Sunday, August 9, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -77

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -77

             एक-दो पाठकों द्वारा ‘अनुरक्ति’ का उदाहरण देने का अनुरोध किया गया है । मुझे इस बात का सदैव गर्व रहता है कि मैं उस राज्य से हूँ जहां परमात्मा में अनुरक्त भक्तों का इतिहास रहा है । सबसे बड़ा उदाहरण तो मीरां बाई का है । मेड़ता में जन्म लेकर पली-बढ़ी मीरां का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया गया था । फिर भी वे सदैव कहती रही कि ‘ जिनके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई’ । संसार से अनासक्त मीरां सदैव श्रीकृष्ण भक्ति में लीन रहती थी । परमात्मा के प्रति ऐसी अनुरक्ति का उदाहरण आज इक्कीसवीं शताब्दी में मिलना मुश्किल है ।

          मीरां बाई के अलावा मकराना की बालिका करमा बाई भी परमात्मा के प्रति अनुरक्त थी तभी तो जगन्नाथ को आज भी उसके खीचड़े का भोग रुचता है । पिता द्वारा स्वयं से पूर्व श्रीकृष्ण को ज़ीमाने का आदेश ही उनको परमात्मा के प्रति अनुरक्त कर गया । करमा ने भोजन तब तक नहीं किया जब तक भगवान ने साक्षात् प्रकट होकर उसका बनाया खीचड़ा नहीं खा लिया । ऐसी अबोध अनुरक्ति भी परमात्मा के दर्शन करा सकती है ।

         मांझवास (नागौर) की फूली बाई, राम-भक्ति में इतनी तल्लीन रहती थी कि उसकी थेपड़ियाँ (गोबर के कण्डे) दूसरी स्त्रियाँ चुरा ले जाती थी । जब वह गांव प्रधान से इस चोरी की शिकायत करती तो वे फूली से उसकी थेपड़ियों की पहचान बताने को कहते । तब वे एक ही बात कहती कि मेरी जिस भी थेपड़ी को हाथ लगाओगे, उससे राम-राम की धुन निकलेगी । फूली बाई की भगवान के प्रति अनुरक्ति की कल्पना कीजिए कि केवल उसके रोम-रोम में ही राम-धुन नहीं बसी थी बल्कि जिसको भी उसने छुआ वह भी राममय हो गया ।

क्रमशः

 प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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