आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -40
सुबह होते ही उसने खाना बनाया और जंगल में स्थित उस तपस्वी की कुटिया की ओर चल पड़ी । जल्दी ही वह उस तपस्वी की कुटिया में प्रवेश पा गयी । तपस्वी ने सर्वप्रथम तो उसे जी भर कर देखा और फिर इतनी सुबह आने का प्रयोजन पूछा । युवती ने क्षमा मांगते हुए कहा कि आज ही वह किसी आवश्यक कार्य-वश कहीं बाहर जा रही है । उसने तपस्वी को उसके और स्वयं के स्तर की तुलना करते हुए कहा कि इस प्रकार विवाह करना उपयुक्त नहीं है । एक तपस्वी को अपने तप में, अपनी साधना में आगे प्रगति करनी चाहिए और गृहस्थी बसाने का निर्णय त्याग देना चाहिए ।
यकायक यह सुनकर तपस्वी को एक झटका सा लगा । उसकी विवाहोपरांत की सभी कल्पनाएँ एक क्षण में ही मटियामेट हो चुकी थी । उसने बड़े ही दुःखी मन से युवती को अपनी कुटिया से विदा किया और पुनः तपस्या में लीन हो गया । परिस्थितियाँ अचानक ही एकदम बदल गयी थी । अब पुनः चिंताग्रस्त होने की बारी इंद्र की थी ।
गाँव लौटकर उस युवती ने फिर कभी उस जंगल की ओर, उस तपस्वी की कुटिया का रुख नहीं किया । तपस्वी कठोर तप में लीन था । अब इंद्र ने इस तपस्वी को देव-लोक का सिंहासन सौंप कर उसका सहायक बनने में ही अपना भला समझा । यह सोचकर इंद्र भूलोक पर उतर आया और उसने तपस्वी की कुटिया में प्रवेश किया ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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