ.प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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