आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -76
हम सब ‘नहीं’ से ही प्रेम करने लगे हैं । वास्तव में यह प्रेम न होकर हमारे स्वार्थ के कारण उनमें हमारी आसक्ति है । आसक्ति को प्रेम का नाम नहीं दिया जा सकता । प्रेम विनाशी और परिवर्तनशील के साथ हो ही नहीं सकता । उनके साथ किया गया प्रेम आज है, कल नहीं रहेगा । हमने संसार, उसके व्यक्तियों, वस्तुओं में मोह/आसक्ति को प्रेम का नाम दे दिया है, यह ग़लत है । सांसारिक मोह के कारण ही हम दूसरों को ‘अपना’ कहने लगे हैं । वास्तव में वे अपने न तो पूर्व में कभी थे, न आज हैं और न भविष्य में कभी अपने होंगे ।
आसक्ति/राग जिसको हमने ‘प्रेम’ नाम दे रखा है, वास्तव में वह अपना स्वार्थ है । जिस समय स्वार्थपूर्ति में बाधा आएगी, यही प्रेम (राग) द्वेष में परिवर्तित हो जाएगा । राग का विलोम द्वेष है क्योंकि दोनों में ही दो का अस्तित्व बना रहता है । प्रेम का कोई विलोम शब्द नहीं है क्योंकि प्रेम में किसी दूसरे का स्थान ही नहीं है ।
‘प्रेम गली अति सांकरी, जाँ में दो न समाही ।
जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहीं ।।’
प्रेम तो अविनाशी है और अविनाशी से किया गया प्रेम ही अनुरक्ति है । इसलिए संसार और शरीर सम्बंधियों को ‘मैं, मेरा और मेरे लिए’ मानना छोड़कर अनासक्त हो जाएं और फिर अपनी ऊर्जा को परमात्मा से अपनापन करने में समर्पित कर दें । ऊर्जा भी परमात्मा की तरह अनादि और अविनाशी है । आसक्ति को छोड़ अनासक्त होकर जो ऊर्जा बचाई है, उसको अनुरक्ति में समर्पित कर दें, जीवन में ऐसा करना ही सर्वोत्तम है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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