Wednesday, July 1, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -38

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -38 

           तपस्वी की कठोर तपस्या को देखकर इंद्र विचलित हो गया । वह सोचने लगा कि आख़िर यह तपस्वी इतना कठोर तप क्यों कर रहा है, कहीं मेरे सिंहासन पर तो इसकी दृष्टि नहीं है ? इंद्र, देव-लोक का शासन-कर्ता । देव लोक अर्थात स्वर्ग, जहाँ देवताओं की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है, काम से लेकर समस्त सुख प्राप्त करने की । आप यह न समझें कि स्वर्ग में कोई कामना नहीं होती । अगर कामना नहीं होती तो स्वर्ग की कल्पना तक नहीं होती । हमारी कामनाएं ही हमारे लिए स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है । 

         हाँ, तो इंद्र बड़ा चिंता मग्न था कि हो न हो; यह तपस्वी मेरा पद छिनने के लिए ही इतना कठोर तप कर रहा है । इंद्र ने एक उपाय सोचा और उसको क्रियान्वित किया भी । उसने उस गाँव की बदसूरत सी काली-कलूटी लड़की को अप्रतिम सौन्दर्य की मल्लिका बना दिया । उस लड़की का सौन्दर्य इतना अधिक प्रभावशाली हो गया था कि उस समय तो उसके सामने स्वर्ग की अप्सराएँ (उर्वशी, मेनका आदि) भी पानी भरती दिखलाई पड़ रही थी ।

                अप्रतिम सौन्दर्य (Outstanding beauty) पाने के बाद भी गाँव की उस लड़की का तो प्रतिदिन का यही नियम कि तपस्वी की कुटिया में खाना-पानी रखे । एक दिन तपस्वी ध्यान के बाद यूँ ही बैठा हुआ था कि उसी कुमारी कन्या ने खाना-पानी रखने के लिए कुटिया में प्रवेश किया । तपस्वी की दृष्टि उस बालिका पर पड़ी । उसका अप्रतिम सौन्दर्य देखकर वह स्वयं तक को भुला बैठा । उसने तत्काल ही अपनी तपस्या को अनवरत जारी रखने का विचार त्याग दिया । उसने बिना सोचे-समझे उस लड़की के समक्ष विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया; एकदम आधुनिक युग में एक लडके द्वारा लड़की को किए जाने वाले ‘प्रपोज’ की तरह । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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