आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -37
अनासक्ति के अगले सूत्र के लिए अब आगे बढ़ते हैं । एक विरक्त संत हुआ करते थे । बचपन से ही उनका अध्यात्म के प्रति बड़ा गहरा रुझान था । उन्हें कामना और क्रोध छू कर तक नहीं गये थे । जब तक मन में किसी भी प्रकार की कामना जन्म नहीं लेती है, तब तक भला क्रोध किस पर करे ? कामना ही क्रोध की जननी है, क्रोध पैदा ही तब होता है जब कामना पूरी नहीं होती । साथ ही साथ कामना लोभ की जननी भी है । जब एक कामना पूरी हो जाती है तब वह मन में लोभ उत्पन्न करती है और फिर एक नई कामना का जन्म हो जाता है ।
हाँ, तो बात हो रही थी एक विरक्त संत की । संत घने जंगल में बैठकर कठोर तप करते हुए आत्म-बोध को उपलब्ध होने का प्रयास कर रहे थे । इसके लिए विरक्त संत तपस्या में लीन होकर तपस्वी बन गए थे । पास के ही एक गाँव की काली-कलूटी बहुत ही बदसूरत लड़की उस जंगल में बने तालाब से जल भरने के लिए नियमित रूप से आती थी । वह प्रतिदिन देखती कि वह तपस्वी तप में सदैव लीन रहता था । उसके लिए खाने-पीने की क्या व्यवस्था है, वह इस पर सोच-विचार किया करती । उसको वहाँ कोई व्यवस्था नज़र नहीं आयी । अंततः उसको उस तपस्वी पर दया आ गयी । वह घर से खाना बनाकर लाती, तालाब से जल का घड़ा भरती और दोनों को तपस्वी की कुटिया में रख देती ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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